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लिङ्गपुराणानुसार भगवान शिव के पंचमुखी स्वरूप का वर्णन

लिङ्गपुराणानुसार भगवान शिव के पंचमुखी स्वरूप का वर्णन

लेखक आनंद हठिला
भगवान शिव का पंचमुखी स्वरूप केवल एक दिव्य मूर्ति नहीं, बल्कि सम्पूर्ण सृष्टि के पाँच महान कार्यों—सृष्टि, स्थिति, संहार, तिरोभाव (माया द्वारा आवरण) और अनुग्रह (मोक्ष प्रदान करना)—का प्रतीक है। लिङ्गपुराण, शिवपुराण, आगम एवं तन्त्र ग्रन्थों में शिव के इन पाँच मुखों का अत्यन्त गूढ़ वर्णन मिलता है।


इन पाँच मुखों के नाम हैं
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1. सद्योजात
2. वामदेव
3. अघोर
4. तत्पुरुष
5. ईशान


लिङ्गपुराण में भगवान शिव स्वयं अपने पंचब्रह्म स्वरूप का वर्णन करते हुए कहते हैं कि वे पाँच मुखों से सम्पूर्ण जगत का संचालन करते हैं।


सद्योजातं वामदेवं अघोरं तत्पुरुषम्।
ईशानं च महादेवं पञ्चवक्त्रं नमाम्यहम्॥


मैं उन पंचमुख महादेव को प्रणाम करता हूँ जिनके पाँच मुख—सद्योजात, वामदेव, अघोर, तत्पुरुष और ईशान—समस्त जगत के कारण हैं।


1👉🏻 सद्योजात मुख:


दिशा : पश्चिम
रंग : श्वेत
कार्य : सृष्टि


"सद्योजात" अर्थात् जो अभी-अभी प्रकट हुए।


यही मुख सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की रचना करता है। ब्रह्माजी को सृष्टि की शक्ति भी इसी मुख से प्राप्त होती है।


सद्योजातं प्रपद्यामि।
सद्योजाताय वै नमः।
भवे भवे नातिभवे।
भवस्व माम्।
भवोद्भवाय नमः॥


हे सद्योजात! मैं आपकी शरण ग्रहण करता हूँ। जन्म-मृत्यु के चक्र से मेरी रक्षा करें।


2👉🏻 वामदेव मुख:


दिशा : उत्तर
रंग : रक्त या अरुण
कार्य : पालन


वामदेव शिव का अत्यन्त सौम्य स्वरूप है।


यही करुणा, प्रेम, सौन्दर्य तथा पालन का स्वरूप है। विष्णु में स्थित पालन शक्ति इसी मुख से प्रकट होती है।


वामदेवाय नमो ज्येष्ठाय नमः श्रेष्ठाय नमो रुद्राय नमः।
कालाय नमः कलविकरणाय नमो बलविकरणाय नमः॥


ज्येष्ठ, श्रेष्ठ, रुद्र, कालस्वरूप तथा समस्त शक्तियों के स्वामी वामदेव को नमस्कार।


3👉🏻 अघोर मुख:


दिशा : दक्षिण
रंग : नील अथवा श्याम


कार्य : संहार


अघोर का अर्थ है—जो घोर नहीं है।


यद्यपि यह मुख संहार करता है, किन्तु उसका उद्देश्य विनाश नहीं बल्कि नये सृजन का मार्ग प्रशस्त करना है।


अघोरेभ्योऽथ घोरेभ्यो घोरघोरतरेभ्यः।
सर्वेभ्यः सर्वशर्वेभ्यो नमस्ते रुद्ररूपेभ्यः॥


हे रुद्र! आपके समस्त अघोर, घोर एवं अति घोर स्वरूपों को मेरा प्रणाम।


4👉🏻 तत्पुरुष मुख:


दिशा : पूर्व
रंग : स्वर्णिम


कार्य : तिरोभाव (माया)


यह मुख जीव को संसार में कर्म करने का अवसर देता है।


योग, तप, ध्यान एवं आध्यात्मिक जागरण का सम्बन्ध इसी मुख से माना गया है।


तत्पुरुषाय विद्महे।
महादेवाय धीमहि।
तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्॥


हम उस महादेव का ध्यान करते हैं। वे हमारी बुद्धि को धर्ममार्ग में प्रेरित करें।


5👉🏻 ईशान मुख:


दिशा : ऊपर (ऊर्ध्व)


रंग : स्फटिक समान उज्ज्वल


कार्य : अनुग्रह एवं मोक्ष


यह शिव का सर्वोच्च स्वरूप है।


यही समस्त वेदों, ज्ञान, योग, ब्रह्मविद्या और मोक्ष का अधिष्ठाता है।


ईशानः सर्वविद्यानाम्।
ईश्वरः सर्वभूतानाम्।
ब्रह्माधिपतिर्ब्रह्मणोऽधिपति।
ब्रह्मा शिवो मे अस्तु सदाशिवोम्॥


ईशान समस्त विद्याओं के स्वामी हैं, सभी प्राणियों के ईश्वर हैं। वे ही ब्रह्मा के भी अधिपति हैं। वे सदाशिव मेरे कल्याण का कारण बनें।


पंचमुख और पंचकृत्य:


भगवान शिव के पाँच मुख पाँच दिव्य कार्यों का प्रतिनिधित्व करते हैं—


- सद्योजात — सृष्टि
- वामदेव — पालन
- अघोर — संहार
- तत्पुरुष — तिरोभाव (माया द्वारा आवरण)
- ईशान — अनुग्रह एवं मोक्ष


इन्हीं पाँच कार्यों के कारण शिव को पञ्चकृत्यकर्ता कहा गया है।


लिङ्गपुराण और शैव आगमों के अनुसार पंचमुख शिव केवल ब्रह्माण्ड में ही नहीं, बल्कि प्रत्येक साधक के भीतर भी विद्यमान हैं।


सद्योजात हमें नवीन आरम्भ की प्रेरणा देता है।
वामदेव करुणा और प्रेम का विकास करता है।
अघोर भय, पाप और अज्ञान का नाश करता है।
तत्पुरुष ध्यान एवं आत्मचिन्तन की ओर ले जाता है।
ईशान आत्मज्ञान और मोक्ष का द्वार खोलता है।


जब साधक पंचब्रह्म मन्त्रों का श्रद्धापूर्वक जप करता है, तो उसका अन्तःकरण क्रमशः शुद्ध होता है और वह शिवतत्त्व के निकट पहुँचता है।


भगवान शिव का पंचमुखी स्वरूप सम्पूर्ण सृष्टि के दिव्य रहस्य का सजीव प्रतीक है। लिङ्गपुराण के अनुसार शिव एक ही होते हुए भी पाँच मुखों के माध्यम से जगत की रचना, पालन, संहार, तिरोभाव और अनुग्रह का संचालन करते हैं। इनमें ईशान मुख सर्वोच्च माना गया है, क्योंकि वही जीव को आत्मज्ञान और मोक्ष प्रदान करता है। इस प्रकार पंचमुख महादेव केवल उपासना का विषय नहीं, बल्कि सम्पूर्ण वेदान्त और शैव दर्शन का सार भी हैं।
जय शिव
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