मगही भाषा, साहित्य और संस्कृति
सत्येन्द्र कुमार पाठक
बिहार की पावन धरती, विशेषकर प्राचीन मगध साम्राज्य का अंचल, न केवल महान राजाओं, विचारकों और आध्यात्मिक गुरुओं की कर्मभूमि रहा है, बल्कि यह एक अत्यंत समृद्ध, जीवंत और वैज्ञानिक भाषा 'मगही' (मागधी) का उद्गम स्थल भी है। वर्तमान में पटना, गया, जहानाबाद, अरवल, नवादा, औरंगाबाद, नालंदा, शेखपुरा, लखीसराय, मुंगेर तथा झारखंड के पलामू, हजारीबाग और चतरा जैसे विस्तृत भू-भाग में बोली जाने वाली मगही केवल संवाद का माध्यम नहीं है; यह इस क्षेत्र के लोकमानस की धड़कन, इसके गौरवशाली इतिहास की संवाहिका और यहाँ की संस्कृति का दर्पण है। एक समय था जब औपनिवेशिक मानसिकता और भाषाई राजनीति के कारण मगही को केवल एक 'बोली' (Dialect) मानकर हाशिए पर धकेलने का प्रयास किया गया। परंतु, इसके हजारों वर्ष पुराने लिखित इतिहास, समृद्ध लोक-साहित्य, स्वतंत्र व्याकरणिक संरचना और जन-आंडोलनों के बल पर इसने अपना खोया हुआ भाषाई सम्मान पुनः प्राप्त किया। प्रस्तुत आलेख मगही के इसी ऐतिहासिक सफर, इसमें विभिन्न राजवंशों के राजकीय संरक्षण, प्रखर साहित्यकारों के साहित्यिक योगदान, राजनीतिक दिग्गजों के नीतिगत संघर्ष और आधुनिक माध्यमों (जैसे सिनेमा व वृत्तचित्र) के अनमोल अवदान का एक व्यापक और प्रामाणिक दस्तावेजीकरण है।
मगही का भाषाई मूल मागधी प्राकृत में निहित है। इतिहास गवाह है कि किसी भी भाषा के फलने-फूलने में उसे मिलने वाले राजकीय संरक्षण और जन-आंदोलनों की बहुत बड़ी भूमिका होती है। मगध की धरती पर शासन करने वाले महान साम्राज्यों ने इस भाषा को अमरत्व प्रदान किया।
हर्यक वंश (बिम्बिसार और अजातशत्रु का काल) - मगध साम्राज्य के वास्तविक संस्थापक राजा बिम्बिसार और उनके प्रतापी पुत्र अजातशत्रु के शासनकाल में मागधी प्राकृत को अभूतपूर्व प्रोत्साहन मिला। इस काल में राजकाज और जनसामान्य के बीच की दूरी को पाटने के लिए तत्कालीन लोकभाषा का ही प्रयोग किया जाता था। भगवान बुद्ध और भगवान महावीर ने इसी कालखंड में अपनी शिक्षाओं के प्रसार के लिए तत्कालीन मागधी (पालि/प्राकृत) को चुना, क्योंकि यह जन-जन की भाषा थी।
मौर्य साम्राज्य और सम्राट अशोक की धम्म-लिपियाँ - मौर्य वंश के काल में मागधी प्राकृत को अखिल भारतीय स्तर पर राजकीय सम्मान प्राप्त हुआ। सम्राट अशोक ने अपने विशाल साम्राज्य में अपनी प्रजा से संवाद करने के लिए किसी क्लिष्ट या दरबारी भाषा के बजाय जनभाषा मागधी प्राकृत को चुना।
सम्राट अशोक के कई ऐतिहासिक शिलालेख, स्तंभ लेख और धम्म लिपियाँ मागधी प्राकृत और ब्राह्मी लिपि में उत्कीर्ण हैं। यह इस बात का अकाट्य प्रमाण है कि मगही का पूर्वज रूप मौर्य साम्राज्य की आधिकारिक भाषा के रूप में स्वीकृत था। इस राजकीय संरक्षण ने इस भाषा को एक सुदृढ़ संरचनात्मक आधार प्रदान किया। आधुनिक स्तंभ और भाषा के शिल्पी।13वीं शताब्दी के आदि कवि ईशान से शुरू हुई मगही साहित्य की यात्रा आधुनिक काल तक आते-आते अत्यंत समृद्ध हो गई। मगही को 'बोली' के स्तर से उठाकर 'साहित्यिक भाषा' के सिंहासन पर बैठाने में कई कालजयी रचनाकारों ने अपनी लेखनी का बलिदान दिया। आपके द्वारा उल्लेखित विद्वानों और कवियों का अवदान इस प्रकार है: मोहन लाल महतो 'वियोगी' आधुनिक मगही साहित्य के इतिहास में मोहन लाल महतो 'वियोगी' का नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित है। वे एक ऐसे युगद्रष्टा साहित्यकार थे जिन्होंने मगही में उच्च कोटि के महाकाव्यों और काव्यों की रचना की। उन्होंने यह सिद्ध किया कि मगही में गंभीर, दार्शनिक और संस्कृतनिष्ठ भावों को भी उतनी ही सहजता से व्यक्त किया जा सकता है जितना कि हिंदी या संस्कृत में। उनकी रचनाओं ने मगही को एक नई साहित्यिक गरिमा और पहचान दी।
हंसकुमार तिवारी हंसकुमार तिवारी का अवदान मुख्य रूप से मगही पत्रकारिता, संपादन और समालोचना (आलोचना) के क्षेत्र में रहा है। उन्होंने महसूस किया कि जब तक किसी भाषा की अपनी पत्रिकाएँ नहीं होंगी, तब तक नए लेखकों को मंच नहीं मिलेगा। उन्होंने कई मगही पत्र-पत्रिकाओं का संपादन किया, देश-विदेश के विचारकों को मगही की ओर आकृष्ट किया और मगही साहित्य की समीक्षा का मार्ग प्रशस्त किया। डॉ. रामप्रसाद सिंह किसी भी बोली को भाषा का दर्जा तब मिलता है जब उसका अपना एक प्रामाणिक व्याकरण हो। डॉ. रामप्रसाद सिंह ने मगही भाषा के व्याकरण, उसके शब्दकोश और उसके भाषाई इतिहास पर अद्वितीय और अत्यंत वैज्ञानिक कार्य किया। उन्होंने मगही की ध्वनियों, क्रिया-रूपों और वाक्य-विन्यास का गहन अध्ययन कर इसे एक अकादमिक भाषा के रूप में स्थापित किया। डॉ. सम्पति आर्यानी: एक युगांतकारी शोध मगही साहित्य के इतिहास में डॉ. सम्पति आर्यानी का योगदान एक मील का पत्थर है। उनका सुप्रसिद्ध शोध ग्रंथ "मगही भाषा और साहित्य" मगही के वैज्ञानिक और ऐतिहासिक अध्ययन की नींव माना जाता है।
अवदान: उन्होंने इस ग्रंथ में मगही की उत्पत्ति, इसकी विभिन्न उप-बोलियों, इसके लोक-साहित्य और लिखित परंपरा का इतना प्रामाणिक विवरण प्रस्तुत किया कि देश-विदेश के भाषाविदों को मगही की प्राचीनता और महत्ता को स्वीकार करना पड़ा। वे मगही आंदोलन की एक प्रखर मार्गदर्शक थीं।
राम नरेश वर्मा और रामबुझवन सिंह राम नरेश वर्मा: इन्होंने मगध के ग्रामीण अंचलों में बिखरे पड़े लोक-नाटकों, नौटंकी और लोककथाओं का अद्भुत संकलन किया। उन्होंने मगही नाटकों के माध्यम से रंगमंच को समृद्ध किया।
रामबुझवन सिंह: वे मिट्टी से जुड़े कवि थे। उन्होंने अपनी कविताओं और गीतों के माध्यम से मगध के किसानों, मजदूरों और वंचित वर्ग की चेतना को स्वर दिया। उनकी रचनाओं में मगध की माटी की सोंधी महक साफ महसूस की जा सकती है।।पुंडरीक, पंडित कमलेश और किंकर (श्रीकांत शास्त्री) पुंडरीक और पंडित कमलेश: ये दोनों महानुभाव मगही कवि सम्मेलनों के प्राण रहे हैं। उन्होंने अपने ओजस्वी काव्य-पाठ और सरल-सरस भाषा शैली से मगही कविता को गाँवों की चौपालों से उठाकर शहरों के बड़े-बड़े मंचों तक पहुँचाया। श्रीकांत शास्त्री 'किंकर' मगही के एक अत्यंत प्रखर लेखक और विचारक थे। उन्होंने मगही अस्मिता, संस्कृति और यहाँ के पुरातात्विक गौरव पर लगातार अपनी लेखनी चलाई। उनकी रचनाओं ने नई पीढ़ी में अपनी मातृभाषा के प्रति स्वाभिमान जगाने का कार्य किया ।
आचार्य सुदर्शन: नैतिक और आध्यात्मिक चेतना के संवाहक प्रख्यात आध्यात्मिक गुरु, अद्वितीय शिक्षाविद् और विचारक आचार्य सुदर्शन का मगध की सांस्कृतिक चेतना के विकास में अमूल्य योगदान है। उन्होंने अपने प्रवचनों, व्याख्यानों और अपने द्वारा स्थापित विशाल शैक्षणिक संस्थानों के माध्यम से हमेशा इस बात पर बल दिया कि वास्तविक शिक्षा वही है जो अपनी माटी और मातृभाषा से जुड़ी हो। उन्होंने मगही संस्कृति के नैतिक मूल्यों, यहाँ के ऐतिहासिक महापुरुषों के विचारों और आध्यात्मिक विरासत को आधुनिक संदर्भों में परिभाषित कर समाज के सामने प्रस्तुत किया।
विदूषक देवन मिश्र: हास्य-व्यंग्य की अमर विरासत में 18वीं और 19वीं शताब्दी के कालखंड में मगध के जनमानस में देवन मिश्र एक किंवदंती बन चुके थे। जिस प्रकार राजा कृष्णदेवराय के दरबार में तेनालीराम और अकबर के दरबार में बीरबल अपनी बुद्धिमत्ता के लिए प्रसिद्ध थे, उसी प्रकार देवन मिश्र अपनी विलक्षण हाजिरजवाबी और तीखे 'मगही लतीफों' के लिए पूरे मगध साम्राज्य में लोकप्रिय थे।: देवन मिश्र ने विशुद्ध मगही बोली का उपयोग करके समाज में व्याप्त कुरीतियों, धार्मिक पाखंड, अंधविश्वास और सामंती व्यवस्था के अहंकार पर करारी चोट की। उनका सबसे बड़ा योगदान यह था कि उन्होंने कठिन से कठिन सामाजिक सच को भी हास्य और व्यंग्य के पुट के साथ आम जनता तक पहुँचाया, जिससे मगही में हास्य रस की एक समृद्ध मौखिक परंपरा का जन्म है।
श्री प्रभात रंजन सरकार (श्री आनंदमूर्ति जी) (21 मई 1921, जमालपुर, मुंगेर - 21 अक्टूबर 1990) आनंद मार्ग के संस्थापक श्री प्रभात रंजन सरकार केवल एक आध्यात्मिक गुरु नहीं थे, बल्कि वे एक विश्वप्रसिद्ध भाषाविद्, दार्शनिक और सामाजिक-आर्थिक चिंतक भी थे। मगही और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं के उत्थान में उनका योगदान अत्यंत गहरा और क्रांतिकारी है: मातृभाषा: श्री सरकार ने प्रतिपादित किया कि किसी भी मनुष्य या समाज का मानसिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक विकास तब तक नहीं हो सकता, जब तक उसकी प्राथमिक शिक्षा और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति उसकी अपनी मातृभाषा में न हो। उन्होंने पुरजोर वकालत की कि मगध के बच्चों को शिक्षा मगही में ही मिलनी चाहिए। उन्होंने मगध क्षेत्र के सर्वांगीण विकास (आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक) के लिए 'मागध समाज' की स्थापना की। इसके तहत उन्होंने स्थानीय उद्योगों को बढ़ावा देने और मगही संस्कृति को वैश्विक पहचान दिलाने का खाका तैयार किया। प्रभात संगीत (Prabhat Samgiita) में मगही का प्रयोग: उन्होंने अपने जीवनकाल में 5,018 उच्च कोटि के आध्यात्मिक और सामाजिक गीतों की रचना की, जिन्हें 'प्रभात संगीत' कहा जाता है। यद्यपि इनमें से अधिकांश गीत बांग्ला में हैं, परंतु उन्होंने विशुद्ध मगही, मैथिली, अंगिका और भोजपुरी में भी कई कालजयी गीतों की रचना कर इन भाषाओं को वैश्विक संगीत के पटल पर प्रतिस्थापित किया।
भाषाई अनुसंधान: उन्होंने मागधी प्राकृत के उद्भव और उसके आधुनिक रूप (मगही) के अंतर्संबंधों पर गहन भाषाई और दार्शनिक विश्लेषण प्रस्तुत किया। राजनीतिक एवं मगही साहित्य के दिग्गजों का अवदान: नीतिगत और विधायी संघर्ष किसी भी क्षेत्रीय भाषा को जब तक राजनीतिक और प्रशासनिक समर्थन नहीं मिलता, तब तक उसे वैधानिक अधिकार प्राप्त नहीं होते। बिहार के इन महान राजनीतिक कर्णधारों ने मगही भाषा और मगध क्षेत्र के मान-सम्मान को राष्ट्रीय स्तर पर उठाने का ऐतिहासिक कार्य किया: डॉ. राम सुभाग सिंह: स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रतिपक्ष के नेता और प्रखर केंद्रीय मंत्री डॉ. राम सुभाग सिंह स्वयं एक प्रकांड विद्वान थे। उन्होंने भारत की संसद में मगध क्षेत्र की कृषि, सिंचाई और यहाँ की सांस्कृतिक समस्याओं को पूरी प्रखरता से उठाया। उन्होंने हमेशा इस बात पर बल दिया कि मगही जैसी प्राचीन भाषा को उसका उचित संवैधानिक स्थान मिलना चाहिए। बलिराम भगत: पूर्व लोकसभा अध्यक्ष और केंद्रीय विदेश मंत्री के रूप में अपनी सेवाएँ देने वाले बलिराम भगत ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर मगध की समृद्ध ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत का प्रतिनिधित्व किया। उनके नीतिगत प्रयासों के कारण मगध के सांस्कृतिक संस्थानों को नई गति मिली। मुद्रिका सिंह यादव: बिहार के कद्दावर नेता और पूर्व मंत्री मुद्रिका सिंह यादव पूर्णतः माटी से जुड़े राजनेता थे। उन्होंने जमीनी स्तर पर मगही भाषी लोगों, किसानों और बुद्धिजीवियों को एकजुट किया। उन्होंने प्राथमिक शिक्षा में मगही के प्रयोग और सरकारी स्तर पर मगही भाषा को सम्मानजनक स्थान दिलाने के लिए सड़क से लेकर सदन तक निरंतर संघर्ष किया। सतीश कुमार मिश्र एवं राम पुकार सिंह: राठौर इन नेताओं, विचारकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने मगही अकादमी की स्थापना, मगही पत्रिकाओं के नियमित प्रकाशन और इसके भाषाई अधिकारों के लिए होने वाले विभिन्न सम्मेलनों को अपना पूर्ण वित्तीय, नीतिगत और नैतिक सहयोग दिया। इन्हीं के प्रयासों का प्रतिफल है कि आज मगही साहित्यकारों को एक संगठित मंच प्राप्त हो सका है। दृश्य-श्रव्य माध्यम: सिनेमा और डॉक्यूमेंट्री फिल्म - 20वीं शताब्दी के मध्य में जब आधुनिक तकनीक और सिनेमा का प्रादुर्भाव हुआ, तो मगही के मनीषियों ने इस माध्यम का उपयोग अपनी भाषा को एक आधुनिक पहचान देने के लिए है। सन 1961 मगही इतिहास का एक अत्यंत गौरवशाली वर्ष माना जाता है, क्योंकि इसी वर्ष मगही भाषा की पहली पूर्ण व्यावसायिक फीचर फिल्म 'भैया' का निर्माण हुआ था। निर्माता-निर्देशक: इस साहसिक और ऐतिहासिक फिल्म के निर्माता मगध के सपूत राधाशरण सिंह थे।महत्व और अवदान: उस दौर में जब क्षेत्रीय भाषाओं में फिल्में बनाना एक बहुत बड़ा आर्थिक जोखिम माना जाता था, राधाशरण सिंह ने मगही भाषा की मिठास, मगध के पारिवारिक मूल्यों और यहाँ के ग्रामीण परिवेश को बड़े पर्दे पर उतारा। इस फिल्म ने यह साबित कर दिया कि मगही केवल लोकगीतों या अनपढ़ों की बोली नहीं है, बल्कि यह सिनेमा जैसे सबसे बड़े और आधुनिक दृश्य-श्रव्य माध्यम के लिए भी पूरी तरह सक्षम और समृद्ध भाषा है। देव राजघराना और मूक डॉक्यूमेंट्री फिल्म 'देव' (1930 का दशक) - सिनेमा के इतिहास में एक और अभूतपूर्व अध्याय औरंगाबाद के ऐतिहासिक 'देव राजघराने' से जुड़ा है। देव रियासत के सूर्यवंशी सिसोदिया राजपूत शासक कला और साहित्य के परम संरक्षक थे। ऐतिहासिक मूक वृत चित्र देव का निर्माता , निदेशक देव राजा जगन्नाथ प्रसाद सिंह किंकर , निर्माण कल 1930 , सिनेमेटोग्राफी प्रसिद्ध कैमरा मैन सिनेमेटो ग्राफी डेविड ,सार्वजनिक प्रदर्शन 1933 ई में रत्न टॉकीज में देव sirymsndir और छठ व्रत का संकलन कर प्रदर्शित की गई थी । 1930 के दशक की शुरुआत में देव के तत्कालीन राजा जगन्नाथ प्रसाद सिंह 'किंकर' ने इस मूक (Silent) डॉक्यूमेंट्री फिल्म का निर्माण और निर्देशन किया था। राजा 'किंकर' स्वयं मगही और हिंदी के प्रकांड विद्वान और उच्च कोटि के कवि थे। यह निर्माण देव राजघराने के संरक्षण में हुआ था। इस राजघराने ने सदियों से मगध की लोक-संस्कृति को सहेजने का कार्य किया था। देव राजा 'किंकर' का मुख्य उद्देश्य औरंगाबाद के त्रेतायुगीन ऐतिहासिक देव सूर्य मंदिर, वहाँ के पवित्र सूर्यकुंड और वहाँ होने वाले विश्वप्रसिद्ध छठ महापर्व के ऐतिहासिक मेले का दस्तावेजीकरण।करना था। वे इस पावन पर्व पर उमड़ने वाले लाखों श्रद्धालुओं की अगाध आस्था और पारंपरिक दृश्यों को कैमरे में कैद कर हमेशा के लिए अमर कर देना चाहते थे।
सिनेमैटोग्राफी और प्रदर्शन: देव फिल्म की सिनेमैटोग्राफी 'डेविड' नामक कैमरामैन ने की थी। इसका पहला प्रदर्शन राजा के महल में हुआ और बाद में जनवरी 1933 में 'रतन टॉकीज' में इसे जनता के लिए प्रदर्शित किया गया, जिसे देखने पूरे मगध क्षेत्र से जनसैलाब उमड़ पड़ा था। राजा 'किंकर' के इसी ऐतिहासिक योगदान के कारण आज भी क्षेत्रीय सिनेमा में "राजा जगन्नाथ सिंह किंकर स्मृति अवार्ड" दिया जाता है।
लोकगीतों में संचित मगध का जीवन-दर्शन - मगही भाषा की सबसे बड़ी शक्ति उसका लिखित साहित्य तो है ही, परंतु उससे भी बड़ी शक्ति उसकी मौखिक लोक-परंपरा है। मगही समाज में मनुष्य के जन्म से लेकर उसकी मृत्यु तक, और प्रकृति के हर बदलते रंग के लिए एक विशिष्ट लोकगीत निर्धारित है। इन गीतों ने सदियों तक बिना किसी राजकीय विद्यालय के भी मगही भाषा को अक्षुण्ण बनाए रखा:
छठ गीत - यह केवल गीत नहीं, बल्कि मगध का प्राण है। कार्तिक और चैत्र मास में जब संपूर्ण मगध अंचल नदी, तालाबों और सूर्यकुंडों के घाटों पर एकत्र होता है, तब विशुद्ध मगही में गाए जाने वाले छठ गीत (जैसे "कांच ही बांस के बहंगिया, बहंगी लचकत जाए") गूंजते हैं। ये गीत प्रकृति पूजा, पूर्ण पवित्रता, ऊंच-नीच के भेद को मिटाने और छठी मइया व सूर्य देव के प्रति अगाध श्रद्धा को व्यक्त करते हैं। यह मगही संस्कृति का सबसे बड़ा वैश्विक प्रतीक है।
विवाह गीत - मगही विवाह परंपरा में गीतों का एक विशाल संसार है। मटकोड़, हरदी-रस्म, परछन, मड़वा से लेकर विदाई तक हर रस्म के लिए अलग-अलग सुंदर गीत हैं। जहाँ एक ओर समधी और बारातियों को मधुर व्यंग्य बाणों से सराबोर करने वाले 'गाली गीत' रिश्तों में मिठास घोलते हैं, वहीं दूसरी ओर बेटी की विदाई के समय गाए जाने वाले भावुक गीत (समदाउन) पूरे परिवेश को आंसुओं से भिगो देते हैं।
सोहर गीत - परिवार में जब भी किसी बालक या बालिका का जन्म होता है, तो आनंदोत्सव के रूप में 'सोहर गीत' गाए जाते हैं। इन गीतों में नवजात शिशु के आगमन की खुशी, माता की प्रसव-पीड़ा के बाद का सुखद अहसास, और कौशल्या व देवकी के प्रतीकों के माध्यम से बच्चे के उज्ज्वल भविष्य की कामना की जाती है। यह जीवन के उल्लास का गीत है।
. गोदभराई गीत - गर्भावस्था के सातवें या नौवें महीने में आयोजित होने वाले 'सधौर' या 'खोइछा भराई' (गोदभराई) के अवसर पर ये गीत गाए जाते हैं। इन गीतों में आने वाले शिशु की सुरक्षा, माँ के उत्तम स्वास्थ्य, और परिवार के सौभाग्य के लिए लोक-देवताओं से मन्नतें मांगी जाती हैं।
जनेऊ (उपनयन) गीत - बालक के उपनयन संस्कार के समय गाए जाने वाले इन गीतों में एक गहरा जीवन-दर्शन होता है। बालक का मुंडन, उसका काशी जाने का स्वांग रचना, गुरु से दीक्षा लेना, और अपनी माँ व चाची से भिक्षा मांगने की रस्मों को अत्यंत मधुर मगही लोक-धुनों में गाया जाता है। यह गीत बालक को ज्ञान और अनुशासन के मार्ग पर बढ़ने की प्रेरणा देते हैं।
अतीत से लेकर वर्तमान तक, सम्राट अशोक के शिलालेखों से लेकर आधुनिक विद्वानों की लेखनी तक, और राजा जगन्नाथ सिंह 'किंकर' की सिनेमाई दूरदर्शिता से लेकर प्रभात रंजन सरकार के दार्शनिक चिंतन तक—मगही भाषा को सींचने में हर वर्ग ने अपना अमूल्य अवदान दिया है। डॉ. सम्पति आर्यानी जैसे शोधकर्ताओं और मुद्रिका सिंह यादव जैसे राजनेताओं के प्रयासों ने इस भाषा को एक मजबूत धरातल प्रदान किया है।आज आवश्यकता इस बात की है कि इस महान सांस्कृतिक और भाषाई धरोहर को नई पीढ़ी तक पहुँचाया जाए। डिजिटल युग में मगही ब्लॉगिंग, इंटरनेट पत्रिकाओं, और आधुनिक संगीत व वृत्तचित्रों के माध्यम से इस भाषा को और अधिक सहेजने की आवश्यकता है, ताकि मगध की यह 'ज्योति' वैश्विक पटल पर सदैव देदीप्यमान रहे और भारतीय संविधान की 8वीं अनुसूची में इसे इसका न्यायोचित स्थान प्राप्त हो सके।
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