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नेता या महाराजा? लोकतंत्र के बदलते चेहरे पर एक कटु टिप्पणी

नेता या महाराजा? लोकतंत्र के बदलते चेहरे पर एक कटु टिप्पणी

डॉ. राकेश दत्त मिश्र

लोकतंत्र की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि यहाँ जनता राजा होती है, लेकिन चुनाव समाप्त होते ही राजा फिर प्रजा बन जाती है और प्रजा से वोट लेकर सत्ता तक पहुँचा व्यक्ति स्वयं को राजा समझने लगता है। संविधान ने जनप्रतिनिधि बनाए थे, लेकिन राजनीति ने उन्हें "नेता जी", "माननीय", "जननायक", "लोकप्रिय नेता", "विकास पुरुष", "विश्व नेता" और न जाने कितनी उपाधियों से नवाज दिया। परिणाम यह हुआ कि लोकतंत्र में सेवक बनने आए लोग स्वयं को शासक समझने लगे।

एक समय था जब राजनीति सेवा का माध्यम मानी जाती थी। आज राजनीति सेवा नहीं, बल्कि करियर, व्यवसाय और कई मामलों में उद्योग बन चुकी है। पहले नेता जनता के बीच पहचान बनाते थे, आज जनता को पहचानने के लिए नेताओं को सुरक्षा कर्मियों से अनुमति लेनी पड़ती है। पहले नेता जनता के घर जाते थे, आज जनता नेता के बंगले के बाहर घंटों खड़ी रहती है।

राजनीति में विनम्रता कभी सबसे बड़ा गुण माना जाता था। आज विनम्रता को कमजोरी और अहंकार को नेतृत्व क्षमता समझ लिया गया है। जो जितना अधिक अभिमानी है, वह उतना बड़ा नेता माना जाता है। जो जितना अधिक जनता से दूर है, उसकी प्रतिष्ठा उतनी ही ऊँची समझी जाती है। ऐसा लगता है जैसे राजनीति में सफलता का नया सूत्र बन गया है—जनता से दूरी और प्रचार से नजदीकी।

आजकल नेता जनता के बीच कम और कैमरों के बीच अधिक दिखाई देते हैं। उनके लिए वास्तविकता से अधिक महत्वपूर्ण छवि है। सड़क पर गड्ढा हो या अस्पताल में दवा न हो, विद्यालय में शिक्षक न हों या युवाओं को रोजगार न मिले—इन सब समस्याओं का समाधान प्रशासन नहीं, बल्कि सोशल मीडिया की पोस्ट और प्रेस विज्ञप्तियाँ बन गई हैं।

यदि किसी नेता के क्षेत्र में पुल टूट जाए तो पहले उसकी मरम्मत होती थी। अब पहले फोटोशूट होता है। यदि कहीं बाढ़ आ जाए तो पहले राहत सामग्री पहुँचती थी, अब पहले ड्रोन कैमरा पहुँचता है। यदि कहीं दुर्घटना हो जाए तो पहले सहायता पहुँचती थी, अब पहले ट्वीट पहुँचता है।

राजनीति का एक नया सिद्धांत विकसित हुआ है—काम कम, प्रचार अधिक।

आज देश की लगभग हर राजनीतिक पार्टी अपने भीतर लोकतंत्र की बात करती है, लेकिन अधिकांश दलों की आंतरिक संरचना किसी राजशाही से कम नहीं दिखाई देती। पदाधिकारी चुने नहीं जाते, घोषित किए जाते हैं। विचार-विमर्श कम होता है, आदेश अधिक होते हैं। कार्यकर्ताओं से सुझाव कम लिए जाते हैं, नारे अधिक लगवाए जाते हैं।

कभी राजनीतिक दल विचारधारा से पहचाने जाते थे। आज अधिकांश दल व्यक्तियों से पहचाने जाते हैं। दल का संविधान, सिद्धांत और घोषणापत्र पीछे छूट गया है। नेता ही दल है और दल ही नेता।

लोकतंत्र में आलोचना को शक्ति माना जाता है। लेकिन आज स्थिति यह है कि यदि कोई कार्यकर्ता प्रश्न पूछ दे तो उसे अनुशासनहीन घोषित कर दिया जाता है। यदि कोई पत्रकार सवाल पूछ दे तो उसे विपक्षी एजेंट बता दिया जाता है। यदि कोई नागरिक असहमति प्रकट कर दे तो उसे राष्ट्रविरोधी, समाजविरोधी या विकास विरोधी बताने में देर नहीं लगती।

ऐसा लगता है कि राजनीति का नया आदर्श वाक्य बन गया है—"हमारी प्रशंसा करो तो राष्ट्रभक्त, प्रश्न पूछो तो संदिग्ध।"

भारतीय राजनीति का सबसे बड़ा संकट विचारों का नहीं, बल्कि चरित्र का संकट है। देश में प्रतिभाशाली लोगों की कमी नहीं है। ईमानदार लोगों की भी कमी नहीं है। कमी है तो ऐसे नेतृत्व की जो सत्ता को साधन समझे, साध्य नहीं।

आज चुनाव आते ही नेता अचानक गरीबों के शुभचिंतक बन जाते हैं। पाँच वर्षों तक जिन गलियों में कदम नहीं रखा, वहाँ जाकर हाथ जोड़ते हैं। जिन युवाओं की बेरोजगारी पर मौन रहे, उन्हें भविष्य के सपने दिखाते हैं। जिन किसानों की समस्याएँ वर्षों तक नहीं सुनीं, उनके खेतों में फोटो खिंचवाते हैं। जिन बुजुर्गों को कभी समय नहीं दिया, उनके चरण स्पर्श करते हैं।

चुनाव समाप्त होते ही यह विनम्रता भी समाप्त हो जाती है।

राजनीति में जाति, धर्म और क्षेत्रीय भावनाओं का उपयोग नया नहीं है, लेकिन आज यह लोकतांत्रिक विमर्श का स्थायी हिस्सा बन चुका है। विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण, रोजगार और सुशासन जैसे विषय पीछे चले गए हैं। उनकी जगह जातीय समीकरणों, धार्मिक ध्रुवीकरण और चुनावी गणित ने ले ली है।

मतदाता अब नागरिक कम और वोट बैंक अधिक दिखाई देता है।

सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि राजनीतिक दल जनता को जागरूक नहीं, बल्कि भावनात्मक बनाए रखना चाहते हैं। जागरूक नागरिक प्रश्न पूछेगा, हिसाब माँगेगा और जवाबदेही तय करेगा। भावनात्मक नागरिक केवल नारे लगाएगा और तालियाँ बजाएगा।

इसलिए आज प्रश्न यह नहीं है कि कौन-सा दल सत्ता में है और कौन-सा विपक्ष में। प्रश्न यह है कि क्या राजनीति अपने मूल उद्देश्य से भटक चुकी है?

लोकतंत्र की आत्मा सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि जवाबदेही है। यदि सत्ता बदल जाए और व्यवस्था न बदले तो लोकतंत्र केवल चुनावी उत्सव बनकर रह जाता है।

दुर्भाग्य से आज राजनीति में विचारधारा से अधिक महत्व प्रबंधन को मिल रहा है। नेता का मूल्यांकन उसके चरित्र से नहीं, बल्कि उसकी मीडिया टीम की क्षमता से किया जा रहा है। भाषण की गुणवत्ता से अधिक महत्व उसके वायरल होने को दिया जा रहा है। जनसेवा से अधिक महत्व जनसंपर्क को मिल रहा है।

इतिहास हमें बताता है कि सत्ता कभी स्थायी नहीं होती। जिन साम्राज्यों के सामने दुनिया झुकती थी, वे आज इतिहास की पुस्तकों में सिमट गए हैं। जिन शासकों को स्वयं पर असीम विश्वास था, वे समय के साथ विस्मृति में खो गए।

लेकिन जनता आज भी जीवित है।

जनता कभी-कभी देर से निर्णय लेती है, लेकिन गलत निर्णय को हमेशा के लिए स्वीकार नहीं करती। लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति चुनाव आयोग, संसद या सरकार में नहीं, बल्कि उस मतदाता में है जो पाँच वर्षों के बाद नेता से प्रश्न पूछ सकता है।

समाज को ऐसे नेताओं की आवश्यकता है जो भीड़ नहीं, विश्वास अर्जित करें; जो समर्थकों की सेना नहीं, जागरूक नागरिक तैयार करें; जो अपने लिए जयकारे नहीं, राष्ट्र के लिए चरित्र निर्माण करें।

नेता का अर्थ सत्ता नहीं, जिम्मेदारी है। नेता का अर्थ विशेषाधिकार नहीं, त्याग है। नेता का अर्थ प्रचार नहीं, सेवा है।

जब तक राजनीति इस मूल सत्य को नहीं समझेगी, तब तक लोकतंत्र का उत्सव चलता रहेगा, लेकिन लोकतंत्र की आत्मा घायल होती रहेगी।

आज आवश्यकता किसी नए नारे की नहीं, बल्कि नए चरित्र की है। देश को ऐसे नेताओं की आवश्यकता है जो स्वयं को जनता से बड़ा न समझें, जो पद को प्रतिष्ठा नहीं बल्कि उत्तरदायित्व मानें, जो आलोचना को शत्रुता नहीं बल्कि सुधार का अवसर समझें और जो सत्ता के शिखर पर पहुँचकर भी अपने भीतर के सेवक को जीवित रख सकें।

अन्यथा लोकतंत्र का भविष्य उन नेताओं के हाथों में नहीं रहेगा जो जनता को दिशा देते हैं, बल्कि उन लोगों के हाथों में चला जाएगा जो जनता की भावनाओं का प्रबंधन करना जानते हैं।

और जिस दिन लोकतंत्र में नेता सेवक के स्थान पर महाराजा बन जाएगा, उस दिन संविधान भले सुरक्षित दिखे, लोकतंत्र की आत्मा संकट में पड़ जाएगी।
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