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स्वाधीनता सेनानियों के प्रति विनम्र श्रद्धांजलि और देश की राजनीति

स्वाधीनता सेनानियों के प्रति विनम्र श्रद्धांजलि और देश की राजनीति

डॉ राकेश कुमार आर्य
आप सभी के लिए स्वाधीनता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं। आज जब हम अपना 80वाँ स्वाधीनता दिवस मना रहे हैं तब अपने सभी महान क्रांतिकारी स्वाधीनता सेनानियों, स्वाधीनता के विचारकों ,बलिदानियों के प्रति हृदय अनायास ही श्रद्धा से झुक जाता है। परंतु वर्तमान समय में जिस प्रकार देश की राजनीति एक दुर्गंध भरे परिवेश को सृजित कर रही है जिसे देखकर दुख होता है। चारों ओर राष्ट्रहित की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। देश की स्वाधीनता के भक्षकों का साथ देने के लिए जिस प्रकार राजनीतिक दल ही सामने आ रहे हैं, वह बहुत ही खतरनाक संकेत है। देश के नेता जनता को भ्रमित करके अपना उल्लू सीधा करते जान पड़ रहे हैं। आरक्षण के नाम पर, नौकरियों के नाम पर, जातिवाद के नाम पर देश के लोगों को राजनीति ही बांटने का प्रयास कर रही है।
देश की राजनीति के लिए यद्यपि जातिवाद निषिद्ध है परंतु यह सच है कि वर्तमान राजनीति जातिवाद की बात किए बिना जीवित नहीं रह सकती। राजनेता बड़ी चतुराई से ओबीसी, एससी, एसटी अथवा अगड़ा पिछड़ा के नाम पर अपनी राजनीतिक रोटियां सेकते देखे जाते हैं। जातियों की बात इसलिए की जाती है कि इससे राजनीतिक लोगों का स्वार्थ सिद्ध होता है। जब किसी जाति विशेष के भावनात्मक हित को उछाला जाता है तो उसका लाभ उस जाति के राजनीतिक व्यक्तियों को मिलता है। राजनीतिक व्यक्ति पूरी बिरादरी को या जाति को किसी राजनीतिक दल के साथ जोड़कर उसका लाभ उठाते हैं। इस प्रकार वह नेता अपनी बिरादरी या जाति का भला न करके अपना भला करता है। नेताओं की ओर से जनता को कभी यह नहीं बताया जाता कि सरकारी नौकरियां कितनी हैं ? प्राइवेट क्षेत्र में कितनी नौकरियां हैं ? और कितनी नौकरियां देश के युवा प्राप्त कर सकते हैं ? देश का बहुसंख्यक हिंदू समाज अपने परंपरागत रोजगार छोड़कर अपने बच्चों को नौकरी देने या दिलवाने के लिए पढ़ा रहा है। इसलिए नौकरियां प्राप्त करने की बीमारी से सबसे अधिक बहुसंख्यक समाज ग्रसित है। लोहार , बढ़ई, नाई, जुलाहा और कृषि आदि के परंपरागत रोजगारों को छोड़कर हिंदू समाज की जातियां लगभग मैदान खाली कर गई हैं और उनके स्थान पर एक वर्ग विशेष ने इनके रोजगारों पर आधिपत्य कर लिया है। इसी के चलते बहुसंख्यक समाज का युवा बेरोजगार होकर सड़कों पर घूम रहा है। वही युवा इस समय झारखंड में सड़कों पर आंदोलन करता हुआ दिखाई दे रहा है।
कुछ समय पहले केंद्र सरकार के कार्मिक मंत्री जितेंद्र सिंह ने संसद में लिखित जवाब देते हुए स्पष्ट किया था कि डिपार्मेंट आफ एक्सपेंडिचर की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार केंद्र सरकार के सभी मंत्रालयों और विभागों में मार्च 01 वर्ष 2021 तक लगभग 40 लाख 35000 पद ऐसे थे जिन पर नियुक्ति की जानी थी। परंतु इनमें से मात्र 30 लाख 55000 पदों पर ही सरकारी नौकरी मिल पाई। इसका अभिप्राय हुआ कि लगभग 9 लाख 79000 पद रिक्त रह गए। जिन पर नई नियुक्ति नहीं हो पाई।
नेहरू के जमाने से ही युवाओं में नौकरी पाने की बीमारी लग गई थी। नई पीढ़ी ने परंपरागत रोजगारों से और घर में बैठे अपने वृद्धजनों से बगावत की और केवल एक ही लक्ष्य बनाया कि हमें नौकरी लेनी है। इसका परिणाम यह हुआ कि गांव उजड़ने लगे और शहर बसने लगे । शहरों की ओर गांव से अप्रत्याशित रूप से पलायन हुआ। उस पलायन को देखते हुए कॉलोनाइजर्स का एक नया गैंग खड़ा हुआ। जिसने उनके पलायन को कैश करना आरंभ किया । यह सारे नौकरी पेशे वाले लोग थे। जिन्हें कॉलोनाइजर्स के गैंग ने अच्छी कॉलोनी में प्लॉट देने के लालच में फंसाया। इसका परिणाम यह हुआ कि गांव का बुढ़ापा गांव में रह गया और वह अकेला रोता पीटता जीवन गुजार गया। जो जवानी शहरों की ओर पलायन करके भागी थी , उसको भी अपने पूर्वजों के साथ किए गए दुर्व्यवहार का परिणाम भुगतना था। इसलिए जहां इन्होंने गांव से शहर की ओर पलायन किया था, वहां इनके साहबजादे शहर से विदेश की ओर भाग लिए। परिणाम यह हुआ कि आज बड़ी संख्या में हमारे देश में अनेक ऐसे लोग हैं, जो अपने ' औरंगजेब ' से परेशान होकर एक बंद कोठरी में या किसी वृद्ध आश्रम में रोते हुए अपना जीवन व्यतीत कर रहे हैं।
तनिक इस स्थिति पर विचार कीजिए। जिस देश में कहा जाता था कि जहां वृद्धों की सेवा की जाती है, वहां यश, बल, आयु और कीर्ति में वृद्धि होती है। ... उस देश में यह क्या हो गया ? यदि सूक्ष्मता से हम विचार करें तो पता चलेगा कि हमने सभ्यता के साथ-साथ संस्कृति को उजाड़ दिया या उजाड़ने का काम करते जा रहे हैं। नौकरियां समाधान नहीं थीं, हमने ही एक समस्या को समाधान मान लिया। नेताओं ने हमारी इस स्थिति को भुनाना आरंभ कर दिया। इसलिए उन्होंने युवाओं को और भी अधिक भ्रम में डाले रखने का काम करना आरंभ किया। जिसे आरक्षण की बीमारी ने नए पंख दे दिए। आरक्षण की बीमारी से जातियों को फंसाने का काम आरंभ हुआ। जबकि सब यह जानते थे कि हमारे देश में सरकारी नौकरियां लगभग 2 करोड़ हैं । जिनमें से लगभग 48 से 50 लाख केंद्र सरकार की नौकरियां हैं ,शेष नौकरियां राज्य सरकारों की हैं। सभी राजनीतिक दल इस बात की तो मांग करते हैं कि अमुक जाति को एससी, एसटी या ओबीसी में ले लिया जाए। नौकरियां दिलाने की बात भी करते हैं, परंतु नई नौकरियां पैदा कैसे की जाएंगी और कोई भी केंद्र सरकार या राज्य सरकार कितनी अधिक नौकरियां दे सकती हैं या उन नौकरियों को सृजित करने का क्या ढंग हो सकता है ? - इस पर कोई भी राजनीतिक दल कोई स्पष्ट नीति नहीं रखता। और यदि रखता है तो उसे बताना नहीं चाहता। हमारा मानना है कि वह बता भी नहीं सकता, क्योंकि नौकरियों की संख्या बहुत कम है और मांग बहुत अधिक है।
इस तथ्य को ऊपर दिया गया केंद्रीय मंत्री का आंकड़ा भी स्पष्ट करता है।
हमारे देश में दूध पूत बेचना पाप माना जाता रहा है। इसका अर्थ है कि खाने-पीने की चीजें बेची नहीं जाएंगी। आज हमने यह नियम तोड़ दिया है। खाने पीने की चीजों को न केवल बेचा जा रहा है बल्कि उन्हें जहर बनाकर बेचा जा रहा है। इसी प्रकार पूतों को नौकरी के नाम पर बेचा जा रहा है। जबकि वह अपना परंपरागत काम करते हुए समाज सेवा और राष्ट्र सेवा के लिए पैदा होते थे। आज उनकी जवानी कहीं और ही बीत जाती है और वह समाज के लायक नहीं रहते। यह स्थिति चिंतन का विषय है।
इस चिंतन के अनुरूप एक प्रश्न उत्पन्न होता है कि क्या हमारे देश में सभी युवाओं के लिए नौकरियां मिलना संभव है ? कदापि नहीं। क्योंकि देश में करोड़ों युवा बेरोजगार हैं।
जबकि सरकारी नौकरियां केवल दो करोड़ हैं। देश में अनुसूचित जनजाति के लोग लगभग 10 करोड़ हैं । जबकि शेड्यूल कास्ट 16 करोड़ से अधिक हैं ।ओबीसी भी लगभग 50% हैं। इस प्रकार स्पष्ट है कि देश की सारी नौकरियां भी यदि किसी एक वर्ग को दे दी जाएं तो भी उस एक वर्ग की पूर्ति नहीं पड़ सकती।
उपस्थित समस्या का समाधान है कि लोगों को उनके परंपरागत रोजगारों का आधुनिकीकरण करके उसी में खपाया जाए। अच्छी शिक्षा प्राप्त कर लेने का अर्थ यह नहीं है कि आप परंपरागत रोजगार छोड़कर बेरोजगार हो जाएं। अच्छी शिक्षा प्राप्त करने का अभिप्राय है कि आप और भी अधिक संस्कारित हो गए हैं और संस्कारित होकर आप और भी अधिक वैज्ञानिक ढंग से अपने परंपरागत काम में लग जाएं। अपने कार्य में सुधार करें, अपनी कार्य शैली में सुधार करें, अपने व्यवहार में सुधार करें, अपनी आत्मिक उन्नति करते हुए कल्याण की कामना करें - शिक्षा का केवल यही उद्देश्य है।
जहां तक राजनेताओं की बात है तो यह लोग चाहे सत्ता में रहें,चाहे सत्ता से बाहर रहें कभी आपको यह नहीं बताएंगे कि नौकरियां हैं ही नहीं। यह आपको अपने निहित स्वार्थों की पूर्ति के लिए जातिगत आधार पर बांटने की बात करेंगे, वर्ग संघर्ष को बढ़ावा देंगे, नौकरी का झांसा देते हुए आपको उच्च शिक्षा प्राप्त करने की प्रेरणा देंगे, परंतु जब नौकरी देने की बात आएगी तो कह देंगे की नौकरी नहीं हैं। हमको स्वयं को समझना पड़ेगा कि जब हमारे पास या हमारी व्यवस्था के पास नौकरी है ही नहीं तो हम क्यों नौकरी पाने की तैयारी कर रहे हैं ? हम अपनी परंपरागत नौकरियां अर्थात निजी व्यवसाय को क्यों छोड़ रहे हैं ? और यह भी देखें कि यदि परंपरागत व्यवसायों को हम छोड़ रहे हैं तो उन पर कब्जा कौन कर रहा है ? उन पर कब्जा करने से समस्या किसके लिए खड़ी हो रही है ? हमारे लिए या जो कब्जा कर रहा है उसके लिए। लोकतंत्र में नेता स्वयं को उजाले में रखकर जनता को अंधेरी सुरंग में भटकने के लिए छोड़ देते हैं। इतना ही नहीं सुरंग में प्रवेश कर गई जनता बाहर न निकले इसके लिए सुरंग के दोनों ओर के रास्ते भी बंद कर देते हैं। ऐसे निर्मल लोगों पर देश का जनमानस कब तक विश्वास करेगा ?
आज हम सबके लिए आवश्यक है कि हम सब मिलकर अपने प्राचीन राजनीतिशास्त्रियों, समाजशास्त्रियों, धर्मशास्त्रियों और न्यायशास्त्रियों की ओर लौटें। वेद की व्यवस्था की ओर लौटें। वेद की वर्ण व्यवस्था बहुत सोच समझकर बनाई गई है। जिसका प्रतिपादन मनुस्मृति में मनु महाराज द्वारा किया गया। आज मनु महाराज को गाली दी जा रही हैं और बिना सोचे समझे दी जा रही हैं कि मनुष्य के लिए मनु महाराज ने ऐसी कौन सी व्यवस्था दी थी जिसका अनुकरण आज भी किया जा सकता है ? वर्ण व्यवस्था में हम अपने परंपरागत निजी व्यवसायों को अपनाकर जीवन व्यतीत करते थे। उसमें हमारे श्रम पर पूंजी शासन नहीं करती थी बल्कि हम अपने श्रम का उचित पुरस्कार अपने आप प्राप्त करते थे । तब न कोई बिचौलिया था और न ही कोई श्रम का पुरस्कार देने वाला था, न ही कोई नौकरी थी। यदि कुछ था तो केवल समाज सेवा, राष्ट्र सेवा ,धर्म सेवा और मानव सेवा का भाव विद्यमान था। व्यक्ति अपने श्रम का अपने आप स्वामी था। स्वयं ही अपने आप को पुरस्कार देता था। उस आदर्श व्यवस्था पर आज चिंतन करने की आवश्यकता है और नौकरी की ओर भाग रहे युवाओं को रोककर अतीत के स्वर्णिम चिंतन से उसके मस्तिष्क को जोड़ने की आवश्यकता है।
अपने इस पावन राष्ट्रीय पर्व पर हम ऐसा ही चिंतन करें और देश को वर्तमान भँवरजाल से बाहर निकालने में सभी सहयोगी बनें,यही अपने महान स्वतंत्रता सेनानियों के प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी।




( लेखक डॉ राकेश कुमार आर्य सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता हैं)
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