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आंतरिक शांति और वैश्विक नागरिकता के अंतर्संबंध

आंतरिक शांति और वैश्विक नागरिकता के अंतर्संबंध

सत्येन्द्र कुमार पाठक
मानव सभ्यता के विकासक्रम में आज हम एक अत्यंत अनूठे और विरोधाभासी मोड़ पर खड़े हैं। विज्ञान और सूचना तकनीक ने भूगोल की दूरियों को समेट कर पूरी दुनिया को एक 'वैश्विक गाँव' में तब्दील कर दिया है। न्यूयॉर्क में होने वाली कोई आर्थिक हलचल या टोक्यो में आने वाला कोई भूकंप, पलक झपकते ही भारत के किसी सुदूर गाँव के जनजीवन को प्रभावित कर देता है। बाहरी तौर पर हम जितने जुड़े हुए हैं, आंतरिक रूप से उतने ही खंडित, एकाकी और असुरक्षित हैं।।समकालीन समय की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि मनुष्य के पास ब्रह्मांड के सुदूर ग्रहों को नापने की तकनीक तो है, लेकिन अपने भीतर की अगाध गहराइयों में उतरने का समय और साहस नहीं है। इसी वैचारिक शून्यवाद और अलगाव के कारण समाज में उग्र राष्ट्रवाद, धार्मिक कट्टरता, नस्लीय श्रेष्ठता और अंधी उपभोक्तावादी संस्कृति का जन्म हुआ है। इस वैश्विक संकट का समाधान किसी राजनीतिक समझौते या आर्थिक पैकेज में नहीं, बल्कि मानव चेतना के क्रमिक विकास में छिपा है। यह विकास यात्रा है—'आत्म-बोध से विश्व-बोध' तक की। यह महज़ एक दार्शनिक विमर्श नहीं, बल्कि 21वीं सदी में मानव प्रजाति के अस्तित्व को बचाए रखने का एकमात्र व्यावहारिक मार्ग है।
आत्म-बोध: चेतना का उद्गम और प्रस्थान बिंदु "आत्मानं विद्धि।" (अपने आप को जानो) — उपनिषद्
'आत्म-बोध' का सीधा और सरल अर्थ है—स्वयं की वास्तविक पहचान से साक्षात्कार। अधिकांश मनुष्य अपना संपूर्ण जीवन बाह्य उपाधियों, जैसे—नाम, पद, प्रतिष्ठा, जाति, राष्ट्रीयता और लिंग को ही अपनी वास्तविक पहचान मानकर व्यतीत कर देते हैं। ये सभी पहचानें सामाजिक सुविधा के लिए निर्मित की गई हैं, लेकिन ये मनुष्य का मूल स्वभाव नहीं हैं । पाश्चात्य दर्शन में सुकरात का प्रसिद्ध कथन है, एक बिना जांचा गया जीवन जीने योग्य नहीं है)। जब हम अंतर्मुखी होकर स्वयं का विश्लेषण करते हैं, तो आत्म-बोध की प्रक्रिया शुरू होती है। श्रीमद्भगवद्गीता के दूसरे अध्याय में भगवान कृष्ण अर्जुन को आत्म-स्वरूप का बोध कराते हुए कहते हैं:
"न जायते म्रियते वा कदाचिन्नावं भूत्वा भविता वा न भूयः। अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥" (गीता 2.20) (यह आत्मा किसी काल में भी न तो जन्मती है और न मरती है। यह अजन्मा, नित्य, शाश्वत और पुरातन है; शरीर के मारे जाने पर भी यह नहीं मारी जाती। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से, कार्ल जंग (Carl Jung) ने इसे 'इंडिविजुएशन' या 'आत्म-सिद्धि' कहा है, जहाँ व्यक्ति अपने अचेतन मन की परतों को खोलकर अपने वास्तविक 'स्व' को पहचानता है। जब मनुष्य को अपनी क्षमताओं, कमजोरियों, विचारों और विकारों (क्रोध, लोभ, मोह) का बोध हो जाता है, तब वह बाहरी परिस्थितियों का दास बनने के बजाय अपने आंतरिक जगत का स्वामी बन जाता है।
आत्म-बोध से विश्व-बोध की ओर संक्रमण - एक आम भ्रांति यह है कि आत्म-बोध व्यक्ति को समाज से काट देता है या उसे आत्मकेंद्रित बना देता है। इसके विपरीत, सच्चा आत्म-बोध व्यक्ति के अहंकार का विसर्जन करता है। जब तक मनुष्य केवल अपने 'अहं' में जीता है, तब तक वह संसार को 'मैं' और 'वह' के खांचे में देखता है। लेकिन जैसे ही आत्म-बोध का प्रकाश फूटता है, 'पर' या 'दूसरा' का भेद समाप्त होने लगता है।।जब मुझे यह समझ आता है कि मेरे भीतर की सुख-दुख की अनूभूतियाँ, भय और प्रेम वैसा ही है जैसा सामने वाले व्यक्ति का है, तो मेरे भीतर 'सहानुभूति' का उदय होता है। फ्रांसीसी अस्तित्ववादी विचारक ज्यां-पॉल सार्त्र ने माना था कि हमारी स्वतंत्रता दूसरों की स्वतंत्रता से बंधी है। भारतीय दर्शन इसे एक कदम आगे ले जाकर कहता है कि जो चेतना मेरे भीतर स्पंदित हो रही है, वही चेतना चराचर जगत के प्रत्येक जीव, वृक्ष और कण में विद्यमान है। यही वह महासेतु है जो व्यक्ति को 'व्यष्टि' से 'समष्टि' की ओर ले जाता है।
'विश्व-बोध' का तात्पर्य संपूर्ण ब्रह्मांड को एक अविभाज्य, अंतर्संबंधित और जीवित इकाई के रूप में अनुभव करने से है। समकालीन दार्शनिक प्रभात रंजन सरकार ने इसे 'नव-मानववाद' के रूप में परिभाषित किया है। पारंपरिक मानवतावाद केवल मनुष्यों के कल्याण तक सीमित था, जिसने अनजाने में प्रकृति के शोषण को बढ़ावा दिया। लेकिन नव-मानववाद जीव-जंतुओं, वनस्पतियों और निर्जीव प्रकृति को भी उसी चेतना का हिस्सा मानता है।।आधुनिक विज्ञान, विशेषकर क्वांटम भौतिकी और 'गाया परिकल्पना' यह प्रमाणित करती हैं कि पृथ्वी एक जीवित तंत्र है। यदि अमेज़न के जंगलों में पेड़ कटते हैं, तो वैश्विक वायुमंडल प्रभावित होता है। प्रशांत महासागर में प्लास्टिक का कचरा पूरी दुनिया के समुद्री जीवन को संकट में डालता है। 'विश्व-बोध' हमें यह सिखाता है कि पर्यावरण की रक्षा कोई राजनीतिक एजेंडा नहीं, बल्कि हमारी साझा सांसों का सवाल है।
विश्व-बोध किसी एक संस्कृति, धर्म या विचारधारा के वर्चस्व को नकारता है। यह 'विविधता में एकता' का उत्सव मनाता है। जब मनुष्य विश्व-बोध से संपन्न होता है, तो वह नस्लवाद (Racism), रंगभेद और प्रवासियों के प्रति घृणा जैसी संकीर्णताओं से मुक्त हो जाता है। वह समझ जाता है कि संस्कृतियों के बाह्य रूप अलग हो सकते हैं, लेकिन मानवीय मूल्य है। ।वैश्वीकरण के इस दौर में कोई भी देश पूर्णतः अलग थलग रहकर जीवित नहीं रह सकता। रूस-यूक्रेन युद्ध हो या कोविड-19 जैसी महामारी, इनके आर्थिक और सामाजिक प्रभाव पूरी दुनिया ने झेले। विश्व-बोध हमें यह दृष्टि देता है कि "जब तक संसार का अंतिम व्यक्ति भूखा या असुरक्षित है, तब तक कोई भी राष्ट्र पूर्णतः सुरक्षित नहीं हो सकता।"
वर्तमान विश्व में तकनीक का तो वैश्वीकरण हो गया है, लेकिन मानवीय सोच का 'कबीलाईकरण' हो रहा है। आज दुनिया जिन संकटों से जूझ रही है, वे मूलतः विश्व-बोध की कमी का परिणाम हैं:।संकुचित सोच (विखंडन का मार्ग) वैश्विक चेतना (विश्व-बोध का मार्ग) में भू-राजनीति सीमा विवाद, उग्र राष्ट्रवाद, परमाणु हथियारों की होड़। बहुपक्षवाद (Multilateralism), कूटनीति और वैश्विक शांति।।तकनीक साइबर युद्ध, डेटा का दुरुपयोग, एआई का सैन्यीकरण। ओपन-सोर्स तकनीक, मानव कल्याण हेतु कृत्रिम बुद्धिमत्ता। स्वास्थ्य वैक्सीन राष्ट्रवाद, दवाओं का पेटेंट और मुनाफाखोरी। संपूर्ण मानवता का साझा स्वास्थ्य है। विश्व-बोध का विचार भारत के लिए नया नहीं है; यह हमारी सांस्कृतिक आत्मा का मूल स्वर है। जब दुनिया की अन्य सभ्यताएं सीमाओं और साम्राज्यों के विस्तार में लगी थीं, तब भारतीय ऋषियों ने उद्घोष किया था:
"अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्। उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्॥" (महोपनिषद्)
(यह मेरा है और यह पराया, ऐसी गणना संकुचित मन वाले करते हैं। उदार चरित्र वालों के लिए तो संपूर्ण पृथ्वी ही एक परिवार है।) स्वामी विवेकानंद का वैश्विक संदेश: 1893 के शिकागो धर्म संसद में स्वामी विवेकानंद का संबोधन "अमेरिका के भाइयों और बहनों" केवल औपचारिकता नहीं था, वह उनके 'विश्व-बोध' की सहज अभिव्यक्ति थी, जिसने पूरी दुनिया को स्तब्ध कर दिया था। गांधी जी का 'सत्याग्रह' और 'अहिंसा' का सिद्धांत आत्म-बोध पर आधारित था, जिसने आगे चलकर मार्टिन लूथर किंग जूनियर और नेल्सन मंडेला जैसे वैश्विक नायकों के माध्यम से विश्व-बोध का रूप लिया।
आज भारत अंतरराष्ट्रीय मंचों पर जिसमें एक पृथ्वी, एक परिवार, एक भविष्य का आह्वान कर रहा है, वह इसी प्राचीन दर्शन का आधुनिक और व्यावहारिक दस्तावेज़ है। 'मिशन लाइफ' के माध्यम से भारत दुनिया को उपभोगवादी संस्कृति को छोड़कर प्रकृति-अनुकूल जीवनशैली अपनाने का वैश्विक संदेश दे रहा है।
: नव-मानवता के उदय की राह में 'आत्म-बोध से विश्व-बोध' तक की व्याख्यान यात्रा हमें इस निष्कर्ष पर पहुंचाती है कि आंतरिक रूपांतरण के बिना बाह्य सुधार असंभव है। यदि हम अपने भीतर शांत और जागरूक नहीं हैं (आत्म-बोध), तो हम बाहर एक शांतिपूर्ण विश्व का निर्माण (विश्व-बोध) कभी नहीं कर सकते।भविष्य की शिक्षा प्रणाली को केवल 'कैरियर' और 'भौतिक समृद्धि' का साधन बनाने के बजाय मानवीय संवेदनाओं, करुणा और वैश्विक नागरिकता के मूल्यों से जोड़ना होगा। युवा पीढ़ी को यह समझाना होगा कि राष्ट्रों की सीमाएं केवल मानचित्र पर खींची गई रेखाएं हैं; अंतरिक्ष से देखने पर पृथ्वी पर ऐसी कोई लकीर दिखाई नहीं देती। जैसा कि राष्ट्रकवि रामधारी सिंह 'दिनकर' ने अपनी कालजयी पंक्तियों में लिखा था: "सच्चा है वही स्वदेश-प्रेम, जो विश्व-प्रेम का ही अंग हो।" जिस दिन मानव चेतना 'मैं' के संकुचित दायरे को तोड़कर 'वसुधा' के विराट स्वरूप को अपना लेगी, उसी दिन युद्ध, भुखमरी, पर्यावरण विनाश और वैचारिक कटुता के बादल छंट जाएंगे। आत्म-बोध से शुरू होकर विश्व-बोध पर समाप्त होने वाली यह यात्रा ही आने वाली सदियों में एक नई, सुंदर और एकात्म मानवता के उदय का मार्ग प्रशस्त करेगी।
संदर्भ - श्रीमद्भगवद्गीता - द्वितीय एवं छठा अध्याय (आत्म-संयम योग)। महोपनिषद् एवं अथर्ववेद - 'वसुधैव कुटुम्बकम्' एवं 'भूमि सूक्त' का दार्शनिक विमर्श। स्वामी विवेकानंद (complete works) - शिकागो व्याख्यान एवं व्यावहारिक वेदांत।यूवाल नोआ हरारी (2018) - '21 Lessons for the 21st Century', समकालीन वैश्विक चुनौतियाँ और तकनीकी विखंडन। प्रभात रंजन सरकार (1982) - 'The Liberation of Intellect: Neo-Humanism', नव-मानववाद का सिद्धांत।


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