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किसान और ग्राम्य संस्कृति को जोड़ने वाला राष्ट्रीय अभियान खेत बचाओ अभियान

किसान और ग्राम्य संस्कृति को जोड़ने वाला राष्ट्रीय अभियान खेत बचाओ अभियान


लेखक,-अशोक “प्रवृद्ध” आध्यात्मिक चिंतक व साहित्यकार है |

भारतीय परंपरा व साहित्य में भूमि केवल एक भौतिक पिण्ड, धूल का ढेर या आर्थिक उपार्जन का साधन मात्र नहीं है, बल्कि यह वसुंधरा है, रत्नों को धारण करने वाली और सर्वभूतानां माता है। अथर्ववेद के भूमि सूक्त 12/1 में उद्घोषित- भूमि मेरी माता है और मैं इस पृथ्वी का पुत्र हूं, भूमि की इसी महत्ता का प्रतीक है-

माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः।

यह मातृ-पुत्र का संबंध केवल एक काव्यात्मक उपमा नहीं है, अपितु यह पारिस्थितिकी, पर्यावरण संतुलन और धारणीय कृषि का वह आध्यात्मिक और वैज्ञानिक मूलमंत्र है, जो आधुनिक विज्ञान को भी दिशा प्रदान करने में सक्षम है। वर्तमान समय में केंद्र सरकार द्वारा संचालित खेत बचाओ अभियान के परिप्रेक्ष्य में कृषि और मृदा स्वास्थ्य का विश्लेषण करने से यह स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है कि भारतीय प्राचीन जीवन दृष्टि कितनी वैज्ञानिक और दूरदर्शी थी। आज की कृषि प्रणालियों, विशेषकर हरित क्रांति के पश्चात रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों और अनियंत्रित जल दोहन के कारण खेतों की उर्वरा शक्ति निरंतर क्षीण हो रही है। इस विकट परिस्थिति को समझते हुए भारत सरकार और कृषि मंत्रालय द्वारा राष्ट्रव्यापी स्तर पर खेत बचाओ अभियान का संचालन किया जा रहा है, जिसका उद्देश्य मिट्टी की सेहत को संरक्षित करना, रासायनिक उर्वरकों का संतुलित उपयोग सुनिश्चित करना और प्राकृतिक व जैविक खेती को जन आंदोलन के रूप में स्थापित करना है।

केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय द्वारा संचालित खेत बचाओ अभियान केवल एक जागरूकता कार्यक्रम नहीं है, अपितु यह खेत, किसान और ग्राम्य संस्कृति को जोड़ने वाला एक वृहद राष्ट्रीय अभियान है। इसके अंतर्गत भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद और कृषि विज्ञान केंद्रों के वैज्ञानिक गांव- गांव जाकर किसानों को मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन, मौसम व बाजार के अनुसार कृषि सलाह, और प्राकृतिक खेती की विधियों का प्रशिक्षण दे रहे हैं। खेतों की घटती उर्वरता और अंधाधुंध रासायनिक खाद के प्रयोग ने भूमि में कार्बनिक पदार्थों के स्तर को काफी कम कर दिया है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी मिटटी बचाओ अभियान जैसे अभियानों ने इस बात पर जोर दिया है कि कृषि भूमि में कम से कम 3% से 6% तक कार्बनिक तत्व होने चाहिए, जो वर्तमान में घटकर 1% से भी कम हो गए हैं। वर्तमान सरकार की नीतियां, जैसे मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना, प्राकृतिक खेती, और अब यह खेत बचाओ अभियान, इसी दिशा में किए जा रहे ठोस और व्यावहारिक सरकारी प्रयास हैं। इन प्रयासों का उद्देश्य भूमि को रासायनिक मुक्त करना, मिट्टी की जैविक क्षमता को पुनर्जीवित करना तथा जल धारण क्षमता को बढ़ाना है।

प्राचीन भारत में कृषि केवल एक व्यवसाय नहीं थी, बल्कि यह ऋषि-कृषि की परंपरा थी। भारतीय प्राचीन ग्रंथों में मिट्टी की गुणवत्ता, उसके प्रकार और पोषण प्रबंधन का अत्यंत सूक्ष्मता से वर्णन किया गया है। ऋग्वेद और अथर्ववेद में भूमि का वर्गीकरण उसकी उर्वरता और भौतिक गुणों के आधार पर किया गया है। कृषि विज्ञान पर आधारित एक प्राचीन ग्रंथ कृषि पराशर में मिट्टी के विभिन्न प्रकारों का विस्तृत वर्णन मिलता है। उपजाऊ भूमि, ऊसर, मरुभूमि और नदियों द्वारा लाई गई जलोढ़ मिट्टी के गुणों का वैज्ञानिक विवेचन प्राचीन ग्रंथों में उपलब्ध है। आधुनिक काल में मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना के माध्यम से मिट्टी की जांच की जा रही है, परंतु प्राचीन काल में मिट्टी की उर्वरता को परखने के लिए प्राकृतिक और जैविक संकेतकों का प्रयोग किया जाता था। भूमि के रंग, स्वाद, स्पर्श और उस पर उगने वाले प्राकृतिक वनस्पति के आधार पर मिट्टी की गुणवत्ता का आकलन किया जाता था। उदाहरण के लिए, जिस भूमि पर दूर्वा (घास), शमी या बेल के वृक्ष होते थे, उसे कृषि के लिए अत्यंत उत्तम माना जाता था। ऋग्वेद के चतुर्थ मंडल 4/57 में अंकित कृषि सूक्त को कृषि के विकास और भूमि पूजन का प्रथम दस्तावेज़ माना जा सकता है। इसमें कृषि और कृषक के महत्व को सर्वोच्च स्थान दिया गया है। ऋग्वेद 4/56 में सीता शब्द का प्रयोग खेत की जुताई के बाद बनी रेखाओं और कृषि देवी के रूप में किया गया है। मंत्रों में प्रार्थना की जाती है कि हल सुचारू रूप से चले, भूमि धन-धान्य से परिपूर्ण हो और उसमें पर्याप्त नमी बनी रहे। ऋग्वेद के इस सूक्त के मंत्रों में प्राकृतिक शक्तियों और भूमि के बीच सामंजस्य स्थापित करने की प्रार्थना है। जुताई के समय बैलों, हल और भूमि के उपकरणों को देवतुल्य मानकर उनका सम्मान किया जाता था। यह दृष्टिकोण दर्शाता है कि प्राचीन भारत में कृषि एक पवित्र कर्म था, जिसका मूल उद्देश्य प्रकृति का दोहन नहीं, बल्कि उसके साथ सह अस्तित्व था।

भारतीय चिंतन में ऋत की अवधारणा बहुत ही महत्वपूर्ण है। ऋत का अर्थ है- ब्रह्मांडीय व्यवस्था, नैतिक नियम और प्रकृति के संतुलन का शाश्वत क्रम। खेत और पर्यावरण को बचाने का अर्थ है- इस ऋत के नियम का पालन करना। जब आधुनिक कृषि रसायनों के माध्यम से प्रकृति की इस व्यवस्था (ऋत) में हस्तक्षेप करती है, तो विकृति जन्म लेती है।
वर्तमान खेत बचाओ अभियान के तहत जिस प्रकार प्राकृतिक खेती को अपनाने पर बल दिया जा रहा है, वह इसी ऋत की पुनः स्थापना का प्रयास है। प्राचीन ग्रंथों में उल्लेखित है कि यदि हम भूमि का शोषण करेंगे, तो भूमि हमें अन्न देना बंद कर देगी। वेदों में प्रकृति के नियमों का उल्लंघन करने को पाप माना गया है, जिसका वैज्ञानिक अर्थ पारिस्थितिकी तंत्र का असंतुलन है। खेत बचाओ अभियान भी हमें इसी बात की याद दिला रहा है कि हमें अपनी कृषि पद्धतियों को प्रकृति के नियमों के अनुकूल बनाना होगा।

रामायण और महाभारत आदि महाकाव्यों में तत्कालीन भारत की सामाजिक-आर्थिक और कृषि व्यवस्था का विशद चित्रण मिलता है। वाल्मीकि रामायण के अयोध्या कांड में जब महर्षि वाल्मीकि भरत से पूछते हैं, तो वे राज्य की कृषि और किसानों की स्थिति पर विशेष चर्चा करते हैं। रामराज्य में कृषि केवल वर्षा (पर्जन्य) पर ही निर्भर नहीं थी, बल्कि जल संरक्षण और सिंचाई के साधनों, जैसे कूप, तालाब का उचित प्रबंधन था। रामायण में कृषि को वार्ता अर्थात अर्थव्यवस्था का मूल कहा गया है। यह स्पष्ट किया गया है कि राजा का धर्म है कि वह भूमि की रक्षा करे और कृषकों को कृषि के लिए उत्तम संसाधन उपलब्ध कराए। महाभारत के शांतिपर्व में भीष्म पितामह युधिष्ठिर को राजधर्म की शिक्षा देते हुए कृषि के महत्व को प्रतिपादित करते हैं। शांतिपर्व में स्पष्ट निर्देश है कि राजा को किसानों को बीज, खाद और सिंचाई के साधन समय पर उपलब्ध कराने चाहिए-
कृषिर्वृत्तिः सतां श्रेष्ठा कृषिर्विश्वस्य मातरम्।
अर्थात- कृषि ही सज्जनों की सर्वश्रेष्ठ आजीविका है और कृषि ही इस विश्व का पालन करने वाली है।

महाभारत में भूमि को माता के समान सम्मान देने की बात कही गई है और यह चेतावनी दी गई है कि जो राजा या मनुष्य भूमि की उर्वरता को नष्ट करता है, वह विनाश की ओर अग्रसर होता है। वर्तमान सरकार का जो खेत बचाओ अभियान है, उसका मूल दर्शन भी यही है कि यदि खेत (मातृभूमि) सुरक्षित नहीं रहेंगे, तो देश की खाद्य सुरक्षा खतरे में पड़ जाएगी।
वराहमिहिर द्वारा रचित बृहत् संहिता के सस्यपादप अध्याय अर्थात कृषि संबंधी अध्याय में पेड़ों और फसलों के रोगों के उपचार और उनके पोषण का विस्तृत वर्णन है। इसमें बताया गया है कि भूमि को कैसे उपजाऊ बनाया जाए? विशेष रूप से, पौधों में वृद्धि के लिए और भूमि की उर्वरा शक्ति को बढ़ाने के लिए कुनप जल - सड़ी हुई पत्तियों, गोबर और अन्य जैविक पदार्थों का मिश्रण के प्रयोग का वैज्ञानिक नुस्खा दिया गया है। यह आधुनिक जैविक कृषि और खेत बचाओ अभियान के जैविक घटकों का प्राचीनतम और सबसे सटीक प्रमाण है।
कौटिल्य के अर्थशास्त्र में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि राज्य को ऐसे क्षेत्रों की पहचान करनी चाहिए, जो कृषि के योग्य हैं और वहां जल संरक्षण, जैसे सुदर्शन झील जैसी प्रणालियां, का प्रबंध करना चाहिए। कौटिल्य ने भूमि की उत्पादकता को बनाए रखने के लिए फसल चक्र और मौसम के अनुसार कृषि करने का आदेश दिया था। आज खेत बचाओ अभियान के तहत कृषि मंत्रालय भी यही कर रहा है- मौसम, मिट्टी और बाजार के अनुसार किसानों को फसल उगाने की सलाह दी जा रही है।

आधुनिक समय में जिस प्रकार यूरिया, डीएपी, कीटनाशक आदि रसायनों ने भूमि को बंजर और जहरीला बना दिया है, उसके समाधान के लिए प्राचीन ऋषि-कृषि की ओर लौटना ही एकमात्र विकल्प बचता है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद और कृषि विज्ञान केंद्र, जो खेत बचाओ अभियान का नेतृत्व कर रहे हैं, किसानों को जैविक खाद, वर्मीकम्पोस्ट, और प्राकृतिक पोषक तत्वों के उपयोग का प्रशिक्षण दे रहे हैं। प्राचीन ग्रंथों में मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने के लिए गोमय (गोबर), गोमूत्र, और पौधों के अवशेषों से बनी खाद का ही प्रयोग किया जाता था। अथर्ववेद में भूमि को उपजाऊ बनाने और कीटों से बचाने के लिए विभिन्न प्राकृतिक औषधियों और यज्ञीय धूम्र (हवन सामग्री) का प्रयोग करने का उल्लेख है। ये विधियां न केवल भूमि की उर्वरता को लंबे समय तक बनाए रखती हैं, बल्कि उपज की गुणवत्ता को भी सर्वोच्च स्तर पर रखती हैं। वर्तमान खेत बचाओ अभियान का भी यही लक्ष्य है- संतुलित उर्वरक उपयोग और टिकाऊ कृषि पद्धतियों को अपनाना। अथर्ववेद के भूमि सूक्त के मंत्र पर्यावरण, भूमि संरक्षण और आधुनिक पारिस्थितिकी के घोषणा पत्र के समान हैं-
यस्यां वपन्ति पोजनाः धान्यं यवम्। यस्यां गावः पिबन्त्यस्यै विभ्रती बहुधा ।

-अथर्ववेद 12/1/42
अर्थात- यह भूमि, जिस पर लोग विभिन्न प्रकार के धान्य और जौ बोते हैं तथा जिस पर गायें और अन्य जीव-जंतु चरते हैं, वह पृथ्वी हमारा सब प्रकार से पोषण करे।
भूमि सूक्त में पृथ्वी के विभिन्न स्वरूपों, पहाड़ों, जंगलों, और नदियों का गुणगान किया गया है। महर्षि अथर्व कहते हैं कि पृथ्वी पर पाए जाने वाले सभी जीव-जंतु और वनस्पतियां परस्पर एक-दूसरे के पूरक हैं। भूमि सूक्त हमें यह शिक्षा देता है कि कृषि भूमि का उपयोग करते समय हमें उसके प्राकृतिक गुणों का ह्रास नहीं करना चाहिए। वर्तमान खेत बचाओ अभियान में जिस मिट्टी की सेहत की बात की जा रही है, वह वास्तव में इसी भूमि सूक्त की वैज्ञानिक और व्यावहारिक अभिव्यक्ति है। यदि हम अथर्ववेद की इस चेतना को अपने हृदय में उतार लें, तो खेत बचाओ अभियान स्वतः ही एक सफल राष्ट्रीय यज्ञ बन जाएगा।

खेत बचाओ अभियान के अंतर्गत केवल मिट्टी ही नहीं, बल्कि जल का संरक्षण भी एक प्रमुख अंग है। प्राचीन ग्रंथों में जल को प्राण कहा गया है। ऋग्वेद में जल और भूमि के संतुलन पर कई सूक्त हैं। प्राचीन भारत में कृषि वर्षा के अतिरिक्त जल संचयन पर भी निर्भर करती थी। चाणक्य के अर्थशास्त्र में खेतों के चारों ओर सेतु (बांध) और तालाब बनाने के नियम दिए गए हैं ताकि खेतों को नमी मिलती रहे। आधुनिक काल में जल की कमी और अति दोहन के कारण खेत बंजर हो रहे हैं। प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना और खेत बचाओ अभियान के तहत ड्रिप इरिगेशन और स्प्रिंकलर का उपयोग कर जल बचाने पर विशेष बल दिया जा रहा है। प्राचीन भारतीय ग्रंथों में जल का दुरुपयोग न करने और जल को पवित्र बनाए रखने का जो संदेश दिया गया है, वह आज खेत और किसानी को बचाने के लिए अत्यंत प्रासंगिक है।

भारतीय कृषि का आधार सदा से गौ माता रही है। वर्तमान खेत बचाओ अभियान और प्राकृतिक खेती मिशन में गाय के गोबर और गोमूत्र से बनी जीवामृत और बीजामृत के उपयोग को बहुत प्रोत्साहित किया जा रहा है। प्राचीन ग्रंथों में पंचगव्य का बहुत महत्व है। कृषि पराशर और अन्य ग्रंथों में पंचगव्य अर्थात गाय का गोबर, गोमूत्र, दूध, दही और घी का फसलों पर छिड़काव करने के लाभों का वर्णन है। यह न केवल भूमि की उर्वरता को बढ़ाता है, बल्कि पौधों को रोगों से भी बचाता है। आधुनिक कृषि रसायनों ने जहां एक ओर खेतों को नष्ट किया है, वहीं दूसरी ओर गो आधारित प्राचीन कृषि प्रणालियां खेत बचाओ अभियान का सबसे शक्तिशाली और प्रभावी अस्त्र बनकर उभरी हैं। गो आधारित खेती से मिट्टी में सूक्ष्म जीवों की संख्या बढ़ती है, जिससे मिट्टी फिर से जीवित हो उठती है।

भारतीय परंपरा में ऋषि-कृषि का तात्पर्य है- ऐसा कृषि कार्य जो प्रकृति के नियमों के अनुरूप हो और जिसमें स्वार्थ के बजाय परोपकार और लोकमंगल की भावना हो। आज का खेत बचाओ अभियान भी इसी प्राचीन भारतीय मूल्य की ओर लौटने का एक सरकारी और संस्थागत प्रयास है। अत्यधिक लाभ कमाने की चाह में कृषि में जो रासायनिक विष घोला गया है, उसने भूमि को रुग्ण कर दिया है। कृषि मंत्रालय के अनुसार आज खेत बचाओ अभियान के माध्यम से करोड़ों किसानों तक संतुलित उर्वरक उपयोग की जानकारी पहुंच रही है। यह भारतीय कृषि के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ है। हमारे प्राचीन ग्रंथों में बार-बार इस बात की चेतावनी दी गई है कि यदि हम वसुंधरा (पृथ्वी) का शोषण करेंगे, तो एक दिन ऐसा आएगा जब वह अन्न उपज देना बंद कर देगी। खेत बचाओ अभियान इसी संभावित विनाश को रोकने के लिए भारत सरकार की एक समयोचित, अनुसंधानात्मक और दूरगामी पहल है।

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