घन बना दुल्हा
अरुण दिव्यांशकरने को प्यार ,
कर रहे शृंगार ,
नभ हुआ तैयार ,
घन है बेकरार ।
धरा दुल्हन बन ,
घन आया दुला तन ,
छक्का मारे दनादन ,
हुए अस्त व्यस्त जन ।
बारिस मूसलाधार ,
बहे तीव्र जलधार ,
घन उतरे भू के द्वार ,
नैन दिखे होते चार ।
घन देख धरा लजाई ,
ईश को दया है आई ,
ईश को है आभार ,
आज है मेरी सगाई ।
दस्तक दिल के द्वार ,
घन है क्षितिज पार ,
हो मिलन पहली बार ,
हुए दोनों हैं बेकरार ।
दादुर ने गीत है गाई ,
बजे झींगुर शहनाई ,
केंचुए बने बाराती ,
देख धरा मुस्कुराई ।
भूलोक बना हरिद्वार ,
करे बिजली है उद्गार ,
पवन कर रहा नृत्य ,
सूरज भागा मान हार ।
पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )बिहार ।
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