"उम्मीद अभी ज़िंदा है"
रचना - डॉ. रवि शंकर मिश्र "राकेश"ज़ुल्म की आँधियों में भी दीप जलाए जाते हैं,
हौसले हों अगर दिल में, घर बचाए जाते हैं।
सिर्फ़ रोने से बदलती कब किसी की तक़दीर,
हक़ की ख़ातिर कई तूफ़ाँ भी उठाए जाते हैं।
हर अँधेरी रात का होना मुकद्दर तो नहीं,
सुबह के वास्ते कुछ ख़्वाब सजाए जाते हैं।
नफ़रतों की फ़सलें चाहे जहाँ बोई जाएँ,
प्यार के बीज मगर फिर भी उगाए जाते हैं।
झूठ कितना भी करे शोर ज़माने भर में,
सच के चेहरे कभी कब तक छुपाए जाते हैं।
जो लहू दे के वतन को नई साँसें देते,
नाम उनके ही सदा दिल में बसाए जाते हैं।
राकेश वक्त करता है हिसाब जालिमों का,
ताज कितनों के इसी राह गिराए जाते हैं।
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