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आओ, अब दो से एक हो जाएँ

आओ, अब दो से एक हो जाएँ

कुमार महेंद्र
हृदय की धड़कन कहती है,
दूरी अब सहनी नहीं है।
तुम बिन मेरे जीवन की,
कोई और कहानी नहीं है।
विरह-वेदना के बीते क्षण,
आओ हँसकर आज भुलाएँ।
आओ, अब दो से एक हो जाएँ।।


तुम्हारी साँसों की सुगंध,
मेरी साँसों में बस जाए।
मुख पर बिखरी अलकों को,
देख समय भी थम-सा जाए।
नयन-नयन की मौन कथा को,
आओ मिलकर आज सुनाएँ।
आओ, अब दो से एक हो जाएँ।।


बाँहों के मधुर आलिंगन में,
सिमटे अपना यह संसार।
स्पर्श तुम्हारा पाकर तन-मन,
महके जैसे चंदन-हार।
धड़कन से धड़कन का संगम,
प्रेम-राग नया गुनगुनाएं।
आओ, अब दो से एक हो जाएँ।।


बनकर दर्पण एक-दूजे का,
रूप तुम्हारा मुझमें झलके।
मन-वीणा के मधुर स्वरों में,
प्रेम-सुधा बन हृदय से छलके।
बंधन सारे स्वयं पिघलें,
आओ अनंत में खो जाएँ।
आओ, अब दो से एक हो जाएँ।।


जीवन की हर धूप-छाँव में,
संग-संग हम चलते जाएँ।
सुख में मधुरिम गीत सुनाएं,
दुःख में भी मुस्काते जाएँ।
जन्म-जन्म के पावन बंधन,
आओ मिलकर आज निभाएँ।
आओ, अब दो से एक हो जाएँ।।


कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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