प्रणय ऋचाओं में नाम तुम्हारा आता
कुमार महेंद्रअरुणोदय की प्रथम रश्मि के,
पावन आलोक में।
मलयज समीर के मधुर,
मादक सुरभित लोक में।
अर्चन के शुभ विधि-विधान में,
मन आराधन बन जाता।
प्रणय ऋचाओं में नाम तुम्हारा आता।।
तुम कोई क्षणिक स्वप्न नहीं,
नश्वरता का भ्रम भी नहीं।
तुम युग-युग के संचित पुण्यों की,
मनोवांछित परिणति हो कहीं।
अंतर्मन का शांत देवालय,
तेरी ही ज्योति जलाता।
प्रणय ऋचाओं में नाम तुम्हारा आता।।
हृदय-तंत्री झंकृत होती,
तेरी मधुमय स्मृतियों से।
धड़कन सरिता बह निकलती,
सुरभित सावन-वीथियों से।
अलौकिक प्रेम के महाग्रंथ में,
हर छंद तुम्हारा नाम सुनाता।
प्रणय ऋचाओं में नाम तुम्हारा आता।।
राधा-माधव सा निर्मल,
निष्काम हमारा अनुराग।
मीरा के अधरों पर जैसे,
थिरक उठे कोई मधुर विराग।
जन्म-जन्म का अमिट अनुबंध,
मिलन-कुसुम फिर खिल जाता।
प्रणय ऋचाओं में नाम तुम्हारा आता।।
नक्षत्रों के नीरव अंबर में,
चाँदनी जब मुस्काती है।
दो प्राणों की एकात्म कथा,
मधुरिम स्वर में गाती है।
प्रकृति का कण-कण तब,
प्रीत-सुधा बरसाता।
प्रणय ऋचाओं में नाम तुम्हारा आता।।
संध्या के गहन सलोने क्षण,
या उषा की स्वर्णिम बेला।
हर अनुभूति में तेरा स्पर्श,
हर स्वप्न में तेरा मेला।
जीवन के पावन यज्ञ में,
तेरा ही स्मरण सुहाता।
प्रणय ऋचाओं में नाम तुम्हारा आता।।
कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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