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"सृजन का अक्षय स्रोत"

"सृजन का अक्षय स्रोत"

पंकज शर्मा
प्रिय मित्रों रचनात्मकता मनुष्य की चेतना में प्रवाहित वह दिव्य धारा है, जो जितनी अधिक बहती है, उतनी ही अधिक निर्मल एवं प्रबल होती जाती है। यह कोई सीमित संपदा नहीं कि जिसके उपयोग से उसका क्षय हो जाए; बल्कि यह ऐसा आंतरिक प्रकाश है, जो अभिव्यक्ति पाकर और अधिक विस्तार ग्रहण करता है। जब मनुष्य अपने विचारों, कल्पनाओं एवं संवेदनाओं को सृजन का रूप देता है, तब वह केवल कृति का निर्माण नहीं करता, बल्कि अपने अंतर्मन के नए आयामों का भी उद्घाटन करता है।


जीवन का गूढ़ सत्य यह है कि सृजन बाँटने से घटता नहीं, बल्कि अनेक हृदयों में नए दीप प्रज्वलित कर देता है। जैसे एक दीपक से हजारों दीप जल उठें एवं मूल ज्योति फिर भी अक्षुण्ण रहे, वैसे ही रचनात्मकता भी साझा होने पर और अधिक आलोकित होती है। अतः मनुष्य को अपनी कल्पना एवं प्रतिभा को संकोच के बंधनों में नहीं बाँधना चाहिए, क्योंकि सृजन का प्रत्येक प्रयास उसे अपनी ही अनंत संभावनाओं के और निकट ले जाता है।


. "सनातन"
(एक सोच , प्रेरणा और संस्कार)

पंकज शर्मा (कमल सनातनी)
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