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केंद्र में तीसरी बार सरकार बनाने वाली भाजपा और संघ परिवार के रहते हुए भी अगर हिंदुत्व खतरे में है तो हिंदुत्व कब खतरे से बाहर होगा?

केंद्र में तीसरी बार सरकार बनाने वाली भाजपा और संघ परिवार के रहते हुए भी अगर हिंदुत्व खतरे में है तो हिंदुत्व कब खतरे से बाहर होगा?

डॉ. राकेश दत्त मिश्र

भारतीय राजनीति में कुछ ऐसे नारे हैं जो समय-समय पर दोहराए जाते रहे हैं और जिनका प्रभाव चुनावी परिणामों तक में दिखाई देता है। इनमें सबसे प्रमुख नारा है — "हिंदुत्व खतरे में है" या "हिंदू समाज खतरे में है।" पिछले कई दशकों से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और भारतीय जनता पार्टी (BJP) प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से इस विषय को अपने राजनीतिक विमर्श के केंद्र में रखते रहे हैं।

लेकिन आज जब केंद्र में लगातार तीसरी बार भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार है, देश के अधिकांश राज्यों में भाजपा या उसके सहयोगी दल सत्ता में हैं, राष्ट्रपति से लेकर उपराष्ट्रपति और अनेक संवैधानिक पदों पर भाजपा समर्थित व्यक्तित्व मौजूद हैं, तब यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि आखिर हिंदुत्व कब खतरे से बाहर होगा? यदि आज भी खतरा बना हुआ है, तो इसके लिए जिम्मेदार कौन है?

सत्ता और खतरे का विरोधाभास


लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी भी विचारधारा की सबसे बड़ी शक्ति राजनीतिक सत्ता होती है। यदि कोई दल लंबे समय तक केंद्र और राज्यों में शासन कर रहा हो, प्रशासनिक तंत्र पर उसका प्रभाव हो, सामाजिक संगठनों का व्यापक नेटवर्क उसके साथ हो और जनसमर्थन भी प्राप्त हो, तो सामान्यतः माना जाता है कि उसकी वैचारिक स्थिति मजबूत है।

ऐसे में यदि लगातार यह कहा जाए कि वही विचारधारा अस्तित्व के संकट से गुजर रही है, तो यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि इतने वर्षों की सत्ता के बावजूद उस संकट को समाप्त क्यों नहीं किया जा सका?

यदि वास्तव में हिंदुत्व के सामने गंभीर चुनौतियां थीं, तो सरकार को उन चुनौतियों के समाधान के लिए ठोस कदम उठाने चाहिए थे। लेकिन आलोचकों का आरोप है कि कई ऐसे मुद्दे, जिन्हें वर्षों से हिंदुत्व के लिए खतरा बताया जाता रहा, आज भी यथावत हैं। परिणामस्वरूप यह संदेह पैदा होता है कि कहीं "खतरे" की राजनीति स्वयं एक राजनीतिक उपकरण तो नहीं बन गई है।

भय की राजनीति का सिद्धांत


राजनीति विज्ञान के अनेक विद्वानों का मानना है कि भय (Fear) राजनीति का सबसे प्रभावी हथियार होता है। जब जनता को किसी वास्तविक या काल्पनिक खतरे का एहसास कराया जाता है, तो वह अपनी अन्य समस्याओं को पीछे छोड़कर सुरक्षा और पहचान के प्रश्नों पर केंद्रित हो जाती है।

दुनिया के अनेक देशों में राजनीतिक दलों ने धर्म, जाति, नस्ल, प्रवासियों या बाहरी शक्तियों के खतरे का मुद्दा उठाकर जनसमर्थन प्राप्त किया है। भारत में भी समय-समय पर धार्मिक पहचान आधारित राजनीति इसी सिद्धांत पर चलती रही है।

आलोचकों का कहना है कि "हिंदुत्व खतरे में है" का नारा भी इसी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा बन चुका है। इसका उद्देश्य वास्तविक समस्याओं से ध्यान हटाकर भावनात्मक मुद्दों को केंद्र में रखना है।

जनसंख्या और डेमोग्राफी का प्रश्न


हिंदुत्व के खतरे के पक्ष में सबसे अधिक जो तर्क दिया जाता है, वह जनसंख्या संतुलन का है। यह कहा जाता है कि मुस्लिम आबादी तेजी से बढ़ रही है और भविष्य में हिंदू अल्पसंख्यक हो सकते हैं।

लेकिन उपलब्ध जनगणना आंकड़ों का विश्लेषण करने पर तस्वीर कुछ अलग दिखाई देती है। भारत में हिंदू आबादी आज भी लगभग 80 प्रतिशत के आसपास है, जबकि मुस्लिम आबादी लगभग 14-15 प्रतिशत के बीच है। जनसंख्या वृद्धि दर में भी पिछले दशकों में सभी समुदायों में गिरावट दर्ज की गई है।

विशेषज्ञों का मत है कि शिक्षा, शहरीकरण, आर्थिक विकास और महिलाओं की स्थिति में सुधार के साथ सभी समुदायों में जन्म दर कम होती है। इसलिए केवल जनसंख्या वृद्धि के आधार पर निकट भविष्य में हिंदुओं के अल्पसंख्यक बनने की आशंका तथ्यात्मक रूप से बहुत मजबूत नहीं मानी जाती।

हालांकि यह भी सत्य है कि जनसंख्या संबंधी चिंताएं पूरी तरह निराधार नहीं कही जा सकतीं। सीमावर्ती क्षेत्रों में अवैध घुसपैठ, स्थानीय जनसंख्या संतुलन में बदलाव और सांस्कृतिक पहचान के प्रश्न कुछ क्षेत्रों में वास्तविक राजनीतिक मुद्दे रहे हैं। लेकिन पूरे देश को एक समान संकटग्रस्त घोषित करना अलग बात है।
क्या सांस्कृतिक चुनौतियां नहीं हैं?

यह कहना भी उचित नहीं होगा कि हिंदू समाज के सामने कोई चुनौती ही नहीं है। धार्मिक परिवर्तन, पश्चिमी सांस्कृतिक प्रभाव, पारिवारिक मूल्यों का क्षरण, जातीय विभाजन, मंदिर प्रबंधन, शिक्षा में भारतीय परंपराओं का सीमित स्थान और सामाजिक विखंडन जैसे अनेक प्रश्न वास्तव में मौजूद हैं।

लेकिन प्रश्न यह है कि क्या इन समस्याओं का समाधान केवल चुनावी भाषणों और नारों से संभव है?

यदि हिंदुत्व एक सांस्कृतिक और सभ्यतागत विचार है, तो उसकी रक्षा का सबसे बड़ा माध्यम शिक्षा, सामाजिक सुधार, सांस्कृतिक जागरण और नैतिक पुनर्निर्माण होना चाहिए, न कि केवल चुनावी ध्रुवीकरण।
असली मुद्दे और जनता की अपेक्षाएं

आज भारत के सामने अनेक गंभीर चुनौतियां हैं।

बेरोजगारी युवाओं की सबसे बड़ी चिंता है। कृषि क्षेत्र अनेक समस्याओं से जूझ रहा है। शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता पर लगातार प्रश्न उठते रहे हैं। साइबर अपराध तेजी से बढ़ रहे हैं। भ्रष्टाचार, प्रशासनिक अक्षमता और न्यायिक विलंब जैसी समस्याएं भी आम नागरिक को प्रभावित करती हैं।

जनता यह अपेक्षा करती है कि सरकार इन विषयों पर ठोस और प्रभावी कार्य करे। लेकिन जब राजनीतिक विमर्श बार-बार धार्मिक पहचान और भावनात्मक मुद्दों पर केंद्रित हो जाता है, तब विकास और शासन से जुड़े प्रश्न पीछे छूट जाते हैं।

यही कारण है कि समाज का एक बड़ा वर्ग यह पूछ रहा है कि क्या हिंदुत्व के नाम पर राजनीति करने वाले दल अब शासन और विकास के सवालों पर भी उतनी ही गंभीरता दिखाएंगे?

हिंदुत्व और राजनीति में अंतर


हिंदुत्व और भाजपा को एक ही मान लेना भी एक गंभीर बौद्धिक भूल होगी। हिंदुत्व एक व्यापक सांस्कृतिक और दार्शनिक अवधारणा है, जबकि भाजपा एक राजनीतिक दल है।

किसी राजनीतिक दल की सफलता या असफलता को हिंदू धर्म या हिंदुत्व की सफलता-असफलता मान लेना उचित नहीं है। हिंदू सभ्यता हजारों वर्षों से अस्तित्व में है और उसने अनेक आक्रमण, राजनीतिक परिवर्तन और सामाजिक उतार-चढ़ाव देखे हैं।

इसलिए हिंदुत्व को किसी एक दल या संगठन तक सीमित करना स्वयं हिंदुत्व की व्यापकता को सीमित करना होगा।

आज आवश्यकता इस बात की है कि देश में भय आधारित राजनीति के बजाय तथ्य आधारित विमर्श हो। यदि हिंदुत्व के सामने वास्तविक चुनौतियां हैं, तो उन्हें स्पष्ट रूप से सामने रखा जाए और उनके समाधान के लिए दीर्घकालिक नीतियां बनाई जाएं। यदि खतरे का दावा केवल राजनीतिक लाभ के लिए किया जा रहा है, तो जनता को भी इस पर प्रश्न पूछने का अधिकार है।

लोकतंत्र में सत्ता का सबसे बड़ा आधार जनता का विश्वास होता है, और विश्वास भय से नहीं, बल्कि प्रदर्शन, पारदर्शिता और परिणामों से अर्जित होता है।

अंततः प्रश्न केवल यह नहीं है कि "हिंदुत्व खतरे में है या नहीं?" बल्कि यह भी है कि क्या भारत की राजनीति भय के आधार पर चलेगी या विकास, शिक्षा, रोजगार और सुशासन के आधार पर?

जब तक इस प्रश्न का ईमानदार उत्तर नहीं मिलता, तब तक "हिंदुत्व खतरे में है" का नारा और "हिंदुत्व कब खतरे से बाहर होगा?" का प्रतिप्रश्न दोनों भारतीय राजनीति में समान रूप से गूंजते रहेंगे। 
डॉ. राकेश दत्त मिश्र

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