क्या कानून के राज में न्याय की जगह मुठभेड़ ले सकती है?
लक्ष्मण पांडेय, अधिवक्ता
किसी भी सभ्य, लोकतांत्रिक और संवैधानिक राष्ट्र की पहचान उसके कानून के शासन (Rule of Law) से होती है। भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को जीवन, स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति का मौलिक अधिकार प्रदान करता है। ऐसे में यदि किसी व्यक्ति की मृत्यु पुलिस कार्रवाई के दौरान संदिग्ध परिस्थितियों में होती है, तो यह केवल एक व्यक्ति की मृत्यु का प्रश्न नहीं रह जाता, बल्कि यह न्याय व्यवस्था, प्रशासनिक जवाबदेही और लोकतांत्रिक मूल्यों की भी परीक्षा बन जाता है।
भरत भूषण की जिस प्रकार से मृत्यु हुई है, उसने अनेक गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। यदि किसी व्यक्ति पर कोई आरोप था, तो उसके विरुद्ध विधिसम्मत कानूनी कार्रवाई की जानी चाहिए थी। कानून का उद्देश्य अपराधियों को दंडित करना है, न कि बिना न्यायिक प्रक्रिया के किसी को जीवन से वंचित कर देना। भारतीय न्याय व्यवस्था का मूल सिद्धांत है कि जब तक किसी व्यक्ति का अपराध न्यायालय द्वारा सिद्ध न हो जाए, तब तक उसे निर्दोष माना जाता है।
इस घटना ने आम जनमानस में गहरी चिंता और असुरक्षा की भावना पैदा की है। पुलिस, जो कानून लागू करने वाली संस्था है, उससे यह अपेक्षा की जाती है कि वह संविधान और विधि के दायरे में रहकर कार्य करेगी। यदि किसी कार्रवाई में अत्यधिक बल प्रयोग हुआ है अथवा परिस्थितियां ऐसी हैं जो पुलिस की भूमिका पर प्रश्नचिह्न लगाती हैं, तो उसकी निष्पक्ष एवं स्वतंत्र जांच होना लोकतांत्रिक व्यवस्था की अनिवार्यता है।
एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को अपनी बात रखने, शासन-प्रशासन की आलोचना करने तथा भ्रष्टाचार या अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाने का अधिकार देता है। यदि कोई व्यक्ति किसी अधिकारी या व्यवस्था के विरुद्ध अपनी बात रखता है, तो उसका उत्तर कानून और तथ्यों के आधार पर दिया जाना चाहिए, न कि भय, दमन या हिंसा के माध्यम से। लोकतंत्र में असहमति अपराध नहीं होती, बल्कि वह व्यवस्था को अधिक जवाबदेह और पारदर्शी बनाने का माध्यम होती है।
भरत भूषण प्रकरण में यदि पुलिस की कार्रवाई पर संदेह उत्पन्न हुआ है, तो यह आवश्यक है कि घटना के समय उपस्थित सभी पुलिसकर्मियों की भूमिका की निष्पक्ष जांच हो। विशेष रूप से उस अधिकारी की जिम्मेदारी भी निर्धारित की जानी चाहिए जिसके नेतृत्व में पूरी कार्रवाई संचालित की गई। जवाबदेही लोकतंत्र का मूल तत्व है और किसी भी पदाधिकारी को कानून से ऊपर नहीं माना जा सकता।
इतिहास साक्षी है कि जब भी राज्यसत्ता या उसके प्रतिनिधियों ने कानून से ऊपर उठकर कार्य करने का प्रयास किया है, तब समाज में अविश्वास और असंतोष की भावना बढ़ी है। आजादी के अमृतकाल में भारत ऐसी किसी व्यवस्था की कल्पना नहीं कर सकता, जहां नागरिकों को न्यायालय के बजाय बंदूक के साए में न्याय मिले। यह स्थिति हमें औपनिवेशिक शासन की उन कड़वी स्मृतियों की याद दिलाती है, जब सत्ता के बल पर नागरिक अधिकारों का दमन किया जाता था।
इसलिए आवश्यक है कि भरत भूषण की मृत्यु की जांच किसी स्वतंत्र एजेंसी या न्यायिक आयोग से कराई जाए, सभी तथ्यों को सार्वजनिक किया जाए और दोषी पाए जाने वाले व्यक्तियों के विरुद्ध कठोर कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित की जाए। न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, बल्कि होता हुआ दिखाई भी देना चाहिए। यही लोकतंत्र की आत्मा है और यही संविधान की अपेक्षा भी।
आज आवश्यकता किसी पक्ष विशेष का समर्थन या विरोध करने की नहीं, बल्कि सत्य, न्याय और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा करने की है। यदि हम कानून के शासन को कमजोर होने देंगे, तो उसका दुष्परिणाम पूरे समाज को भुगतना पड़ेगा। इसलिए भरत भूषण प्रकरण की निष्पक्ष जांच और दोषियों की जवाबदेही सुनिश्चित करना केवल एक व्यक्ति के लिए न्याय का प्रश्न नहीं, बल्कि लोकतंत्र और संविधान की प्रतिष्ठा का भी प्रश्न है।
लेखक लक्ष्मण पांडेय, अधिवक्ता
हमारे खबरों को शेयर करना न भूलें| हमारे फेसबुक पेज से जुड़े https://www.facebook.com/divyarashmimag हमारे यूटूब चैनल से अवश्य जुड़ें https://www.youtube.com/divyarashminews हमें ट्विटर पर फॉलो करे :- https://x.com/DivyaRashmi8


0 टिप्पणियाँ
दिव्य रश्मि की खबरों को प्राप्त करने के लिए हमारे खबरों को लाइक ओर पोर्टल को सब्सक्राइब करना ना भूले| दिव्य रश्मि समाचार यूट्यूब पर हमारे चैनल Divya Rashmi News को लाईक करें |
खबरों के लिए एवं जुड़ने के लिए सम्पर्क करें contact@divyarashmi.com
#NEWS,
#hindinews