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मन में विष, मुख पर मधुरता -आधुनिक समाज की सबसे बड़ी विडंबना

मन में विष, मुख पर मधुरता -आधुनिक समाज की सबसे बड़ी विडंबना

डॉ. राकेश दत्त मिश्र

मानव जीवन का सबसे बड़ा आधार विश्वास, प्रेम और आत्मीयता है। जब व्यक्ति के मन, वचन और कर्म में एकरूपता होती है, तब उसके व्यक्तित्व में एक विशेष आकर्षण और विश्वसनीयता दिखाई देती है। किंतु वर्तमान समय में समाज जिस दिशा में आगे बढ़ रहा है, वहां यह एकरूपता धीरे-धीरे समाप्त होती दिखाई दे रही है। आज अनेक लोग ऐसे मिल जाते हैं जिनके चेहरे पर मुस्कान होती है, शब्दों में मिठास होती है, लेकिन उनके मन में ईर्ष्या, द्वेष, स्वार्थ और प्रतिस्पर्धा का विष भरा होता है। यही आधुनिक समाज की सबसे बड़ी विडंबना बन गई है।

आज का युग दिखावे का युग बनता जा रहा है। लोग अपने वास्तविक स्वरूप से अधिक उस छवि की चिंता करते हैं जो समाज के सामने प्रस्तुत की जाती है। व्यक्ति सामने वाले को अपना शुभचिंतक होने का विश्वास दिलाता है, लेकिन अवसर मिलने पर वही उसके विरुद्ध षड्यंत्र रचता है, उसकी आलोचना करता है या उसके मार्ग में बाधा उत्पन्न करने का प्रयास करता है। यह दोहरा चरित्र केवल व्यक्तिगत संबंधों तक सीमित नहीं है, बल्कि सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक और व्यावसायिक जीवन में भी स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।

वर्तमान समय में सोशल मीडिया ने इस प्रवृत्ति को और अधिक बढ़ावा दिया है। लोग अपने जीवन को आदर्श, सुखी और सफल दिखाने के लिए निरंतर प्रयासरत रहते हैं। मित्रता, सहयोग और प्रेम का प्रदर्शन खुले मंचों पर किया जाता है, लेकिन वास्तविक जीवन में वही लोग एक-दूसरे के प्रति कटुता और प्रतिस्पर्धा का भाव रखते हैं। दिखावे की यह संस्कृति धीरे-धीरे मनुष्य को उसकी वास्तविक पहचान से दूर करती जा रही है।

सबसे अधिक दुखद स्थिति तब उत्पन्न होती है जब यह प्रवृत्ति परिवार और मित्रता जैसे पवित्र संबंधों में प्रवेश कर जाती है। आज अनेक लोग अपने ही परिजनों और मित्रों के सामने प्रेम और सम्मान का प्रदर्शन करते हैं, किंतु उनके मन में ईर्ष्या और असंतोष पलता रहता है। किसी की उन्नति देखकर प्रसन्न होने के बजाय लोग उसके पतन की प्रतीक्षा करने लगते हैं। दूसरों की सफलता को प्रेरणा के रूप में स्वीकार करने के स्थान पर उसे अपनी असफलता का कारण मानने लगते हैं। यही मानसिकता संबंधों को कमजोर करती है और समाज में अविश्वास का वातावरण निर्मित करती है।

सनातन संस्कृति सदैव से मन, वचन और कर्म की शुद्धता पर बल देती रही है। हमारे ऋषि-मुनियों ने सिखाया कि व्यक्ति की महानता उसके बाहरी प्रदर्शन से नहीं, बल्कि उसके अंतःकरण की पवित्रता से मापी जाती है। भगवान श्रीराम का जीवन इसका सर्वोत्तम उदाहरण है। उन्होंने कभी दिखावे का सहारा नहीं लिया। जो उनके मन में था, वही उनके वचन और कर्म में दिखाई देता था। इसी कारण वे आज भी मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में पूजनीय हैं।

इसके विपरीत जब व्यक्ति अपने वास्तविक विचारों को छिपाकर केवल सामाजिक स्वीकृति प्राप्त करने के लिए मधुरता का अभिनय करता है, तब वह स्वयं भी मानसिक तनाव का शिकार हो जाता है। उसे निरंतर एक मुखौटा पहनकर जीना पड़ता है। वह अपने वास्तविक स्वरूप को छिपाने में इतनी ऊर्जा खर्च करता है कि अंततः उसका व्यक्तित्व कृत्रिम और अविश्वसनीय बन जाता है। ऐसे व्यक्ति कुछ समय तक लोगों को भ्रमित कर सकते हैं, लेकिन लंबे समय तक नहीं। सत्य को छिपाया जा सकता है, मिटाया नहीं जा सकता।

आज आवश्यकता इस बात की है कि हम स्वयं का आत्मनिरीक्षण करें। हमें यह विचार करना चाहिए कि क्या हमारे शब्द और हमारे विचार एक जैसे हैं? क्या हम वास्तव में उतने ही शुभचिंतक हैं जितना स्वयं को प्रदर्शित करते हैं? क्या हम दूसरों की सफलता में प्रसन्न होते हैं या भीतर ही भीतर उससे जलते हैं? यदि इन प्रश्नों का उत्तर ईमानदारी से खोज लिया जाए, तो समाज की अनेक समस्याओं का समाधान स्वतः मिल सकता है।

एक स्वस्थ और सशक्त समाज का निर्माण केवल कानूनों और व्यवस्थाओं से नहीं होता, बल्कि सच्चे और ईमानदार व्यक्तियों से होता है। जहां लोगों के मन में प्रेम, सहयोग और सद्भावना होती है, वहां विश्वास स्वतः विकसित होता है। वहीं जहां मन में विष और मुख पर मधुरता होती है, वहां संबंध केवल औपचारिकता बनकर रह जाते हैं।

अतः हमें दिखावे की संस्कृति से बाहर निकलकर सत्य और आत्मीयता के मार्ग पर चलना होगा। लोगों को प्रभावित करने के लिए नहीं, बल्कि अपने चरित्र को श्रेष्ठ बनाने के लिए जीवन जीना होगा। याद रखिए, मुख की मधुरता कुछ समय के लिए लोगों को आकर्षित कर सकती है, लेकिन मन की पवित्रता ही जीवनभर सम्मान दिलाती है।

अंततः यही कहा जा सकता है कि आज समाज को सुंदर चेहरों और मधुर शब्दों से अधिक सुंदर विचारों और निर्मल हृदयों की आवश्यकता है। क्योंकि मनुष्य की वास्तविक पहचान उसके शब्दों से नहीं, बल्कि उसके मन और कर्म से होती है।

"जिस व्यक्ति के मन में प्रेम और सद्भावना होती है, उसे अपनापन दिखाने की आवश्यकता नहीं पड़ती; उसका व्यवहार ही उसके हृदय की सच्चाई का परिचय दे देता है।"लेखक डॉ. राकेश दत्त मिश्र दिव्य रश्मि के सम्पादक और दिव्य जीर्णोद्धार फाउंडेशन के निदेशक है |
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