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वर्दी, सत्ता और बलि का बकरा: इतिहास की वही पुरानी पटकथा

वर्दी, सत्ता और बलि का बकरा: इतिहास की वही पुरानी पटकथा

डॉ. राकेश दत्त मिश्र

लोकतंत्र में एक बड़ा रोचक खेल चलता है। नेता आदेश देता है, अफसर संकेत समझता है, पुलिस कार्रवाई करती है और जब समय का पहिया घूमता है तो सबको पता चलता है कि अपराध किसने किया था-वही जिसने आदेश का पालन किया था।

आरा में जो घटना हुई, उसने एक बार फिर भारतीय लोकतंत्र की उस पुरानी कहावत को जीवित कर दिया है कि "राजा कभी गलत नहीं होता, गलत हमेशा उसका सिपाही होता है।"

पुलिसकर्मियों की भी अपनी एक अलग दुनिया होती है। उन्हें लगता है कि मंत्री जी की मुस्कान ही उनका सेवा-पुस्तक है और विधायक जी की कृपा ही संविधान। सत्ता के इशारे पर वे कभी लाठी चलाते हैं, कभी गोलियां चलाते हैं और कभी-कभी तो इंसानियत पर भी बुलडोजर चला देते हैं। लेकिन बेचारे यह भूल जाते हैं कि नेता की याददाश्त और गिरगिट के रंग बदलने में बहुत कम अंतर होता है।

जिस दिन मामला अदालत पहुंचता है, नेता जी कहते हैं-"मैं तो घटना के समय वहां था ही नहीं।"
अफसर कहते हैं-"मैंने कोई लिखित आदेश नहीं दिया था।"
सरकार कहती है-"जांच होगी।"
और पुलिसकर्मी सोचता रह जाता है कि आखिर आदेश किसने दिया था!

इतिहास उठाकर देख लीजिए। अंग्रेजों के शासन में भी यही होता था। जलियांवाला बाग में जनरल डायर चला गया, लेकिन उसके पीछे खड़ी पूरी साम्राज्यवादी व्यवस्था बची रही। भारत छोड़ो आंदोलन में हजारों लोगों पर लाठियां बरसाने वाले पुलिसकर्मी तो इतिहास के खलनायक बने, लेकिन आदेश देने वाली सत्ता अपने को कानून का रक्षक बताती रही।

आरा की घटना की चर्चा करते हुए अनेक लोगों को क्रांतिकारी चन्द्रशेखर आज़ाद की याद आ जाती है। तब भी वर्दी थी, तब भी सत्ता थी और तब भी एक व्यवस्था थी जो किसी भी विरोधी आवाज़ को खतरा मानती थी। फर्क सिर्फ इतना है कि उस समय शासक गोरे थे और आज शासक भारतीय हैं। लेकिन सत्ता का चरित्र बदलने की गति शायद पृथ्वी की परिक्रमा से भी धीमी है।

पुलिस विभाग का सबसे बड़ा भ्रम यह है कि वह स्वयं को सत्ता का स्थायी साथी समझ बैठता है। जबकि सच्चाई यह है कि सरकारें चुनाव से बदलती हैं और पुलिसकर्मी सेवा नियमों से बंधे रहते हैं। नेता पांच साल बाद विपक्ष में बैठ सकता है, लेकिन जिस पुलिसकर्मी ने कानून छोड़कर नेता की सेवा की हो, वह अदालत में अकेला खड़ा मिलता है।

यह भी बड़ा दिलचस्प है कि जब कोई पुलिस कार्रवाई सफल घोषित होती है तो उसका श्रेय मुख्यमंत्री, मंत्री और सरकार लेती है। लेकिन यदि वही कार्रवाई विवादित हो जाए तो जिम्मेदारी सीधे उस सिपाही, दारोगा या अधिकारी की हो जाती है जिसने आदेश का पालन किया था।

राजनीति का यह अद्भुत गणित है-

सफलता = नेता की दूरदर्शिता
विफलता = पुलिस की गलती

वर्दीधारियों को शायद यह समझना चाहिए कि संविधान ने उन्हें किसी दल का कार्यकर्ता नहीं बनाया है। उनका दायित्व कानून का पालन करना है, किसी नेता की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा का नहीं। क्योंकि नेता के लिए सत्ता एक पड़ाव है, लेकिन पुलिसकर्मी के लिए नौकरी और सम्मान पूरी जिंदगी की कमाई है।

दुर्भाग्य यह है कि हर युग में कुछ लोग यह मान बैठते हैं कि सत्ता हमेशा उनके साथ रहेगी। अंग्रेज भी यही सोचते थे। उनके लिए काम करने वाले स्थानीय अधिकारियों ने भी यही सोचा था। लेकिन इतिहास ने सबको उनकी वास्तविक जगह दिखा दी।

आज भी यदि कोई पुलिसकर्मी यह मानता है कि किसी नेता के इशारे पर की गई हर कार्रवाई उसे कानूनी सुरक्षा दे देगी, तो वह इतिहास नहीं पढ़ रहा। इतिहास की अदालत में सबसे पहले वही खड़ा किया जाता है जिसने ट्रिगर दबाया, जिसने लाठी चलाई, जिसने आदेश को अमल में बदला।

सरकारें बदलती रहती हैं। झंडे बदलते रहते हैं। नारे बदलते रहते हैं। मगर एक चीज़ नहीं बदलती-जब कानून का हिसाब होता है तो नेता कहता है, "मैंने ऐसा कब कहा था?"

और तब वर्दी पहने वह व्यक्ति समझता है कि वह सत्ता का साथी नहीं, बल्कि उसकी शतरंज का एक मोहरा था-जिसे खेल खत्म होते ही सबसे पहले बलि चढ़ा दिया जाता है।

इसलिए आरा की घटना केवल एक घटना नहीं, बल्कि एक चेतावनी है। यह याद दिलाती है कि कानून से ऊपर न कोई नेता है, न कोई सरकार और न कोई वर्दी। इतिहास बार-बार यही सिखाता है कि सत्ता के लिए किया गया अन्याय अंततः उसी के सिर मढ़ दिया जाता है जिसने उसे अंजाम दिया था।गोरे अंग्रेज हों या काले अंग्रेज, सत्ता का चरित्र अक्सर एक जैसा रहता है। फर्क केवल चेहरे का होता है, व्यवस्था की प्रवृत्ति का नहीं। और शायद इसी कारण इतिहास बार-बार खुद को दोहराता दिखाई देता है।

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