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हावड़ा के वार्ड संख्या 45 में हिंदू राष्ट्र संगोष्ठी संपन्न, जगद्गुरु शंकराचार्य के संदेशों पर हुआ मंथन

हावड़ा के वार्ड संख्या 45 में हिंदू राष्ट्र संगोष्ठी संपन्न, जगद्गुरु शंकराचार्य के संदेशों पर हुआ मंथन

हावड़ा (पश्चिम बंगाल)। दक्षिण हावड़ा के नतुन पल्ली स्थित वार्ड संख्या 45 में सनातन धर्म, हिंदू एकता एवं राष्ट्र जागरण को समर्पित एक महत्वपूर्ण हिंदू राष्ट्र संगोष्ठी का आयोजन किया गया। यह संगोष्ठी पूज्यपाद जगद्गुरु शंकराचार्य गोवर्धन पीठाधीश्वर स्वामी निश्चलानंद सरस्वती जी महाराज द्वारा गोवर्धन मठ से संचालित "भव्य भारत" अभियान के अंतर्गत आयोजित की गई। कार्यक्रम अधिवक्ता एवं ब्राह्मण भूषण सम्मान से अलंकृत प्रेमचंद्र झा के सानिध्य में श्री गुप्तेश्वर प्रसाद एवं श्री नारायण प्रसाद के प्रांगण में संपन्न हुआ।

संगोष्ठी में क्षेत्र के अनेक धर्मप्रेमी, बुद्धिजीवी, सामाजिक कार्यकर्ता एवं श्रद्धालु उपस्थित रहे। कार्यक्रम का उद्देश्य सनातन वैदिक परंपरा के प्रति जन-जागरण, हिंदू समाज के संगठन तथा राष्ट्र और संस्कृति की रक्षा के लिए समाज को प्रेरित करना था।

अपने उद्बोधन में प्रेमचंद्र झा ने सनातन धर्म की महानता और उसकी प्राचीन परंपराओं पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि यदि भगवान आदि शंकराचार्य का प्राकट्य नहीं हुआ होता तो भारत की वैदिक परंपरा अनेक चुनौतियों के बीच कमजोर पड़ सकती थी। आदि शंकराचार्य ने मात्र 32 वर्ष की आयु में संपूर्ण भारत का भ्रमण कर वैदिक धर्म की पुनर्स्थापना की, चार धामों का पुनरुद्धार किया तथा चार प्रमुख पीठों की स्थापना कर सनातन धर्म को संगठित स्वरूप प्रदान किया।

उन्होंने कहा कि उसी गौरवशाली परंपरा का निर्वहन वर्तमान में गोवर्धन मठ पुरी के शंकराचार्य पूज्यपाद स्वामी निश्चलानंद सरस्वती जी महाराज कर रहे हैं। वे भारत एवं नेपाल के विभिन्न क्षेत्रों में भ्रमण कर सनातन धर्म, राष्ट्रीय चेतना और सांस्कृतिक मूल्यों के संरक्षण का संदेश जन-जन तक पहुँचा रहे हैं।

प्रेमचंद्र झा ने संगोष्ठी में जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती जी महाराज के विचारों का उल्लेख करते हुए कहा कि महाराजश्री बार-बार यह संदेश देते हैं कि "सेवा, सत्संग और स्वाध्याय" हिंदू समाज के संगठन के तीन प्रमुख आधार हैं। इनके माध्यम से व्यक्ति का आत्मिक, सामाजिक और राष्ट्रीय उत्थान संभव है।

उन्होंने शंकराचार्य जी के उस संदेश को भी दोहराया जिसमें वे कहते हैं कि "धर्मो रक्षति रक्षितः", अर्थात जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है। इसलिए प्रत्येक सनातनी का कर्तव्य है कि वह अपने धर्म, संस्कृति, परंपराओं और राष्ट्रीय मूल्यों के संरक्षण में सक्रिय भूमिका निभाए।

प्रेमचंद्र झा ने बताया कि पूज्य शंकराचार्य जी का स्पष्ट मत है कि भारत की समस्याओं का स्थायी समाधान भारतीय संस्कृति, सनातन जीवन-दर्शन और नैतिक मूल्यों पर आधारित व्यवस्था से ही संभव है। वे समाज में नैतिकता, आध्यात्मिकता, स्वदेशी चिंतन और सांस्कृतिक आत्मविश्वास को बढ़ाने पर विशेष बल देते हैं।

संगोष्ठी के दौरान उपस्थित वक्ताओं ने हिंदू समाज की वर्तमान चुनौतियों, सांस्कृतिक संरक्षण, युवा पीढ़ी में धार्मिक शिक्षा और सामाजिक समरसता जैसे विषयों पर भी अपने विचार रखे। वक्ताओं ने कहा कि जब तक समाज संगठित नहीं होगा, तब तक सांस्कृतिक और सामाजिक चुनौतियों का प्रभावी समाधान कठिन रहेगा।

कार्यक्रम में उपस्थित सभी लोगों ने संकल्प लिया कि क्षेत्र में नियमित रूप से साप्ताहिक संगोष्ठियों, सत्संगों एवं स्वाध्याय कार्यक्रमों का आयोजन किया जाएगा ताकि समाज में धार्मिक जागरूकता, राष्ट्रीय चेतना और सांस्कृतिक गौरव की भावना को और अधिक सशक्त बनाया जा सके।

अंत में उपस्थित श्रद्धालुओं ने पूज्य जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती जी महाराज के संदेशों को जन-जन तक पहुँचाने तथा हिंदू समाज में संगठन, सेवा और संस्कार की भावना को मजबूत करने का संकल्प व्यक्त किया।कार्यक्रम का समापन वैदिक मंगलकामनाओं, धर्मरक्षा के संकल्प तथा "हर-हर महादेव" एवं "जय श्रीराम" के उद्घोष के साथ हुआ। पूरे आयोजन में श्रद्धा, उत्साह और राष्ट्र तथा धर्म के प्रति समर्पण का वातावरण बना रहा।


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