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भारत की संविधान सभा कितनी प्रतिनिधि थी?

भारत की संविधान सभा कितनी प्रतिनिधि थी?

  • गठन, निर्वाचन, वायसराय की भूमिका और उसकी प्रतिनिधिकता का ऐतिहासिक परीक्षण

लेखक : अधिवक्ता लक्ष्मण पाण्डेय

भारत के संविधान की चर्चा करते समय सामान्यतः यह कहा जाता है कि “संविधान सभा ने भारत का संविधान बनाया।” यह कथन सत्य है, लेकिन अपने आप में पूरा सत्य नहीं है। संविधान सभा के निर्माण की प्रक्रिया, उसके सदस्यों के चयन की पद्धति, ब्रिटिश सरकार और वायसराय की भूमिका, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग की स्थिति, देशी रियासतों के प्रतिनिधित्व और स्वतंत्रता के बाद संविधान सभा की बदली हुई संवैधानिक स्थिति को समझे बिना यह प्रश्न अनुत्तरित रह जाता है कि आखिर संविधान सभा किस अर्थ में भारत की प्रतिनिधि सभा थी और किस अर्थ में नहीं थी?

आज जब लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व का अर्थ सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार से सीधे निर्वाचित संसद से लगाया जाता है, तब 1946 की संविधान सभा को उसी कसौटी पर परखना स्वाभाविक है। लेकिन इतिहास को उसके अपने समय, परिस्थितियों और राजनीतिक संदर्भ में देखना भी उतना ही आवश्यक है।

संविधान सभा की वास्तविक कहानी इसलिए न तो केवल गौरवगाथा है और न ही उसे मात्र ब्रिटिश सरकार की बनाई हुई संस्था कहकर खारिज किया जा सकता है। उसका स्वरूप इन दोनों अतियों के बीच था।

1. संविधान सभा की मांग क्यों उठी?


भारत में संविधान निर्माण का प्रश्न ब्रिटिश शासन के अंतिम वर्षों में अचानक पैदा नहीं हुआ था। भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के भीतर यह विचार धीरे-धीरे विकसित हुआ कि भारत का शासन-विधान भारतीय जनता की इच्छा के अनुसार होना चाहिए।

मूल प्रश्न यह था कि भारत का संविधान कौन बनाएगा?

क्या ब्रिटिश संसद भारत के लिए संविधान बनाएगी?

क्या वायसराय और ब्रिटिश सरकार कोई संवैधानिक ढांचा थोपेंगे?

या भारत के लोग अपने प्रतिनिधियों के माध्यम से अपना संविधान स्वयं बनाएंगे?

भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में तीसरा विकल्प धीरे-धीरे प्रमुख हुआ-अर्थात् संविधान सभा द्वारा संविधान निर्माण।

यही विचार आगे चलकर स्वतंत्र भारत की संवैधानिक राजनीति की आधारभूमि बना।

2. द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद परिस्थिति क्यों बदली?


द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद ब्रिटेन की आर्थिक और राजनीतिक स्थिति कमजोर हो चुकी थी। भारत में स्वतंत्रता आंदोलन का दबाव लगातार बढ़ रहा था। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन, युद्धोत्तर राजनीतिक परिस्थितियों और भारतीय नौसेना विद्रोह जैसे घटनाक्रमों ने ब्रिटिश शासन की कठिनाइयों को बढ़ा दिया।

1945 में ब्रिटेन में लेबर पार्टी की सरकार बनी। प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली की सरकार ने भारत के प्रश्न का राजनीतिक समाधान खोजने की दिशा में कदम बढ़ाया।

1946 में ब्रिटिश सरकार ने भारत में कैबिनेट मिशन भेजा। इसमें लॉर्ड पेथिक-लॉरेंस, सर स्टैफर्ड क्रिप्स और ए.वी. एलेक्जेंडर शामिल थे।

मिशन का उद्देश्य केवल संविधान सभा बनाना नहीं था। वह कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच भारत के भविष्य को लेकर समझौता कराने का प्रयास भी कर रहा था।

मगर कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच मूलभूत मतभेद समाप्त नहीं हो सके। कांग्रेस अखंड भारत के पक्ष में थी, जबकि मुस्लिम लीग पाकिस्तान की मांग पर अड़ी हुई थी।

कैबिनेट मिशन ने दोनों पक्षों को समझाने के प्रयास के बाद 16 मई 1946 को अपनी योजना प्रस्तुत की। स्वयं मिशन ने अपने वक्तव्य में कहा कि कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच समझौता कराने के प्रयास सफल नहीं हो सके, इसलिए ब्रिटिश सरकार की स्वीकृति के साथ उसने अपनी योजना प्रस्तुत की।

3. क्या संविधान सभा वायसराय ने बनाई थी?


यह प्रश्न अत्यंत सावधानी से समझना चाहिए।

यह कहना कि “वायसराय ने अपनी इच्छा से संविधान सभा बना दी”, ऐतिहासिक रूप से अधूरा होगा।

लेकिन यह कहना कि “संविधान सभा का गठन पूर्णतः स्वतंत्र भारतीय जनादेश से हुआ था और ब्रिटिश सत्ता की इसमें कोई भूमिका नहीं थी”, यह भी सही नहीं होगा।

वास्तविकता यह थी कि संविधान सभा का गठन उस समय के औपनिवेशिक संवैधानिक ढांचे के भीतर कैबिनेट मिशन योजना के आधार पर हुआ।

16 मई 1946 के कैबिनेट मिशन वक्तव्य में स्पष्ट कहा गया कि तत्काल ऐसी व्यवस्था की जाए जिससे भारतीय लोग भारत के भावी संविधान का निर्णय कर सकें। उसी दस्तावेज में संविधान सभा के गठन की चुनावी व्यवस्था भी निर्धारित की गई।

इसलिए संविधान सभा के गठन के पीछे तीन स्तरों को समझना चाहिए-

पहला-ब्रिटिश सरकार की संवैधानिक पहल।

दूसरा-भारतीय राजनीतिक दलों की स्वीकृति और भागीदारी।

तीसरा-भारतीय प्रतिनिधियों द्वारा उस संस्था को वास्तविक संविधान-निर्माण की शक्ति प्रदान करना।

4. “वायसराय ने नोटिफिकेशन जारी किया तो राष्ट्र के किन हिस्सों की सहमति थी?”


यह प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे संविधान सभा की प्रारंभिक वैधता का प्रश्न जुड़ा है।

16 मई 1946 की योजना कैबिनेट मिशन और वायसराय लॉर्ड वेवेल की ओर से प्रस्तुत की गई थी और इसे ब्रिटिश सरकार की पूर्ण स्वीकृति प्राप्त थी। योजना में यह स्पष्ट था कि कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच अंतिम समझौता न होने के बावजूद ब्रिटिश सरकार अपनी ओर से संविधान-निर्माण की मशीनरी स्थापित करने का प्रस्ताव रख रही है। इसलिए संविधान सभा का गठन किसी अखिल भारतीय जनमत-संग्रह से नहीं हुआ था।

उस समय भारत के “राष्ट्र” की ओर से कोई एक सार्वभौमिक मतादेश भी उपलब्ध नहीं था।

राजनीतिक रूप से प्रमुख पक्षों में-
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस,
मुस्लिम लीग,
देशी रियासतों के शासक और उनके प्रतिनिधि,
ब्रिटिश भारतीय प्रांतीय राजनीतिक नेतृत्व

शामिल थे।

कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच मतभेद इतने गंभीर थे कि दोनों के बीच संविधान सभा की संपूर्ण योजना पर स्थायी सहमति नहीं बन सकी।

मुस्लिम लीग ने प्रारंभिक चरण में संविधान सभा का बहिष्कार किया। इस तथ्य का संविधान सभा की प्रारंभिक प्रतिनिधिकता पर सीधा प्रभाव पड़ा।

इसलिए यह कहना अधिक सही होगा कि संविधान सभा भारतीय राजनीतिक परिस्थितियों और ब्रिटिश सत्ता के बीच हुए संवैधानिक समझौते की उपज थी, न कि किसी एक सर्वसम्मत राष्ट्रीय जनादेश की।

5. संविधान सभा की कुल प्रस्तावित संख्या कितनी थी?


कैबिनेट मिशन योजना के अनुसार संविधान सभा की कुल प्रस्तावित सदस्य संख्या 389 थी।

इसका विभाजन broadly इस प्रकार था-

292 सदस्य - ब्रिटिश भारतीय प्रांतों से

4 सदस्य- चीफ कमिश्नर के प्रांतों से

93 सदस्य- देशी रियासतों से

भारत की संसद के आधिकारिक विवरण में भी संविधान सभा की संरचना को इसी प्रकार बताया गया है।

लेकिन इन 389 सदस्यों का चयन एक ही तरीके से नहीं हुआ था।

यही संविधान सभा की प्रतिनिधिकता समझने की सबसे महत्वपूर्ण कुंजी है।

6. क्या संविधान सभा के सदस्यों को जनता ने सीधे चुना था?


नहीं।

यह तथ्य स्पष्ट रूप से समझना चाहिए।

संविधान सभा के प्रांतीय प्रतिनिधियों का चुनाव जनता ने सीधे नहीं किया था।

वे तत्कालीन प्रांतीय विधानसभाओं के सदस्यों द्वारा चुने गए थे।

अर्थात् चुनाव की संरचना थी-

जनता → प्रांतीय विधानसभा → संविधान सभा

इसलिए संविधान सभा एक अप्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित संस्था थी।

भारत की संसद के आधिकारिक विवरण में भी स्पष्ट है कि संविधान सभा के सदस्य कैबिनेट मिशन की योजना के अनुसार प्रांतीय विधानसभाओं के सदस्यों द्वारा अप्रत्यक्ष चुनाव से चुने गए थे।

7. ऐसा क्यों किया गया?


यहां कैबिनेट मिशन की अपनी दलील महत्वपूर्ण है।

मिशन ने माना कि सबसे अच्छी व्यवस्था सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के आधार पर प्रत्यक्ष चुनाव होती।

लेकिन उसका तर्क था कि उस समय पूरे भारत में वयस्क मताधिकार के आधार पर नया चुनाव कराने में बहुत समय लगेगा और संविधान निर्माण में अस्वीकार्य विलंब होगा।

इसलिए हाल में चुनी गई प्रांतीय विधानसभाओं को ही संविधान सभा के निर्वाचन का आधार बनाया गया।

कैबिनेट मिशन के मूल दस्तावेज में साफ लिखा है कि वयस्क मताधिकार आधारित चुनाव सबसे संतोषजनक पद्धति होता, लेकिन तत्काल उसे लागू करना व्यावहारिक नहीं था; इसलिए हाल में निर्वाचित प्रांतीय विधानसभाओं को निर्वाचन मंडल के रूप में इस्तेमाल करने का निर्णय लिया गया।

यह स्वीकारोक्ति बहुत महत्वपूर्ण है।

अर्थात् संविधान सभा स्वयं यह नहीं कह सकती थी कि वह सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार से सीधे चुनी गई जनता की सभा है।

8. प्रांतीय प्रतिनिधियों का निर्वाचन कैसे हुआ?


कैबिनेट मिशन ने प्रांतों की जनसंख्या के आधार पर सीटों का आवंटन किया।

इसके बाद प्रांतीय विधानसभाओं में तीन प्रमुख निर्वाचन समूहों की व्यवस्था की गई-

1. सामान्य,

2. मुस्लिम,

3. सिख।

प्रत्येक वर्ग के निर्वाचित विधायक अपने-अपने वर्ग के संविधान सभा प्रतिनिधियों का चुनाव करते थे।

चुनाव की पद्धति आनुपातिक प्रतिनिधित्व तथा एकल संक्रमणीय मत (Single Transferable Vote) थी।

यहां भी ध्यान देने योग्य बात यह है कि यह व्यवस्था तत्कालीन सांप्रदायिक निर्वाचन व्यवस्था की विरासत से पूरी तरह मुक्त नहीं थी।

इससे स्पष्ट होता है कि संविधान सभा का जन्म उसी राजनीतिक वातावरण में हुआ जिसमें हिंदू-मुस्लिम प्रतिनिधित्व, पृथक निर्वाचन और सामुदायिक राजनीतिक पहचान महत्वपूर्ण प्रश्न बन चुके थे।

9. क्या उस समय हर भारतीय को वोट देने का अधिकार था?


नहीं।

1946 की प्रांतीय विधानसभाएं आज की लोकसभा या विधानसभा की तरह सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार से निर्वाचित नहीं थीं।

उस समय मताधिकार सीमित था और विभिन्न योग्यता तथा संपत्ति आदि से जुड़े मानदंड लागू थे।

इसका सीधा परिणाम यह हुआ कि संविधान सभा के निर्वाचन की पूरी श्रृंखला उस जनसंख्या तक नहीं पहुंची जिसे आज हम “प्रत्येक वयस्क नागरिक” कहते हैं।

इसलिए यदि आज की लोकतांत्रिक कसौटी लगाई जाए तो संविधान सभा की सबसे बड़ी सीमा यही थी कि-

भारत की प्रत्येक वयस्क महिला और पुरुष ने संविधान सभा के चुनाव में प्रत्यक्ष मतदान नहीं किया था।


10. फिर संविधान सभा को प्रतिनिधि क्यों कहा गया?


यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना चाहिए।

प्रतिनिधि होना और प्रत्यक्ष सार्वभौमिक मताधिकार से चुना जाना एक ही बात नहीं है।

संविधान सभा में उस समय के भारत के प्रमुख राजनीतिक और सामाजिक वर्गों का व्यापक प्रतिनिधित्व था।

उसमें-
विभिन्न प्रांतों के प्रतिनिधि,
कांग्रेस से जुड़े नेता,
मुस्लिम प्रतिनिधि,
सिख प्रतिनिधि,
अल्पसंख्यक समुदायों के लोग,
विधिवेत्ता,
प्रशासक,
शिक्षाविद,
समाज सुधारक,
देशी रियासतों के प्रतिनिधि

शामिल थे।

इस अर्थ में सभा भारतीय समाज और राजनीति के महत्वपूर्ण हिस्सों का प्रतिनिधित्व करती थी।

लेकिन “पूरे भारत के प्रत्येक वयस्क नागरिक द्वारा प्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित सभा” के अर्थ में वह प्रतिनिधि नहीं थी।

11. देशी रियासतों का क्या हुआ?


यह संविधान सभा की कहानी का एक अलग और महत्वपूर्ण अध्याय है।

ब्रिटिश भारत के अलावा भारत में सैकड़ों देशी रियासतें थीं। इन रियासतों पर ब्रिटिश क्राउन की सर्वोच्चता थी, लेकिन उनके आंतरिक प्रशासन में स्थानीय शासकों की महत्वपूर्ण भूमिका थी।

कैबिनेट मिशन ने देशी रियासतों के लिए 93 सीटें निर्धारित कीं।

लेकिन उनके प्रतिनिधियों का चयन ब्रिटिश भारतीय प्रांतों की तरह सीधे या अप्रत्यक्ष विधानसभा चुनाव से नहीं होना था।

मिशन ने स्पष्ट किया कि रियासतों के प्रतिनिधियों के चयन की विधि परामर्श द्वारा तय की जाएगी। प्रारंभिक अवस्था में रियासतों का प्रतिनिधित्व एक Negotiating Committee के माध्यम से होना था।

यानी संविधान सभा के 93 रियासती प्रतिनिधियों का प्रश्न अपने आप में एक अलग राजनीतिक बातचीत का विषय था।

12. रियासतों के प्रतिनिधित्व पर संविधान सभा ने क्या किया?


21 दिसंबर 1946 को संविधान सभा ने एक समिति गठित की, जिसे रियासतों के प्रतिनिधियों के संबंध में बातचीत करनी थी।

इस समिति में जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल, मौलाना अबुल कलाम आजाद सहित प्रमुख नेता शामिल थे।

समिति का उद्देश्य था-
रियासतों के लिए निर्धारित सीटों का वितरण तय करना,
रियासतों के प्रतिनिधियों को संविधान सभा में भेजने की विधि तय करना।

इस समिति की रिपोर्ट 24 अप्रैल 1947 को प्रस्तुत हुई और 28 अप्रैल 1947 को सभा ने उसे स्वीकार किया।

यह तथ्य दिखाता है कि संविधान सभा का स्वरूप स्वयं विकसित हो रहा था। वह एक दिन में बनी और उसी स्वरूप में स्थिर हो गई संस्था नहीं थी।

13. मुस्लिम लीग की अनुपस्थिति का क्या प्रभाव पड़ा?


संविधान सभा की प्रतिनिधिकता पर सबसे गंभीर प्रश्नों में से एक मुस्लिम लीग की भूमिका है।

कैबिनेट मिशन योजना को लेकर प्रारंभिक स्तर पर कांग्रेस और मुस्लिम लीग दोनों ने कुछ स्तर पर सहमति व्यक्त की थी, लेकिन बाद में मतभेद बढ़ गए।

मुस्लिम लीग पाकिस्तान की मांग पर कायम रही और संविधान सभा की कार्यवाही से दूर रही।

इसके कारण संविधान सभा की प्रारंभिक बैठकों में भारत की एक बहुत बड़ी राजनीतिक शक्ति का प्रतिनिधित्व नहीं था।

यह कहना इसलिए उचित होगा कि दिसंबर 1946 की प्रारंभिक संविधान सभा सम्पूर्ण अविभाजित भारत की सर्वसम्मत राजनीतिक प्रतिनिधि संस्था नहीं थी।

लेकिन यह स्थिति स्थायी नहीं रही।

1947 में भारत का विभाजन हुआ।

पाकिस्तान के लिए जाने वाले क्षेत्रों के प्रतिनिधि भारतीय संविधान सभा से अलग हो गए।

इसके बाद भारतीय संविधान सभा स्वतंत्र भारत के संविधान निर्माण की केंद्रीय संस्था बन गई।

14. 15 अगस्त 1947 के बाद क्या बदल गया?


यह संविधान सभा की संवैधानिक स्थिति में निर्णायक मोड़ था।

15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ।

इसके साथ ब्रिटिश सत्ता की सर्वोच्चता समाप्त हुई और भारतीय संविधान सभा की प्रकृति भी बदल गई।

अब वह ब्रिटिश सत्ता द्वारा भारत के लिए संविधान तैयार करने वाली संस्था भर नहीं रह गई थी।

वह स्वतंत्र भारत की संविधान-निर्माण संस्था बन गई।

इसी चरण में संविधान सभा ने संविधान निर्माण के साथ-साथ विधायिका के रूप में भी कार्य किया। भारत की संसद के आधिकारिक विवरण में बताया गया है कि संविधान सभा ने कुल 11 सत्रों में 165 दिन कार्य किया, जिनमें 114 दिन प्रारूप संविधान पर विचार में लगाए गए।

15. भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम का महत्व


भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947 ने भारत और पाकिस्तान के लिए दो स्वतंत्र डोमिनियन स्थापित किए और 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्रता की तिथि निर्धारित की।

इसके बाद संविधान सभा की राजनीतिक स्थिति में मौलिक परिवर्तन आया।

अब ब्रिटिश संसद की संप्रभुता के अधीन किसी औपनिवेशिक व्यवस्था में संविधान बनाने के बजाय भारतीय संविधान सभा स्वतंत्र भारत की राजनीतिक संप्रभुता का संस्थागत केंद्र बन गई।

यहीं से संविधान सभा की वैधानिक उत्पत्ति और उसकी संप्रभु संवैधानिक भूमिका को अलग-अलग समझना चाहिए।

16. संविधान सभा की वैधता के दो चरण


संविधान सभा की वैधता को दो चरणों में समझना अधिक उचित होगा।

पहला चरण : 1946

यह चरण कैबिनेट मिशन योजना, ब्रिटिश सरकार की स्वीकृति, वायसराय की संवैधानिक भूमिका और प्रांतीय विधानसभाओं के अप्रत्यक्ष निर्वाचन से जुड़ा था।

इस अर्थ में संविधान सभा की संवैधानिक उत्पत्ति औपनिवेशिक व्यवस्था के भीतर हुई।

दूसरा चरण : 1947 के बाद

स्वतंत्रता के बाद संविधान सभा ने स्वतंत्र भारत के लिए संविधान बनाने का कार्य किया और उसकी राजनीतिक-संवैधानिक भूमिका मूलतः बदल गई।

इस अर्थ में उसकी संप्रभुता भारतीय स्वतंत्रता से प्राप्त हुई।

इस अंतर को भूल जाना संविधान सभा के इतिहास को एकतरफा बना देता है।

17. क्या संविधान सभा को ब्रिटिश सरकार की “मनोनीत सभा” कहना उचित है?


नहीं।

क्योंकि उसके अधिकांश प्रांतीय सदस्य ब्रिटिश सरकार द्वारा मनोनीत नहीं किए गए थे।

वे प्रांतीय विधानसभाओं के सदस्यों द्वारा चुने गए थे।

भारत की संसद भी स्पष्ट रूप से संविधान सभा के सदस्यों के अप्रत्यक्ष निर्वाचन का उल्लेख करती है।

इसलिए “ब्रिटिश सरकार द्वारा मनोनीत संविधान सभा” कहना तथ्यात्मक रूप से गलत होगा।

हां, यह कहना सही है कि-

उसकी स्थापना की संवैधानिक मशीनरी ब्रिटिश सरकार की योजना के अंतर्गत बनी थी।

दोनों बातों में बहुत बड़ा अंतर है।

18. क्या इसे सीधे जनता की संप्रभु सभा कहा जा सकता है?


यह भी सावधानी से कहना होगा।

1946 में इसे सीधे सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार से चुनी गई जनता की संप्रभु सभा कहना उचित नहीं होगा।

क्योंकि-
जनता ने संविधान सभा के सदस्यों को सीधे नहीं चुना था;
प्रांतीय विधानसभाएं सीमित मताधिकार से चुनी गई थीं;
रियासतों के प्रतिनिधियों की चयन प्रक्रिया अलग थी;
मुस्लिम लीग की अनुपस्थिति ने प्रारंभिक प्रतिनिधित्व को प्रभावित किया;
विभाजन के बाद सभा की संरचना बदल गई।

इसलिए “प्रत्यक्ष जनादेश” की आधुनिक अवधारणा के अर्थ में संविधान सभा पूर्णतः प्रतिनिधि नहीं थी।

19. फिर संविधान सभा की महानता क्या थी?


यह प्रश्न सबसे महत्वपूर्ण है।

यदि संविधान सभा प्रत्यक्ष सार्वभौमिक मताधिकार से नहीं चुनी गई थी, तो फिर उसका ऐतिहासिक महत्व इतना बड़ा क्यों है?

उत्तर है-उसके कार्य में।

संविधान सभा ने केवल ब्रिटिश सरकार द्वारा दिए गए किसी तैयार संविधान को स्वीकार नहीं किया।

उसने-
मौलिक अधिकारों पर विचार किया,
संघ और राज्यों के संबंधों पर बहस की,
स्वतंत्र न्यायपालिका की व्यवस्था की,
संसदीय शासन प्रणाली पर विचार किया,
अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर विमर्श किया,
नागरिक स्वतंत्रता पर विचार किया,
निर्वाचन व्यवस्था बनाई,
केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों का विभाजन किया,
स्वतंत्र संवैधानिक संस्थाओं की कल्पना की,
और अंततः भारत को एक लोकतांत्रिक गणराज्य के रूप में स्थापित करने का संवैधानिक ढांचा तैयार किया।

अर्थात् उसकी ऐतिहासिक उपलब्धि केवल उसके निर्वाचन की प्रक्रिया में नहीं, बल्कि उसके द्वारा निर्मित संवैधानिक दर्शन और संस्थागत व्यवस्था में है।

20. उद्देश्य प्रस्ताव और संविधान की दिशा


13 दिसंबर 1946 को जवाहरलाल नेहरू ने संविधान सभा में उद्देश्य प्रस्ताव रखा।

इस प्रस्ताव में स्वतंत्र भारत की संप्रभुता, लोकतांत्रिक शासन, न्याय, स्वतंत्रता और समानता जैसे मूल विचारों को दिशा दी गई।

बाद में यही वैचारिक आधार संविधान की प्रस्तावना में अधिक विकसित रूप में दिखाई देता है।

इससे पता चलता है कि संविधान सभा धीरे-धीरे केवल ब्रिटिश योजना के तहत बनाई गई संस्था नहीं रह गई थी।

वह अपनी वैचारिक दिशा स्वयं निर्धारित करने लगी थी।

21. संविधान सभा में बहस की प्रकृति


संविधान निर्माण का काम किसी एक व्यक्ति या दल ने नहीं किया।

सभा में अनेक मुद्दों पर गहरी बहस हुई।

कभी एक मत प्रबल हुआ, कभी दूसरा।

कई प्रस्ताव बदले गए।

समितियां बनाई गईं।

रिपोर्टें आईं।

उन पर चर्चा हुई।

संशोधन प्रस्ताव आए।

इस प्रकार संविधान एक लंबे राजनीतिक-संवैधानिक विमर्श से होकर अस्तित्व में आया।

यही कारण है कि संविधान सभा को केवल “कांग्रेस की सभा” कहना भी उसके वास्तविक बौद्धिक और राजनीतिक योगदान को छोटा कर देता है।

यह जरूर है कि कांग्रेस का उसमें निर्णायक राजनीतिक प्रभुत्व था।

लेकिन कांग्रेस के भीतर भी विभिन्न विचारधाराएं और दृष्टिकोण मौजूद थे।

22. प्रतिनिधिकता का सबसे बड़ा प्रश्न-जनता बनाम प्रतिनिधि


यहां एक मूलभूत लोकतांत्रिक प्रश्न सामने आता है।

लोकतंत्र में प्रतिनिधित्व के दो अलग-अलग अर्थ हो सकते हैं-

पहला-प्रत्यक्ष निर्वाचन आधारित प्रतिनिधित्व।

दूसरा-राजनीतिक, सामाजिक और संस्थागत प्रतिनिधित्व।

संविधान सभा पहले अर्थ में सीमित थी।

लेकिन दूसरे अर्थ में उसकी प्रतिनिधिकता काफी व्यापक थी।

यही कारण है कि संविधान सभा के बारे में एक संतुलित निष्कर्ष आवश्यक है।

23. किन अर्थों में संविधान सभा प्रतिनिधि थी?


संविधान सभा को निम्न अर्थों में प्रतिनिधि कहा जा सकता है-

पहला, उसके अधिकांश प्रांतीय सदस्य निर्वाचित प्रांतीय विधानसभाओं के माध्यम से आए।

दूसरा, सीटों का वितरण जनसंख्या के आधार पर करने का प्रयास किया गया।

तीसरा, विभिन्न समुदायों को प्रतिनिधित्व देने की व्यवस्था की गई।

चौथा, देशी रियासतों के लिए भी प्रतिनिधित्व रखा गया।

पांचवां, स्वतंत्रता के बाद सभा ने भारतीय संप्रभुता के आधार पर संविधान निर्माण का कार्य किया।

छठा, सभा में भारत के विभिन्न क्षेत्रों और राजनीतिक धाराओं के अनेक महत्वपूर्ण व्यक्तित्व उपस्थित थे।

24. किन अर्थों में वह प्रतिनिधि नहीं थी?


दूसरी ओर-

पहला, वह सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार से सीधे निर्वाचित नहीं थी।

दूसरा, तत्कालीन प्रांतीय विधानसभाएं भी सीमित मताधिकार पर आधारित थीं।

तीसरा, देशी रियासतों के प्रतिनिधियों का चयन जनता के प्रत्यक्ष मतदान से नहीं हुआ।

चौथा, मुस्लिम लीग की शुरुआती अनुपस्थिति के कारण अविभाजित भारत की पूर्ण राजनीतिक सहमति सभा में मौजूद नहीं थी।

पांचवां, संविधान सभा का मूल गठन ब्रिटिश सरकार की कैबिनेट मिशन योजना के अंतर्गत हुआ था।

छठा, उसका प्रारंभिक स्वरूप औपनिवेशिक भारत की राजनीतिक-संवैधानिक संरचना से जुड़ा हुआ था।

इन सीमाओं को स्वीकार किए बिना संविधान सभा का निष्पक्ष इतिहास नहीं लिखा जा सकता।

25. एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक विरोधाभास


संविधान सभा का सबसे बड़ा ऐतिहासिक विरोधाभास यही है कि-

जिस सभा को सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार से नहीं चुना गया था, उसी सभा ने सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार पर आधारित लोकतांत्रिक गणराज्य की नींव रखी।

यह भारतीय संविधान निर्माण की असाधारण ऐतिहासिक घटना है।

सभा स्वयं उस लोकतांत्रिक आदर्श का पूर्ण परिणाम नहीं थी जिसे उसने भारत के लिए स्थापित किया।

लेकिन उसने भविष्य के भारत को उस आदर्श पर चलने का संवैधानिक मार्ग दिया।

26. इसलिए संविधान सभा को कैसे परिभाषित करें?


संविधान सभा को तीन शब्दों में परिभाषित किया जा सकता है-

अप्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित, संक्रमणकालीन और अंततः संप्रभु।

अप्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित-क्योंकि उसके प्रांतीय प्रतिनिधियों को जनता ने सीधे नहीं चुना।

संक्रमणकालीन-क्योंकि उसका गठन औपनिवेशिक शासन से स्वतंत्र शासन में परिवर्तन के समय हुआ।

अंततः संप्रभु-क्योंकि स्वतंत्रता के बाद उसने स्वतंत्र भारत के संविधान का निर्माण किया।

27. अंतिम निष्कर्ष


संविधान सभा के इतिहास का मूल्यांकन भावनात्मक नारों से नहीं, बल्कि ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर होना चाहिए।

यदि कोई कहे कि संविधान सभा भारत की जनता द्वारा सीधे सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार से चुनी गई थी, तो यह तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा।

यदि कोई कहे कि संविधान सभा केवल वायसराय की मनोनीत संस्था थी और उसमें भारतीय प्रतिनिधित्व का कोई आधार नहीं था, तो यह भी गलत होगा।

सच्चाई दोनों के बीच है।

संविधान सभा का गठन ब्रिटिश सरकार की कैबिनेट मिशन योजना के अंतर्गत हुआ। उसके प्रांतीय सदस्य तत्कालीन प्रांतीय विधानसभाओं द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से चुने गए। देशी रियासतों को अलग से प्रतिनिधित्व दिया गया। मुस्लिम लीग के बहिष्कार और सीमित मताधिकार के कारण उसकी प्रारंभिक प्रतिनिधिकता की स्पष्ट सीमाएं थीं।

लेकिन स्वतंत्रता के बाद परिस्थितियां बदल गईं। संविधान सभा ने स्वयं को स्वतंत्र भारत के संविधान निर्माण की केंद्रीय संस्था के रूप में स्थापित किया। उसने लगभग तीन वर्षों तक गहन बहस और समितियों के माध्यम से संविधान तैयार किया। संसद के आधिकारिक अभिलेख के अनुसार उसकी कार्यवाही 165 दिनों तक चली और 114 दिन संविधान के प्रारूप पर विचार में लगाए गए।

इसलिए संविधान सभा को “पूर्ण प्रत्यक्ष जनप्रतिनिधि सभा” कहना उचित नहीं होगा; लेकिन उसे “भारत के संविधान निर्माण की प्रतिनिधिक और ऐतिहासिक रूप से वैध संस्था” कहना उचित है।

उसकी प्रतिनिधिकता का मूल्यांकन करते समय यह भी ध्यान रखना चाहिए कि किसी संस्था की लोकतांत्रिक वैधता केवल उसके जन्म की प्रक्रिया से नहीं, बल्कि उसके कार्य, विचार-विमर्श, राजनीतिक सहमति और अंततः जनता द्वारा स्वीकार किए गए संवैधानिक ढांचे से भी निर्मित होती है।

भारतीय संविधान सभा की सबसे बड़ी ऐतिहासिक उपलब्धि यही थी कि उसने औपनिवेशिक सत्ता से प्राप्त एक सीमित संवैधानिक अवसर को आगे बढ़ाकर स्वतंत्र, संप्रभु, लोकतांत्रिक और गणतांत्रिक भारत के संविधान में परिवर्तित कर दिया।

इसलिए संविधान सभा पर अंतिम निर्णय शायद यही होना चाहिए-

वह आज के अर्थों में प्रत्यक्ष सार्वभौमिक जनसभा नहीं थी, लेकिन वह भारत के आधुनिक लोकतांत्रिक गणराज्य की संवैधानिक जननी अवश्य थी।

और शायद यही उसके इतिहास का सबसे संतुलित मूल्यांकन है।

लेखक अधिवक्ता लक्ष्मण पाण्डेय
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