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मन के भाव

मन के भाव

संजय जैन
आज मुझे दोस्त और
दोस्ती याद आ गई।
वर्षो की कमाई पूंजी
फिर से काम आ गई।
चाहकर भी भूलें नही
हम अपनी पहचान को।
जो हम ने बनाई थी
बड़े ही अरमानों से।।


जिंदगी को विनम्रता से
तुम जी कर देखो।
अपने स्वार्थ से निकलकर
जनहित में बहना सीखो।
तेरी काया और सोच
फिर निश्चित बदलेगी।
जिससे जीवन की ऊँचाइयों
को छूने की आस बढ़ेगी।।


पल भर में जीवन मिटता है
पल भर में जीवन बनता है।
सोच सही होगी अगर तो
मानव जीवन ये खिलता है।
सबको अपना तुम समझो
सबसे नाता तुम जोड़ों।
बैर भाव की दृष्टि से
खुदको सदा दूर करो।।


मानवता की नीतियों का
तुम सदा सम्मान करो।
मानव को मानव ही समझो
मत उसे भगवान बनाओं।
चरण वंदना कर करके जो
तुमने सिर पर बिठाया है।
जिसके कारण ही उसने
मानवता को मिटाया है।।


जय जिनेंद्र
संजय जैन "बीना" मुंबई
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