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हवाओं का दौर सदा रहता, आँधियाँ बस कुछ देर की

हवाओं का दौर सदा रहता, आँधियाँ बस कुछ देर की

कुमार महेंद्र
जो डगमगाएँ पग राहों में,
तो भय से आँखें मूँद न तू।
यह पतझड़ का अंतिम पल है,
मधुमास की आहट ढूँढ़ तू।
घिरते काले मेघ बताते,
आहट नई सवेर की।
हवाओं का दौर सदा रहता, आँधियाँ बस कुछ देर की।।


तू रख भरोसा अपनी साँसों पर,
अटूट रहे विश्वास तेरा।
हर काली रात के आँचल से,
उगा सदा नव सूर्य सुनहरा।
तूफ़ानों का प्रचंड वेग भी,
बस एक घड़ी अँधेर की।
हवाओं का दौर सदा रहता, आँधियाँ बस कुछ देर की।।


तू बन अटल हिमगिरि-सा अविचल,
सरिता-सा अविरल बहता चल।
श्रम की पावन पगडंडी पर,
साहस का दीपक बनकर जल।
धैर्य और साहस ही होते,
अनुपम पहचान शेर की।
हवाओं का दौर सदा रहता, आँधियाँ बस कुछ देर की।।


संसार का यह नियम सनातन,
परिवर्तन ही जीवन-सार।
दुःख की आँधी कब टिक पाई,
सुख ने जीता हर अँधकार।
चल पड़ राही, बढ़ता ही चल,
चिंता मत कर समय-फेर की।
हवाओं का दौर सदा रहता, आँधियाँ बस कुछ देर की।।


संघर्षों की अग्नि में तपकर,
कुंदन बनता जीवन-स्वर्ण।
काँटों पर चलने वाले ही,
लिखते अपना गौरव-वर्ण।
विजय उसी के चरण चूमती,
जो राह चले धीर-वीर की।
हवाओं का दौर सदा रहता, आँधियाँ बस कुछ देर की।।


कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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