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आपातकाल की वर्षगांठ और लोकतंत्र का वर्तमान: क्या इतिहास केवल याद करने के लिए है?

आपातकाल की वर्षगांठ और लोकतंत्र का वर्तमान: क्या इतिहास केवल याद करने के लिए है?

डॉ. राकेश दत्त मिश्र

हर वर्ष 25 जून आते ही देश में अचानक लोकतंत्र के प्रति प्रेम उमड़ पड़ता है। सत्ता पक्ष बड़े गर्व से कहता है कि "आज ही के दिन 1975 में देश पर आपातकाल थोपा गया था।" टीवी चैनलों पर विशेष कार्यक्रम चलते हैं, सोशल मीडिया पर काले-सफेद चित्र साझा किए जाते हैं, भाषणों में लोकतंत्र बचाने की कसमें खाई जाती हैं और ऐसा वातावरण बनाया जाता है मानो लोकतंत्र का सबसे बड़ा प्रहरी आज की सरकार ही हो।

लेकिन एक सामान्य नागरिक यदि विनम्रता से पूछ बैठे-"महाराज! 51 वर्ष पहले की आपातकाल की कहानी तो सुना रहे हैं, जरा आज की कहानी भी सुना दीजिए?"-तो शायद उसे लोकतंत्र का व्यावहारिक पाठ पढ़ा दिया जाए।

यही हमारे समय का सबसे बड़ा व्यंग्य है।
आपातकाल तब था, या अब उसकी नई परिभाषा?
1975 के आपातकाल में संविधान के अनुच्छेदों के माध्यम से नागरिक अधिकारों पर रोक लगाई गई थी। आज शायद किसी औपचारिक घोषणा की आवश्यकता ही नहीं पड़ती। अब व्यवस्थाएँ इतनी आधुनिक हो चुकी हैं कि बिना "आपातकाल" घोषित किए भी नागरिक स्वयं को भय, दबाव और असुरक्षा के वातावरण में महसूस कर सकता है।
तब अखबारों पर सेंसर था। आज सेंसरशिप का तरीका अधिक परिष्कृत है। कोई अखबार सरकारी विज्ञापन के भय से चुप हो जाता है, कोई चैनल टीआरपी और लाइसेंस के दबाव में। जो कुछ बोलता है, उसके लिए जांच एजेंसियाँ, मुकदमे और नोटिस तैयार रहते हैं। लोकतंत्र का गला घोंटने के लिए अब ताले लगाने की आवश्यकता नहीं, केवल आर्थिक और प्रशासनिक दबाव पर्याप्त है।

लोकतंत्र का नया गणित

आज लोकतंत्र की नई परिभाषा कुछ इस प्रकार दिखाई देती है-

  • सरकार की प्रशंसा करो तो राष्ट्रभक्त।
  • प्रश्न पूछो तो राष्ट्रविरोधी।
  • समर्थन करो तो सम्मानित नागरिक।
  • विरोध करो तो संदिग्ध नागरिक।

लोकतंत्र में विपक्ष होना चाहिए, परंतु आज ऐसा प्रतीत होता है कि विपक्ष का सबसे बड़ा अपराध विपक्ष होना ही है।
जांच एजेंसियाँ: न्याय का साधन या राजनीतिक अस्त्र?

कहा जाता है कि कानून सबके लिए समान है। परंतु जनता कभी-कभी यह देखकर उलझ जाती है कि जांच एजेंसियों की सक्रियता चुनावों के आसपास अचानक क्यों बढ़ जाती है?

यदि कोई विपक्षी नेता सत्तारूढ़ दल में शामिल हो जाए तो उसके विरुद्ध वर्षों से चल रही जांच मानो हिमालय की बर्फ की तरह पिघल जाती है। कल तक जो भ्रष्टाचार का प्रतीक था, वह आज राष्ट्रनिर्माता बन जाता है।

जनता सोचती है-"शायद वॉशिंग मशीन केवल कपड़े ही नहीं, नेताओं का चरित्र भी धो देती है।"
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता: संविधान में सुरक्षित, व्यवहार में असुरक्षित

कागजों में हर नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्राप्त है। किंतु व्यवहार में कई लोग बोलने से पहले यह अवश्य सोचते हैं कि कहीं उनकी बात किसी शक्तिशाली व्यक्ति को असुविधाजनक न लग जाए।

आजकल लोग सत्य बोलने से पहले अपने वकील का नंबर याद रखते हैं।

व्यंग्यकारों का भी बुरा हाल है। पहले व्यंग्य लिखने पर पुरस्कार मिलता था, अब कभी-कभी नोटिस मिलने की आशंका अधिक रहती है।

मीडिया: चौथा स्तंभ या सरकारी सूचना पट्ट?

लोकतंत्र में मीडिया को चौथा स्तंभ कहा गया था। किंतु आज कई बार ऐसा लगता है कि वह चौथा स्तंभ नहीं, बल्कि सरकारी भवन की सजावटी दीवार बन गया है।

कई चैनलों पर बहस का विषय पहले तय होता है, निष्कर्ष पहले से लिखा होता है और फिर विशेषज्ञ बुलाए जाते हैं ताकि तय निष्कर्ष तक पहुंचने का अभिनय किया जा सके।

  • जो पत्रकार कठिन प्रश्न पूछे, वह असुविधाजनक कहलाता है।
  • जो केवल प्रशंसा करे, वह राष्ट्रनिर्माता पत्रकार कहलाता है।
  • महंगाई बढ़े तो कहा जाता है कि देश आगे बढ़ रहा है।
  • बेरोजगारी बढ़े तो कहा जाता है कि अवसर बढ़ रहे हैं।
  • कर बढ़ जाएँ तो कहा जाता है कि राष्ट्र निर्माण हो रहा है।
  • गैस सिलेंडर महंगा हो जाए तो कहा जाता है कि आत्मनिर्भर बनिए।
  • यदि जनता परेशान हो तो उसे बताया जाता है कि विश्वगुरु बनने की कीमत चुकानी पड़ती है।

ऐसा लगता है कि समस्याओं का समाधान नहीं, उनकी पैकेजिंग अधिक महत्वपूर्ण हो गई है।

लोकतंत्र का उत्सव या व्यक्तिपूजा?

लोकतंत्र संस्थाओं से चलता है, व्यक्तियों से नहीं। किंतु आज अनेक बार ऐसा प्रतीत होता है कि संस्थाएँ धीरे-धीरे व्यक्तियों के इर्द-गिर्द घूमने लगी हैं।

सरकार की उपलब्धियाँ एक व्यक्ति की उपलब्धियाँ बन जाती हैं।

असफलताएँ किसी अधिकारी, विपक्ष या पिछली सरकार की जिम्मेदारी बन जाती हैं।

सफलता का श्रेय ऊपर जाता है, असफलता का दोष नीचे आता है।
क्या यही लोकतंत्र है?

  • यदि नागरिक प्रश्न पूछने से डरे...
  • यदि पत्रकार सच लिखने से डरे...
  • यदि अधिकारी निष्पक्ष निर्णय लेने से डरे...
  • यदि न्याय पाने में वर्षों लग जाएँ...
  • यदि विरोध को देशद्रोह समझा जाने लगे...
  • तो लोकतंत्र केवल चुनावों का नाम रह जाता है।

लोकतंत्र केवल वोट डालने का अधिकार नहीं, बल्कि सत्ता से प्रश्न पूछने का भी अधिकार है।

इतिहास को याद कीजिए, पर वर्तमान को मत भूलिए

1975 का आपातकाल भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का एक गंभीर अध्याय था। उसकी आलोचना होनी चाहिए और उससे सीख भी लेनी चाहिए। किंतु यदि इतिहास को केवल राजनीतिक हथियार बना दिया जाए और वर्तमान की चुनौतियों पर मौन साध लिया जाए, तो इतिहास का स्मरण अधूरा रह जाएगा।

जो सरकारें केवल अतीत के आपातकाल पर भाषण देती हैं, उन्हें वर्तमान में लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की आज़ादी, निष्पक्ष प्रशासन और नागरिक अधिकारों की रक्षा के प्रति भी समान संवेदनशीलता दिखानी चाहिए।

लोकतंत्र की सबसे बड़ी पहचान यह नहीं कि सरकार अपनी प्रशंसा स्वयं करे, बल्कि यह है कि नागरिक बिना भय के उसकी आलोचना कर सके।

आज आवश्यकता किसी नए आपातकाल की घोषणा की नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों के पुनर्जीवन की है। इतिहास को याद करना आवश्यक है, किंतु उससे भी अधिक आवश्यक है कि वर्तमान ऐसा हो, जिसे भविष्य की पीढ़ियाँ लोकतंत्र का स्वर्णिम काल कह सकें—न कि ऐसा समय, जब आपातकाल शब्द संविधान में नहीं था, पर उसकी अनुभूति समाज में थी।

(यह लेख लोकतांत्रिक व्यवस्था, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शासन व्यवस्था पर एक व्यंग्यात्मक वैचारिक टिप्पणी है। इसका उद्देश्य किसी व्यक्ति विशेष पर आरोप लगाना नहीं, बल्कि सार्वजनिक विमर्श को प्रोत्साहित करना है।)

लेखक डॉ. राकेश दत्त मिश्र
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