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मंद पवन बहती पुरवाई, यौवन ने ली प्रणय अंगड़ाई

मंद पवन बहती पुरवाई, यौवन ने ली प्रणय अंगड़ाई

कुमार महेंद्र
नभ से झरता राग अनश्वर,
वसुधा का आँचल लहराए।
मलयज-सुगंधित मंद समीरन,
मन के सुप्त भाव जगाए।
नयन-कपाटों के झरोखों से,
छवि तेरी उर में समाई।
मंद पवन बहती पुरवाई,यौवन ने ली प्रणय अंगड़ाई।।


अधर मुखर हैं मौन भाषा में,
हृदय-तंत्री झंकृत होती।
तेरी स्मृतियों के कल्पतरु पर,
कल्पना नव कुसुम पिरोती।
ज्यों शशि-किरण की मधुर सुधा से,
शीतल हो उठती अमराई।
मंद पवन बहती पुरवाई,यौवन ने ली प्रणय अंगड़ाई।।


बंधे हुए हैं जिस बंधन में,
वह जन्मों-जन्मों का अनुबंध।
मैं यदि रागिनी प्राण-प्रियतम,
तुम श्रृंगार-काव्य का छंद।
युग-युग तक अक्षुण्ण रहे यह,
प्रेम-दीप की अमिट अरुणाई।
मंद पवन बहती पुरवाई,यौवन ने ली प्रणय अंगड़ाई।।


तुम संग बीता प्रत्येक क्षण,
साधना का पावन प्रतिफल।
तुम ही आदि, अनंत, सहारा,
तुम से ही आनंद सकल।
अर्पित हैं ये श्वास तुम्हें अब,
प्रीत-परंपरा हमने निभाई।
मंद पवन बहती पुरवाई,यौवन ने ली प्रणय अंगड़ाई।।


कुमार महेंद्र(स्वरचित मौलिक रचना)
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