पिता
डॉ अ कीर्ति वर्द्धनधूप में जलते हैं खुद और पाँव में छाले पड़े,
चलते रहे रात दिन, जितना भी चलना पड़े।
चिन्ता यही रहती है बस, परिवार खुशहाल हो,
बच्चों को रोटी मिले, चाहे भूखा खुद सोना पड़े।
रोते बहुत वह भी मगर, आँसू नजर आते नहीं,
भीतर से कोमल मगर, दर्द अपना कहते नही।
पी लेते हलाहल सारा, भोले शंकर की तरह,
थाम लेते वेग मगर, मुसीबतों से डरते नहीं।
डॉ अ कीर्ति वर्द्धन
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