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"मर्यादा, आधुनिकता और मनुष्य का अंतर्द्वंद्व"

"मर्यादा, आधुनिकता और मनुष्य का अंतर्द्वंद्व"

पंकज शर्मा

सभ्यता का इतिहास केवल भौतिक प्रगति का इतिहास नहीं है; वह मनुष्य की आत्मा, उसके संयम, उसकी मर्यादाओं और उसके नैतिक विवेक की यात्रा भी है। जब किसी समाज में साधनों की प्रचुरता बढ़ती है, तब यह आवश्यक नहीं कि उसके साथ-साथ संवेदनाओं की गहराई और चरित्र की ऊँचाई भी बढ़े। अनेक बार बाह्य चमक-दमक के पीछे आंतरिक रिक्तता का विस्तार होने लगता है। आज का समाज इसी प्रकार के एक गहन अंतर्द्वंद्व से गुजरता हुआ प्रतीत होता है।


वर्तमान युग में स्वतंत्रता को जीवन का सर्वोच्च मूल्य मान लिया गया है। किंतु स्वतंत्रता और उच्छृंखलता के मध्य जो सूक्ष्म रेखा है, वह दिन-प्रतिदिन धूमिल होती जा रही है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, व्यक्तिगत चयन का अधिकार और आधुनिक जीवनशैली निस्संदेह लोकतांत्रिक समाज की उपलब्धियाँ हैं; परंतु जब अधिकारों का विमर्श कर्तव्यों और मर्यादाओं से पृथक हो जाता है, तब सामाजिक संतुलन डगमगाने लगता है।


सोशल मीडिया ने इस प्रवृत्ति को और अधिक तीव्र बना दिया है। आज व्यक्ति अपने जीवन को जीने से अधिक उसे प्रदर्शित करने में व्यस्त दिखाई देता है। लोकप्रियता का मापदंड चरित्र नहीं, अपितु दृश्यता बन गया है। जितना अधिक प्रदर्शन, उतनी अधिक प्रशंसा; जितनी अधिक चकाचौंध, उतनी अधिक स्वीकार्यता। ऐसे वातावरण में अनेक अभिभावक भी अनजाने में अपनी संतानों को यह संदेश देने लगते हैं कि सामाजिक प्रतिष्ठा का आधार आंतरिक गुण नहीं, बल्कि बाह्य आकर्षण और सार्वजनिक अनुमोदन है।


विडंबना यह है कि जो लोग सार्वजनिक मंचों पर संस्कृति, परंपरा और संस्कारों के प्रवक्ता बने रहते हैं, वे अनेक बार अपने निजी जीवन में उन्हीं मूल्यों के प्रति उदासीन दिखाई देते हैं। कथनी और करनी के इस अंतर ने नई पीढ़ी के मन में भी भ्रम उत्पन्न किया है। जब आदर्श केवल भाषणों में रह जाएँ और व्यवहार में उनका प्रतिबिंब न दिखाई दे, तब संस्कार उपदेश का विषय बनकर रह जाते हैं, जीवन का नहीं।


विवाह जैसी पवित्र सामाजिक संस्था भी इस परिवर्तन से अछूती नहीं रही है। कभी विवाह को दो व्यक्तियों के साथ-साथ दो परिवारों, दो संस्कृतियों और दो जीवन-दृष्टियों के मिलन के रूप में देखा जाता था। आज अनेक अवसरों पर उसका स्वरूप एक सार्वजनिक प्रदर्शन अथवा मनोरंजन-केंद्रित आयोजन में परिवर्तित होता दिखाई देता है। उत्सव की गरिमा और उल्लास स्वाभाविक हैं, किंतु जब सौंदर्य की जगह भौंडापन, आत्मीयता की जगह प्रदर्शन और मर्यादा की जगह आकर्षण का प्रदर्शन प्रधान हो जाए, तब चिंतन की आवश्यकता अवश्य उत्पन्न होती है।


यह भी विचारणीय है कि प्रेम, निकटता और व्यक्तिगत चयन को जीवन की सभी समस्याओं का समाधान मान लेने के बावजूद वैवाहिक अस्थिरता, पारिवारिक विघटन और आपसी संघर्षों की घटनाएँ क्यों बढ़ रही हैं। इसका उत्तर केवल किसी एक जीवनशैली, किसी एक वर्ग या किसी एक लिंग को दोष देकर नहीं खोजा जा सकता। समस्या कहीं अधिक गहरी है। मनुष्य ने संबंधों में भावनात्मक परिपक्वता, त्याग, धैर्य और उत्तरदायित्व जैसे गुणों की अपेक्षा तात्कालिक संतुष्टि और व्यक्तिगत सुविधा को अधिक महत्व देना आरंभ कर दिया है। परिणामस्वरूप संबंधों की जड़ें उथली होती जा रही हैं।


वस्तुतः संकट वस्त्रों, आयोजनों अथवा आधुनिकता का नहीं है; संकट उस दृष्टि का है जो जीवन के केंद्र से मूल्यबोध को हटाकर केवल उपभोग और प्रदर्शन को स्थापित कर देना चाहती है। कोई समाज केवल निषेधों से महान नहीं बनता, न ही केवल स्वतंत्रताओं से। उसकी महानता इस बात में निहित होती है कि वह स्वतंत्रता को संयम से, अधिकार को उत्तरदायित्व से और प्रगति को नैतिकता से जोड़कर देखता है।


आज आवश्यकता किसी पीढ़ी को कटघरे में खड़ा करने की नहीं, बल्कि आत्ममंथन की है। अभिभावकों को स्वयं से प्रश्न पूछना होगा कि वे अपनी संतानों को केवल सफलता का मार्ग दिखा रहे हैं या चरित्र का भी। क्या वे उन्हें केवल प्रतिस्पर्धा सिखा रहे हैं या करुणा भी? क्या वे उन्हें केवल अधिकारों का बोध करा रहे हैं या कर्तव्यों का भी?


समाज का भविष्य कानूनों से कम और संस्कारों से अधिक निर्मित होता है। संस्कार उपदेशों से नहीं, उदाहरणों से जन्म लेते हैं। यदि परिवार, विद्यालय और समाज मिलकर मर्यादा, आत्मसंयम, सम्मान और उत्तरदायित्व के मूल्यों को पुनः प्रतिष्ठित कर सकें, तो आधुनिकता और परंपरा का संघर्ष समाप्त हो सकता है। तब प्रगति भी होगी और संस्कृति भी सुरक्षित रहेगी; स्वतंत्रता भी होगी और मर्यादा भी।

अंततः प्रश्न यह नहीं है कि हम कितने आधुनिक हो गए हैं; प्रश्न यह है कि आधुनिक होते हुए भी हम कितने मानवीय, कितने नैतिक और कितने उत्तरदायी बने हुए हैं। यही प्रश्न किसी भी सभ्यता के उत्थान और पतन का वास्तविक निर्धारक होता है।
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