श्रीकृष्ण जन्माष्टमी जीवन जीना सिखाता
सत्येंद्र कुमार पाठक
भारत त्योहारों का देश है। हर त्योहार कुछ न कुछ संदेश देता है। पर श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का संदेश सबसे अलग है। यह सिर्फ एक भगवान के जन्म का दिन नहीं है, यह एक विचार के जन्म का दिन है। भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को, आधी रात को, रोहिणी नक्षत्र में जब कंस के कारागार में श्रीकृष्ण का जन्म हुआ, तब सिर्फ एक बालक नहीं जन्मा, बल्कि अन्याय के विरुद्ध न्याय की उम्मीद जन्मी।
जब-जब धरती पर पाप बढ़ता है, तब-तब भगवान किसी न किसी रूप में आते हैं। कंस, पूतना, कालिया नाग, ये सिर्फ राक्षस नहीं थे, ये आज के भ्रष्टाचार, लालच और अहंकार के प्रतीक हैं। श्रीकृष्ण ने बचपन में ही इनका वध करके यह सिखाया कि अन्याय कितना भी बड़ा क्यों न हो, सत्य के सामने छोटा ही होता है। जन्माष्टमी हमें डरना नहीं, लड़ना सिखाती है।
श्रीकृष्ण के जीवन का सबसे बड़ा अवदान है - श्रीमद्भगवद्गीता। महाभारत के युद्ध में जब अर्जुन ने हथियार रख दिए और कहा - "मैं अपनों से नहीं लडूंगा", तब श्रीकृष्ण ने जो उपदेश दिया, वही गीता है। गीता में सिर्फ 700 श्लोक हैं, पर उनमें पूरी जिंदगी का सार है।
कर्म करो, फल की चिंता मत करो।* मतलब - पढ़ाई करो, नंबर की टेंशन मत लो। अच्छा काम करो, तारीफ की उम्मीद मत रखो।
परिवर्तन ही संसार का नियम है।* सुख-दुख आते जाते रहेंगे, घबराना नहीं। मन ही बंधन और मुक्ति का कारण है।*
आज अमेरिका, जापान, जर्मनी के बड़े-बड़े कॉलेजों में गीता पढ़ाई जाती है। मैनेजमेंट के छात्र गीता से लीडरशिप सीखते हैं। यह जन्माष्टमी का ही तो अवदान है।
जन्माष्टमी भारत को एक साथ बांधती है। मथुरा-वृंदावन में झांकियां निकलती हैं।महाराष्ट्र में दही-हांडी फोड़ी जाती है, जिसमें सैकड़ों युवक एक साथ मिलकर पिरामिड बनाते हैं। यह टीम वर्क सिखाती है। दक्षिण भारत में कोलम और भजन होते हैं।
- बंगाल में कीर्तन होता है। एक ही कृष्ण, कितने रूपों में पूजा जाता है - बाल गोपाल, माखन चोर, रणछोड़, द्वारकाधीश। यह हमें सिखाता है कि अनेकता में एकता ही भारत की ताकत है।
श्रीकृष्ण बालकों के सबसे प्यारे भगवान हैं। वे माखन चुराते हैं, गाय चराते हैं, बांसुरी बजाते हैं, दोस्तों के साथ खेलते हैं। इसलिए हर बच्चा खुद को कृष्ण से जोड़ लेता है।
जन्माष्टमी पर जब घरों में झूला सजता है, बाल कृष्ण को झुलाया जाता है, तो बच्चे में प्रेम, वात्सल्य और भक्ति का भाव आता है। वह सीखता है कि भगवान डराने वाले नहीं, प्यार करने वाले हैं।
श्रीकृष्ण ने जात-पात को कभी नहीं माना। उन्होंने विदुर के घर साग खाया, सुदामा जैसे गरीब मित्र को गले लगाया, और गोपियों के साथ समान व्यवहार किया। उनका प्रेम संदेश था - सब समान हैं। उन्होंने स्त्रियों का सम्मान सिखाया। द्रौपदी की लाज बचाई, 16100 स्त्रियों को द्वारका में सम्मान दिया। आज के समय में जब नारी सुरक्षा की बात होती है, तो श्रीकृष्ण का यही रूप प्रेरणा देता है।, जन्माष्टमी सिर्फ मटकी फोड़ना, व्रत रखना और प्रसाद खाना नहीं है। यह एक संकल्प का दिन है।
इस जन्माष्टमी पर संकल्प लेने मे मैं सच्चाई का साथ दूंगा, जैसे भगवान कृष्ण ने दिया है। मैं अपना कर्म ईमानदारी से करूंगा, फल की चिंता नहीं करूंगा। मैं सबके साथ मित्रता रखूंगा, जैसे कृष्ण सुदामा के साथ रखते थे।
भगवान कृष्ण ने सिखाया है - जीवन एक खेल है, इसे हँसते हुए खेलो, रोते हुए नहीं। बांसुरी बजाते हुए जियो, हथियार उठाते हुए नहीं, पर जब धर्म पर बात आए तो सुदर्शन चक्र उठाने से भी मत डरो।हाथी घोड़ा पालकी, जय कन्हैया लाल की!
हमारे खबरों को शेयर करना न भूलें| हमारे फेसबुक पेज से जुड़े https://www.facebook.com/divyarashmimag हमारे यूटूब चैनल से अवश्य जुड़ें https://www.youtube.com/divyarashminews हमें ट्विटर पर फॉलो करे :- https://x.com/DivyaRashmi8


0 टिप्पणियाँ
दिव्य रश्मि की खबरों को प्राप्त करने के लिए हमारे खबरों को लाइक ओर पोर्टल को सब्सक्राइब करना ना भूले| दिव्य रश्मि समाचार यूट्यूब पर हमारे चैनल Divya Rashmi News को लाईक करें |
खबरों के लिए एवं जुड़ने के लिए सम्पर्क करें contact@divyarashmi.com
#NEWS,
#hindinews