भारत में भ्रष्टाचार नियंत्रण एवं पारदर्शिता सुधार : जवाबदेह शासन की दिशा में ठोस कदम
रमेश कुमार चौबे
महासचिव, नागरिक अधिकार मंच एवं सामाजिक कार्यकर्ता
भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। लोकतंत्र की सफलता केवल चुनाव कराने से नहीं मापी जाती, बल्कि इस बात से निर्धारित होती है कि शासन व्यवस्था कितनी पारदर्शी, जवाबदेह और जनोन्मुखी है। यदि सरकारी संस्थाओं पर जनता का विश्वास कमजोर पड़ने लगे, तो लोकतांत्रिक व्यवस्था भी चुनौती का सामना करने लगती है।
आज देश में अधिकांश नागरिकों की यह अपेक्षा है कि सरकारी संसाधनों का उपयोग पूरी ईमानदारी से हो, भ्रष्टाचार पर प्रभावी अंकुश लगे और प्रत्येक लोकसेवक अपने दायित्वों के प्रति उत्तरदायी हो। यह कहना उचित नहीं होगा कि पूरा तंत्र भ्रष्ट है, क्योंकि देश में लाखों ईमानदार अधिकारी, कर्मचारी और जनप्रतिनिधि पूरी निष्ठा से कार्य कर रहे हैं। किंतु कुछ मामलों में सामने आने वाले भ्रष्टाचार के आरोप पूरे प्रशासनिक तंत्र की विश्वसनीयता को प्रभावित करते हैं। इसलिए आवश्यकता किसी व्यक्ति विशेष को दोषी ठहराने की नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था विकसित करने की है जिसमें ईमानदार अधिकारियों का सम्मान बढ़े और भ्रष्टाचार की संभावनाएँ स्वतः कम हों।
भ्रष्टाचार : विकास की सबसे बड़ी बाधा
भ्रष्टाचार केवल आर्थिक अपराध नहीं है। यह सामाजिक न्याय, समान अवसर, सुशासन और लोकतांत्रिक मूल्यों पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है। जब किसी योजना का धन अपने वास्तविक लाभार्थियों तक नहीं पहुँचता, जब योग्य व्यक्ति अवसर से वंचित हो जाता है, जब सरकारी सेवाओं के लिए रिश्वत की शिकायतें सामने आती हैं, तब जनता का विश्वास कमजोर होता है।
इसका सबसे अधिक दुष्प्रभाव गरीब, किसान, मजदूर, छात्र और आम नागरिक पर पड़ता है। विकास परियोजनाओं की लागत बढ़ती है, सार्वजनिक सेवाओं की गुणवत्ता प्रभावित होती है और प्रशासनिक व्यवस्था के प्रति निराशा बढ़ती है।
जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक सुधार
- वार्षिक संपत्ति विवरण और सत्यापन:- सभी वेतनभोगी सरकारी कर्मचारियों, अधिकारियों तथा वेतन या पेंशन प्राप्त करने वाले जनप्रतिनिधियों से प्रत्येक वर्ष उनकी चल एवं अचल संपत्तियों का विवरण लिया जाना चाहिए। जहाँ कानून अनुमति देता हो, वहाँ उच्च जोखिम वाले संवेदनशील पदों पर कार्यरत अधिकारियों के मामलों में जोखिम-आधारित स्वतंत्र सत्यापन की व्यवस्था भी की जा सकती है। इससे ईमानदार अधिकारियों की विश्वसनीयता बढ़ेगी और संदिग्ध मामलों की पहचान आसान होगी।
- परिवार की वित्तीय पारदर्शिता:- कई बार भ्रष्टाचार से अर्जित संपत्ति प्रत्यक्ष रूप से संबंधित अधिकारी के नाम पर नहीं होती। यदि किसी वैधानिक जांच के दौरान यह उचित आधार पर संदेह उत्पन्न हो कि अवैध संपत्ति परिवार या अन्य व्यक्तियों के नाम पर छिपाई गई है, तो कानून के अनुसार संबंधित वित्तीय लेन-देन और संपत्ति के स्रोत की जांच की जानी चाहिए। यह प्रक्रिया केवल विधिक प्रावधानों और पर्याप्त आधार पर ही अपनाई जानी चाहिए ताकि निर्दोष व्यक्तियों के अधिकार सुरक्षित रहें।
- डिजिटल डेटा समन्वय:- आज डिजिटल तकनीक के युग में विभिन्न सरकारी अभिलेख उपलब्ध हैं। आयकर विवरण, संपत्ति पंजीकरण, कंपनी रिकॉर्ड, बैंकिंग सूचनाएँ (जहाँ कानून अनुमति देता हो) और अन्य सरकारी डेटाबेस के बीच वैधानिक एवं गोपनीयता-सम्मत डिजिटल मिलान से संदिग्ध मामलों की पहचान अधिक प्रभावी ढंग से की जा सकती है। मानव विवेक के साथ तकनीकी विश्लेषण जुड़ने से भ्रष्टाचार की रोकथाम अधिक सशक्त हो सकती है।
- शिकायतों का समयबद्ध निस्तारण:- भ्रष्टाचार संबंधी शिकायतें वर्षों तक लंबित रहने से जनता का विश्वास कम होता है। प्रत्येक शिकायत की प्रारंभिक जांच निश्चित समय-सीमा, जैसे 90 दिनों के भीतर, पूरी करने का प्रयास होना चाहिए। साथ ही जांच एजेंसियों की जवाबदेही भी सुनिश्चित होनी चाहिए कि बिना कारण मामलों को लंबित न रखा जाए।
- व्हिसलब्लोअर सुरक्षा को प्रभावी बनाना:- भ्रष्टाचार उजागर करने वाले नागरिकों, पत्रकारों और सरकारी कर्मचारियों को पर्याप्त सुरक्षा मिलना अत्यंत आवश्यक है। यदि सूचना देने वाले व्यक्ति को प्रताड़ना, स्थानांतरण, झूठे मुकदमे या अन्य प्रकार के दबाव का भय रहेगा, तो कोई भी आगे आने का साहस नहीं करेगा। इसलिए व्हिसलब्लोअर संरक्षण की व्यवस्था व्यवहारिक, प्रभावी और भरोसेमंद होनी चाहिए।
- दोष सिद्ध होने पर कठोर कार्रवाई:- यदि विधिसम्मत जांच और न्यायिक प्रक्रिया के बाद भ्रष्टाचार सिद्ध हो जाता है, तो संबंधित अधिकारी या व्यक्ति के विरुद्ध कानून के अनुसार विभागीय कार्रवाई, आपराधिक अभियोजन तथा जहाँ लागू हो, अवैध संपत्ति की जब्ती जैसी प्रक्रियाएँ प्रभावी ढंग से लागू की जानी चाहिए। साथ ही यह भी उतना ही आवश्यक है कि जांच पूरी होने से पहले किसी व्यक्ति को दोषी घोषित न किया जाए। न्याय का मूल सिद्धांत है कि प्रत्येक व्यक्ति को निष्पक्ष प्रक्रिया का अधिकार प्राप्त है।
जनभागीदारी से ही बनेगा पारदर्शी शासन
सरकार को समय-समय पर यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि:-
- भ्रष्टाचार की शिकायत दर्ज कराने की वर्तमान वैधानिक प्रक्रिया क्या है।
- कौन-कौन सी एजेंसियाँ ऐसे मामलों की जांच करती हैं।
- आम नागरिक किस प्रकार प्रमाण सहित शिकायत प्रस्तुत कर सकते हैं।
- शिकायतकर्ता के अधिकार और सुरक्षा के क्या प्रावधान हैं।
- इन व्यवस्थाओं को और प्रभावी बनाने के लिए सरकार किन सुधारों पर विचार कर रही है।
यदि सरकार इन विषयों पर व्यापक जनपरामर्श आयोजित करे और विभिन्न सामाजिक संगठनों, विशेषज्ञों, पूर्व न्यायाधीशों, प्रशासनिक अधिकारियों तथा नागरिकों से लिखित सुझाव आमंत्रित करे, तो नीतियाँ अधिक प्रभावी और स्वीकार्य बन सकती हैं। प्राप्त सुझावों का सार्वजनिक सारांश भी जारी किया जाना चाहिए ताकि नीति-निर्माण की प्रक्रिया अधिक पारदर्शी हो।
नागरिक अभियान की आवश्यकता
- केवल एक ज्ञापन भेज देना पर्याप्त नहीं है। यदि वास्तव में भ्रष्टाचार नियंत्रण को जनआंदोलन का स्वरूप देना है, तो नागरिक समाज को संगठित और तथ्य-आधारित पहल करनी होगी।
एक व्यापक "भ्रष्टाचार के खिलाफ नागरिक अभियान" प्रारंभ किया जा सकता है, जिसके प्रमुख उद्देश्य हों:-
- सूचना के अधिकार (RTI) का प्रभावी उपयोग।
- सरकारी रिपोर्टों और आधिकारिक आँकड़ों का अध्ययन।
- कानूनों और नीतियों पर जन-जागरूकता।
- भ्रष्टाचार विरोधी संस्थाओं की कार्यप्रणाली की जानकारी।
- जनहित याचिकाओं एवं नीति-सुधार संबंधी सुझावों का संकलन।
- युवाओं, शिक्षाविदों, अधिवक्ताओं, पत्रकारों और सामाजिक संगठनों की सहभागिता।
- जब जनभावना तथ्यों, शोध और वैधानिक सुझावों के साथ सामने आती है, तब उसके नीति-निर्माण पर प्रभाव की संभावना अधिक होती है।
ईमानदार व्यवस्था ही सशक्त राष्ट्र की पहचान
भारत आज विश्व की अग्रणी अर्थव्यवस्थाओं में स्थान बनाने की दिशा में अग्रसर है। ऐसे समय में पारदर्शी और जवाबदेह प्रशासन केवल नैतिक आवश्यकता नहीं, बल्कि आर्थिक विकास की भी अनिवार्य शर्त है।
भ्रष्टाचार विरोधी प्रयासों का उद्देश्य किसी संस्था या व्यक्ति की प्रतिष्ठा को ठेस पहुँचाना नहीं होना चाहिए। इसके विपरीत, लक्ष्य ऐसी व्यवस्था का निर्माण होना चाहिए जिसमें ईमानदार अधिकारी सम्मानपूर्वक कार्य कर सकें, भ्रष्टाचार की संभावना न्यूनतम हो और जनता का विश्वास शासन पर निरंतर मजबूत होता जाए।
लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति जनता का विश्वास है, और जनता का विश्वास तभी सुदृढ़ होता है जब शासन पारदर्शी, उत्तरदायी और न्यायपूर्ण हो। इसलिए समय की मांग है कि प्रशासनिक सुधार, डिजिटल पारदर्शिता, समयबद्ध जांच, व्हिसलब्लोअर सुरक्षा, जनभागीदारी और प्रभावी जवाबदेही जैसे उपायों को और सशक्त बनाया जाए।
भ्रष्टाचार के विरुद्ध संघर्ष किसी सरकार, किसी दल या किसी संस्था के विरुद्ध नहीं, बल्कि सुशासन, संवैधानिक मूल्यों और राष्ट्रहित के पक्ष में होना चाहिए। जब शासन और समाज मिलकर ईमानदारी, पारदर्शिता और उत्तरदायित्व की संस्कृति विकसित करेंगे, तभी भारत एक अधिक न्यायपूर्ण, विश्वासपूर्ण और सशक्त लोकतंत्र के रूप में आगे बढ़ सकेगा।
लेखक रमेश कुमार चौबे नागरिक अधिकार मंच एवं सामाजिक कार्यकर्ता महासचिव|
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