न्याय केवल निष्पक्ष होना ही नहीं चाहिए, बल्कि निष्पक्ष दिखाई भी देना चाहिए।
न्यायायिक आयोग की मर्यादा का पालन नहीं करते हुए भारत भूषण तिवारी हत्याकांड की जाँच करने वाले पटना हाई कोर्ट के रिटायर्ड न्यायाधीश श्री विनोद कुमार सिन्हा पुलिस अधिकारियो और भारी संख्या में आधुनिक हथियार से लैस पुलिस कर्मियों के साथ बिलौटी गए जो कानूनी रूप से सही नहीं है l इन्होने अपनी जाँच की विश्वासनीयता अपनी साख को अपने क्रिया कलापों से शर्मसार किया है l
कानूनी तौर पर किसी भी जाँच आयोग की स्थिति ये होती है कि न्यायिक आयोग के दौरे के मानक नियम बनाये गए हैं जिनका उलंघन जाँच आयोग के अध्यक्ष श्री विनोद कुमार सिन्हा ने प्रथम दिन हीं कर दिया है l
क्या रिटायर्ड न्यायाधीश श्री विनोद कुमार सिन्हा को Commission of Inquiry Act, 1952 के नियमों मानदंड की जानकारी नहीं है l जांच आयोग को स्वतंत्र रूप से काम करना होता है l जाँच आयोग जब घटनास्थल का निरीक्षण करता है तो उसका मकसद सबूत इकट्ठा करना और गवाहों से मिलना होता है है l जाँच आयोग सार्वजनिक रूप से प्रत्येक मिडिया माध्यम से खबर प्रकाशित करवाता है कि इस घटना के सम्बन्ध में जिनको जिनको गवाही देना है जिनको कोई साक्ष्य सबूत देना है इसके लिए निर्धारित तिथि के अंदर आकर दे l
सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन PUCL vs Maharashtra 2014 में साफ तौर पर कहा है कि एनकाउंटर की जांच "स्वतंत्र और निष्पक्ष" होनी चाहिए l आयोग पर किसी का दबाव नहीं होना चाहिए l जबकि आयोग के अध्यक्ष के जाने से एक दिन पूर्व रात्रि को भोजपुर के पुलिस अधीक्षक अपने पुलिस अधिकारियों और बड़ी संख्या में अत्याधुनिक हथियार से लैस जवानों को लेकर गए और परिवार को एक तरह से धमकी भी देने की खबरे सामने आ रही हैं l जाँच आयोग को जब मालूम है कि इन्हीं भोजपुर के पुलिस अधिकारियो और एस टी एफ के जवानों पर सरेंडर के बाद हत्याकांड को अंजाम देने का आरोप है ऐसी स्थिति में भ्रष्टाचार के आरोप से घिरे जिलाधिकारी और भ्रष्टाचार के आरोप से घिरे उसी अनुमंडल अधिकारी को साथ लेकर क्यों गए जबकि मृतक की माँ ने स्पष्ट कहाँ कि षड़यंत्र कारी हत्या का जिम्मेवार आपके साथ आया है वैसी स्थिति में निष्पक्ष जाँच की उम्मीद संभव नहीं है l
सवाल है अगर सिर्फ सुरक्षा/लॉजिस्टिक के लिए पुलिस को साथ ले जाना जरुरी था तो आयोग के अध्यक्ष की सुरक्षा की जिम्मेदारी राज्य सरकार की होती है l DM/SP को सुरक्षा देनी पड़ती है l लेकिन पटना से सुरक्षा बल लेकर जाते स्थानीय पुलिस और सामान्य प्रशासन के अधिकारियो पर जब सीधा आरोप है तो उनको साथ लेकर जाना एवं एक दिन पूर्व रात्रि एस पी का परिवार से मिलना बिलकुल हीं अवैधानिक है l
सबको मालूम है स्थानीय पुलिस के जाने के कारण गवाह डर सकते हैं l गांव वाले आरोपित पुलिस के सामने खुलकर बयान नहीं देंगे l
आख़िरकार निष्पक्षता पर सवाल उठता है कि लगता है आयोग पुलिस के प्रभाव में काम कर रहा है l
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) के गाइडलाइन का उल्लंघन आयोग के अध्यक्ष ने खुले तौर पर किया है l NHRC कहता है आरोपित को जांच से दूर रखो l जब षड़यंत्र कारी अनुमंडल पदाधिकारी जगदीशपुर और जिलाधिकारी जिन्होंने भारत भूषण तिवारी को हरदम अपने कार्यालय में बेइज्जत किया मारने मरवाने की धमकी दिया हो कि मृतक के फेसबुक पोस्ट पर सामने उजागर हुआ है को साथ लेकर जाना गंभीर प्रश्न खड़ा करता है l
रिटायर्ड जस्टिस विनोद कुमार सिन्हा के मृतक के घर स्थानीय पुलिस अधिकारियों और आरोपित जिला प्रशासन के अधिकारियो के साथ क्यों गए यह सवाल गंभीर है l PUCL केस की भावना के खिलाफ जाकर आयोग के अध्यक्ष ने प्रथम दिन से हीं आयोग की विश्वसनीयता को समाप्त किया है विश्वासनीयता संदिग्ध हो जाती है l
अब पीड़ित परिवार के पास कानूनी रास्ता क्या है ?
आयोग को लिखित आपत्ति देना चाहिए l सारा सबूत के साथ जो कि सोशल मिडिया पर वीडियो के रूप में सामने आया है आयोग के अध्यक्ष को इन सभी सबूत के साथ शिकायत देना होगा कि स्थानीय पुलिस और आरोपित जिला प्रशासन के आने से जाँच प्रभावित हुआ है l पुलिस अधीक्षक रात्रि में मृतक के घर घटना के इतने दिन बाद किस नियत से आधुनिक हथियार बंद पुलिस अधिकारियो और काफ़ी संख्या में पुलिस बल के साथ आये इसलिए गवाह डर सकते हैं परिवार को प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूप से धमकियाँ दी गई है इसलिए पुलिस के साथ आने से अनुमंडल पदाधिकारी के आने जिलाधिकारी के कारण जांच प्रभावित हुई है l
इसके साथ हीं पटना उच्च न्यायालय में रिट दाखिल कर आयोग बदलने या CBI जांच की मांग करना चाहिए l
सारा सबूत जुटाकर कि किस तारीख को, कौन-कौन पुलिस अधिकारी और पुलिसकर्मी आये कौन आरोपित षड़यंत्र कारी अधिकारी आया सभी सबूत के साथ फोटो/वीडियो/गवाह के बयान को इकट्ठा कर पटना उच्च न्यायालय में रिट याचिका दाखिला करना चाहिए l
जो अज्ञानी यहाँ बिना मतलब के अपने बुद्धिहीनता से प्रश्न खड़ा करेंगे कि पीड़ित परिवार हीं सवाल उठा सकता है आम आदमी नहीं तो वो अज्ञानी किसी मुगालते में नहीं रहे l
इसका ज़बाब है हाँ सवाल बिल्कुल उठा सकता है l आम आदमी को आयोग की जांच पर सवाल उठाने का पूरा कानूनी हक है l हो रहे गैर कानूनी क्रिया कलाप और अन्याय के खिलाफ कोई भी आवाज़ उठा सकता है यह प्रत्येक व्यक्ति का संवैधानिक अधिकार है l
Commission of Inquiry Act, 1952 की धारा 8 B कहती है
अगर जांच में किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा पर आंच आ रही है, तो उसे सुनवाई का मौका मिलना चाहिए l भारत भूषण तिवारी समाज के लिए सिस्टम के भ्रष्टाचार अत्याचार कदाचार के खिलाफ लड़ाई लड़ा दलितों पिछड़ो बंचितों के नैसर्गिक संवैधानिक अधिकारों को दिलाने के लिए लड़ाई लड़ा l जब सरेंडर किया तो किसी को मारने का कानूनी या संवैधानिक अधिकार नहीं है यहाँ तक कि इसी देश में आतंकवादी और नक्सलियों को भी हथियार फेंकने के बाद इनकाउंटर करने का अधिकार नहीं है l
-इसलिए आयोग को "नैसर्गिक न्याय" के सिद्धांत मानने पड़ते हैं जो नहीं माना गया है l
संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a)*: बोलने और अभिव्यक्ति की आजादी देता है। आप शांतिपूर्ण तरीके से जांच पर सवाल उठा सकते हैं।
सुप्रीम कोर्ट PUCL vs Maharashtra 2014_ में कहा - एनकाउंटर की जांच पारदर्शी होनी चाहिए। जनता को सवाल पूछने का हक है।
. आम आदमी के पास 5 कानूनी रास्ते हैं l
1. आयोग में आपत्ति दर्ज करवाना l जांच आयोग को लिखित आवेदन आयोग को आपके बिंदु रिकॉर्ड में लेने पड़ेंगे l
2. हाईकोर्ट में PILपटना हाईकोर्ट कोर्ट आयोग बदल सकता है, CBI जांच दे सकता है l
3. NHRC में शिकायत राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग NHRC अपनी टीम भेजकर समानांतर जांच कर सकता है l
4. RTI डालना आयोग के सचिव को जांच की कार्यवाही, दौरे की रिपोर्ट मांग सकते हैं l
5. मीडिया/धरना शांतिपूर्ण प्रदर्शन जनदबाव से सरकार पर कार्रवाई का दबाव बनेगा l
चुकी जाँच की निष्पक्षता पहले दिन के क्रिया कलापों से संदिग्ध है इसलिए एक संवेदनशील नागरिक होने के कारण जाँच आयोग के अवैधानिक हरकत और गैर कानूनी क्रिया कलापों को उजागर करना मेरा संवैधानिक अधिकार है l
लेखक रमेश कुमार चौबे,महासचिव नागरिक अधिकार मंच
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