प्रजा, पृथ्वी और राष्ट्र संकट से घिरा: क्या प्रजातांत्रिक प्रहरी की चेतना में यह द्रष्टव्य नहीं?
हृदय नारायण झा
वर्ष 2026 का मध्यकाल मानव सभ्यता के लिए अनेक गंभीर प्रश्न लेकर उपस्थित हुआ है। ऐसा प्रतीत होता है कि प्रजा, पृथ्वी और राष्ट्र—तीनों अभूतपूर्व संकटों के दौर से गुजर रहे हैं। प्रकृति विश्वभर में अपना विकराल रूप दिखा रही है। कहीं अतिवृष्टि के कारण जलप्रलय है, कहीं बाढ़ से गांव के गांव कट रहे हैं। लाखों लोग विस्थापन, भूख और असुरक्षा का सामना कर रहे हैं। कहीं जंगलों की आग नगरों तक पहुंचने को आतुर है, तो कहीं भूकम्प धरती की अस्थिरता का भयावह संदेश दे रहा है। हाल के दिनों में विश्व के अनेक क्षेत्रों में प्राकृतिक आपदाओं ने यह स्पष्ट कर दिया है कि पृथ्वी का संतुलन गंभीर रूप से प्रभावित हो चुका है।
वायु का प्रकोप आंधी और तूफान के रूप में दिखाई देता है, जो वृक्षों से लेकर मजबूत निर्माणों तक को धराशायी कर देता है। किंतु इससे भी अधिक चिंताजनक वह अदृश्य संकट है, जो मनुष्य के भीतर पनप रहा है। काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और असूया जैसे विकार व्यक्ति, परिवार, समाज और राष्ट्र की चेतना को ग्रसित कर रहे हैं।
काम की स्वाभाविक और मर्यादित भावना अब अनेक स्थानों पर विकृत रूप धारण कर चुकी है। उसके परिणाम बलात्कार, यौन शोषण, छेड़छाड़, देह व्यापार और एकतरफा प्रेम से उपजी हिंसक घटनाओं के रूप में सामने आ रहे हैं। क्रोध सामाजिक जीवन का सामान्य व्यवहार बनता जा रहा है। छोटी-छोटी बातों पर विवाद, असहमति के प्रति असहिष्णुता, आलोचना को न सह पाने की प्रवृत्ति और सामाजिक भेदभाव से उपजा आक्रोश समाज को भीतर से तोड़ रहा है।
लोभ ने भ्रष्टाचार, अतिसंचय और असंतोष की ऐसी व्यवस्था खड़ी कर दी है, जिसमें अधिकतम लाभ ही सफलता का मानदंड बन गया है। मोह का प्रभाव इतना व्यापक है कि सत्ता की प्राप्ति और संरक्षण ही राजनीति का प्रमुख लक्ष्य बन गया है। परिणामस्वरूप प्रजा और पृथ्वी दोनों उपेक्षित हो गए हैं।
आज सत्ता का खेल सभी खेलों पर भारी पड़ता दिखाई देता है। सत्ता प्राप्त करने का संघर्ष, सत्ता बचाने के लिए समझौते, आगामी चुनावों की रणनीतियां और राजनीतिक समीकरण—इन्हीं में अधिकांश राजनीतिक ऊर्जा व्यय हो रही है। ऐसा लगता है कि शासन और राजनीति के पास प्रजा तथा पृथ्वी के लिए गंभीर चिंतन का समय ही नहीं बचा है।
वास्तव में प्रजा और पृथ्वी के लिए सोचना केवल योजनाओं की घोषणा करना नहीं है। इसका अर्थ है—सशक्त, संस्कारित और सक्षम समाज का निर्माण करना। इसका अर्थ है—ऐसी पीढ़ी तैयार करना जो नैतिक मूल्यों, कर्तव्यबोध और सामाजिक उत्तरदायित्व से युक्त हो। पृथ्वी की रक्षा का अर्थ है पर्यावरण संरक्षण की उन परंपराओं को पुनर्जीवित करना, जिनके आधार पर भारतीय सभ्यता ने सदियों तक प्रकृति के साथ संतुलन बनाए रखा।
दुर्भाग्यवश आज यह सिद्धांत और व्यवहार दोनों ही सार्वजनिक जीवन से लुप्त होते जा रहे हैं। सत्ता मुखर है, परंतु समाज मौन होता जा रहा है। योग्यता, कौशल, ज्ञान और विद्वता की अपेक्षा राजनीतिक समीकरणों को प्राथमिकता दी जा रही है। मंत्रिपरिषदों, समितियों, आयोगों तथा विभिन्न संस्थाओं में अनेक नियुक्तियां क्षमता के बजाय सुविधा और अनुकूलता के आधार पर होती दिखाई देती हैं। इसका परिणाम नीति और अर्थव्यवस्था की अनियोजित दिशा के रूप में सामने आता है।
लोकतांत्रिक शासन का मूल उद्देश्य अधिकतम सामाजिक कल्याण होना चाहिए। सार्वजनिक वित्त का भी अंतिम लक्ष्य यही है कि समाज के प्रत्येक वर्ग तक विकास और अवसरों का लाभ पहुंचे। किंतु सत्ता के खेल में सार्वजनिक वित्त का स्वरूप धीरे-धीरे सत्तायी वित्त में परिवर्तित होता प्रतीत हो रहा है। योजनाएं बनती हैं, बजट आवंटित होते हैं, प्रशासनिक ढांचे गांव तक स्थापित किए जाते हैं, किंतु यह प्रश्न अक्सर अनुत्तरित रह जाता है कि इन योजनाओं से अधिकतम सामाजिक लाभ वास्तव में किस प्रकार सुनिश्चित होगा।
सार्वजनिक वित्त का सिद्धांत कहता है कि प्राथमिकताओं का वैज्ञानिक निर्धारण और उनका प्रभावी क्रियान्वयन ही लक्ष्य प्राप्ति का आधार है। इसके लिए व्यापक अध्ययन, जनआकांक्षाओं की समझ और स्थानीय परिस्थितियों का विश्लेषण आवश्यक है। प्रत्येक क्षेत्र की सामाजिक संरचना, आर्थिक प्रकृति और सांस्कृतिक आवश्यकताओं के अनुरूप योजनाओं का निर्माण और क्रियान्वयन ही वास्तविक सामाजिक कल्याण का मार्ग प्रशस्त कर सकता है।
आज आवश्यकता केवल आर्थिक विकास की नहीं, बल्कि समग्र विकास की है—ऐसे विकास की जिसमें मनुष्य, समाज और प्रकृति तीनों का संतुलन सुरक्षित रहे। वर्तमान परिस्थितियों में यही सबसे बड़ा राष्ट्रीय विमर्श होना चाहिए।
इसी संदर्भ में प्रसिद्ध हास्य कवि पद्मश्री सुरेन्द्र शर्मा द्वारा सामाजिक संवेदनहीनता पर किया गया व्यंग्य स्मरणीय है। उनका संकेत उस व्यवस्था की ओर था जो देखती कम है, सुनती कम है और जनता की पीड़ा पर बोलती भी कम है। लोकतंत्र केवल चुनावों का नाम नहीं है; वह जनता की आकांक्षाओं, संवेदनाओं और भविष्य की रक्षा का दायित्व भी है।
आज देश, काल और परिस्थिति की अव्यक्त पुकार स्पष्ट सुनाई दे रही है। यह पुकार सत्ता और शासन से कह रही है—
पहले प्रजा को बचाइए, पृथ्वी को बचाइए और राष्ट्र को सुदृढ़ कीजिए।
जब नागरिक सुरक्षित होंगे, जब प्रकृति संतुलित होगी और जब राष्ट्र आंतरिक रूप से सशक्त होगा, तभी भारत विश्व को दिशा देने की भूमिका में प्रभावी ढंग से आगे बढ़ सकेगा। विश्वगुरु बनने की आकांक्षा तभी सार्थक होगी, जब उसकी नींव प्रजा के कल्याण, पृथ्वी के संरक्षण और राष्ट्र की समग्र उन्नति पर आधारित होगी।यह लेख "दिव्य रश्मि" पत्रिका के सम्पादकीय स्तम्भ के अनुरूप अधिक साहित्यिक, वैचारिक और प्रभावशाली शैली में तैयार किया गया है।
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