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महातीर्थ गया: साम्राज्यों और संस्कृतियों का संगम

महातीर्थ गया: साम्राज्यों और संस्कृतियों का संगम

सत्येन्द्र कुमार पाठक
बिहार के दक्षिणी भाग में फल्गु नदी के तट पर स्थित 'गया' केवल एक जिला या भौगोलिक स्थान नहीं है, बल्कि यह सनातन, बौद्ध और जैन दर्शन की वैश्विक चेतना का प्राण है। वायु पुराण के 'गया महात्म्य' में इसे 'गयातीर्थ' और 'गयाशिर' कहकर पुकारा गया है। यह वह अद्वितीय भूमि है जहाँ एक ओर सनातन धर्मावलंबी अपने पितरों की मुक्ति (श्राद्ध) के लिए देश-विदेश से आते हैं, तो दूसरी ओर बोधगया में तथागत बुद्ध को प्राप्त हुए 'बुद्धत्व' की किरणें संपूर्ण विश्व को आलोकित करती हैं। गया का संपूर्ण अस्तित्व यहाँ की रहस्यमयी पहाड़ियों, अंतःसलिला फल्गु नदी और युगों-युगों से निर्मित कलाकृतियों में समाहित है।।गया की भौगोलिक संरचना इसके आध्यात्मिक दर्शन से गहराई से जुड़ी है। 'गया महात्म्य' के अनुसार, पूरा गया क्षेत्र 'गयासुर' नामक पवित्र असुर के शरीर पर स्थित है। यहाँ की हर पहाड़ी और नदी किसी न किसी दिव्य तत्व या संस्कृति का प्रतिनिधित्व करती है। गया की जीवन-रेखा: पावन नदियाँ - फल्गु नदी (अंतःसलिला): यह गया की सबसे प्रधान और मोक्षदायिनी नदी है। यह छोटानागपुर पठार से निकलने वाली दो धाराओं—लीलाजन (निरंजना) और मोहना के संगम से बोधगया के समीप बनती है। माता सीता के शाप के कारण यह नदी 'अंतःसलिला' (सतह के नीचे बहने वाली) कहलाती है। इसका आध्यात्मिक अवदान यह है कि इसके सूखे बालू (रेत) को खोदकर जल निकाला जाता है, जिससे पितरों का तर्पण होता है।।पुनपुन नदी (कीकट धारा): गया के पश्चिमी और उत्तरी भागों से बहने वाली इस नदी को वेदों और पुराणों में 'कीकट' क्षेत्र की पवित्र नदी माना गया है। गया श्राद्ध की यात्रा का प्रारंभ कई परंपराओं में पुनपुन के स्नान और तर्पण से ही होता है। मोरहर , जमुनी और दरधा: नदियां गया के पश्चिमी और मध्य मैदानी भागों (शेरघाटी, गुरुआ) की कृषि और संस्कृति का आधार रही हैं, जिनका प्राचीन मार्ग सामरिक और व्यापारिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण था।
पहाड़ियों पर विभिन्न संस्कृतियों का अवदान में गया की पहाड़ियों पर प्रागैतिहासिक काल से लेकर मध्यकाल तक की विभिन्न संस्कृतियों—सौर, शाक्त, ब्रह्म, वैष्णव, शैव और असुर चेतना का गहरा प्रभाव रहा है:।ब्रह्मयोनि पहाड़ी (ब्रह्म एवं सौर संस्कृति): गया शहर के दक्षिण में स्थित यह सबसे ऊंची पहाड़ी है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी ने इसी पहाड़ी पर बैठकर ब्रह्मांड की रचना के लिए यज्ञ और वैचारिक मंथन किया था। यहाँ प्राचीन सूर्य देव (सौर संस्कृति) के भी साक्ष्य मिलते हैं। भगवान बुद्ध ने भी इसी पहाड़ी पर अपना प्रसिद्ध 'आदित्य परियाय सुत्त' (अग्नि उपदेश) दिया था, जो तेज और ऊर्जा तत्व का प्रतीक है। भस्म पहाड़ी (शाक्त संस्कृति): भारत के प्रमुख शक्तिपीठों में शुमार यह पहाड़ी शाक्त (देवी) उपासना का सर्वोच्च केंद्र है। मान्यता है कि यहाँ सती का स्तन भाग गिरा था। सदियों से यह पहाड़ी तांत्रिक और सात्विक दोनों ही प्रकार की शक्तियों और सिद्धियों की साधना स्थली रही है। रामशिला पहाड़ी (ऋषि, देव और मनु संस्कृति): गया के उत्तर में स्थित इस पहाड़ी का संबंध मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम से है। त्रेतायुग में श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण ने अपने पिता राजा दशरथ का पिंड दान इसी की तलहटी में किया था। यह पहाड़ी वैदिक ऋषि परंपरा और मनु वंश के पितृ-ऋण सिद्धांत को जीवंत करती है। प्रेतशिला पहाड़ी (दैत्य, असुर, वायु और जल तत्व): गया से लगभग ९ किलोमीटर दूर स्थित यह पहाड़ी अत्यंत रहस्यमयी है। यह मुख्य रूप से 'गयासुर' की असुर संस्कृति और पितरों की अतृप्त आत्माओं से जुड़ी है। यहाँ यमराज और वायु देव की पूजा होती है। श्रद्धालु यहाँ पितरों के लिए 'सत्तू और जल' वायु में उड़ाते हैं, जो इस बात का प्रतीक है कि वायु और जल तत्व के माध्यम से प्रेत योनि से भी मुक्ति संभव है। कौआडोल और गुरपा पहाड़ी (शैव, बौद्ध और ऋषि संस्कृति): कौआडोल पहाड़ी (गया-जहानाबाद सीमा) पर विशाल बौद्ध अवशेष और शिव लिंग (शैव मत) मिलते हैं। वहीं गुरपा पहाड़ी (गुरुपद गिरि) को भगवान बुद्ध के प्रधान शिष्य महाकश्यप की तपोभूमि माना जाता है, जहाँ ऋषि संस्कृति और बौद्ध चेतना का अनूठा मिलन होता है।
गया की चेतना का युगीन विकास - गया की सांस्कृतिक चेतना का इतिहास मानव सभ्यता के आत्मिक विकास का इतिहास है, जो चारों युगों में निरंतर प्रवाहित होता रहा है।।सतयुग: गयासुर का महात्याग और धर्म-प्रतिष्ठा - सतयुग में गया की चेतना का आधार 'गयासुर' का आख्यान है। उसने कठिन तपस्या कर वरदान प्राप्त किया कि उसका शरीर देव-नदियों से भी अधिक पवित्र हो जाए और उसे छूने मात्र से पापी भी मुक्त हो जाएं। जब सृष्टि का नियम डगमगाने लगा, तब ब्रह्मा और विष्णु के आग्रह पर गयासुर ने यज्ञ के लिए अपना विशाल शरीर सहर्ष दान कर दिया। भगवान विष्णु ने अपनी गदा और चरणों से उसे स्थिर किया। इस प्रकार, सतयुग में गया 'असुर संस्कृति के हृदय परिवर्तन' और 'परम त्याग' की भूमि बनकर उभरा। त्रेता युग: मर्यादा और पितृ-कर्तव्य - त्रेता युग में गया 'पितृ-संस्कृति' और 'पारिवारिक मूल्यों' का केंद्र बना। मर्यादा पुरुषोत्तम राम का यहाँ आकर राजा दशरथ के लिए पिंड दान करना इस बात का प्रमाण है कि सनातन संस्कृति में माता-पिता के प्रति कर्तव्य मृत्यु के बाद भी समाप्त नहीं होता। माता सीता द्वारा फल्गु के तट पर दिया गया पिंड दान नारी के आध्यात्मिक अधिकार और गवाही की शक्ति को रेखांकित करता है।। द्वापर युग: महाभारत और श्रीकृष्ण का आगमन - द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण ने गया की यात्रा की और अपने पूर्वजों के उद्धार के लिए तर्पण किया। महाभारत के 'वन पर्व' में गयातीर्थ का विस्तृत वर्णन मिलता है, जो यह सिद्ध करता है कि द्वापर युग तक आते-आते गया संपूर्ण भारतवर्ष के राजाओं और ऋषियों के लिए एक अनिवार्य आध्यात्मिक गंतव्य बन चुका था। कलियुग: मोक्ष, बुद्धत्व और वैश्विक करुणा - कलियुग में गया की चेतना ने एक नया करवट लिया। इसी युग में गयाशिर के समीप उरुवेला (वर्तमान बोधगया) के जंगलों में निरंजना नदी के तट पर पीपल वृक्ष के नीचे सिद्धार्थ गौतम को ज्ञान प्राप्त हुआ और वे 'बुद्ध' कहलाए। कलियुग में गया सनातन कर्मकांड (मोक्ष) और बौद्ध दर्शन (निर्वाण) का वैश्विक समन्वय केंद्र बन गया।
साम्राज्यवादी कालक्रम और गया का ऐतिहासिक अवदान - भारत के राजनीतिक और ऐतिहासिक उतार-चढ़ाव का गया के स्थापत्य और संस्कृति पर गहरा प्रभाव पड़ा। विभिन्न साम्राज्यों ने यहाँ कला और धर्म को पुष्पित-पल्लवित किया।. मौर्य काल: चट्टान-कट स्थापत्य का उदय में सम्राट अशोक और उनके पौत्र दशरथ के काल में गया और उसके समीपवर्ती मगध क्षेत्र में कला की एक नई विधा का जन्म हुआ। बराबर और नागार्जुन की पहाड़ियों को काटकर बनाई गई आजीवक संप्रदाय की गुफाएं विश्व की प्राचीनतम 'रॉक-कट' वास्तुकला का उदाहरण हैं। अशोक ने बोधगया में महाबोधि मंदिर की आदि-संरचना और वज्रासन का निर्माण कराया, जिससे गया अंतरराष्ट्रीय मानचित्र पर स्थापित हुआ। सनातन कला का स्वर्णयुग।गुप्त सम्राटों के शासनकाल (४थी से ६ठी शताब्दी) में गया के वैष्णव और शैव स्वरूप को अभूतपूर्व विस्तार मिला। गुप्त शासक 'परम भागवत' (विष्णु उपासक) थे। इस काल में विष्णुपद क्षेत्र और पितामहेश्वर मंदिर के मूल स्वरूप का विकास हुआ। महाबोधि मंदिर की वर्तमान भव्य संरचना भी काफी हद तक गुप्तकालीन स्थापत्य शैली से प्रभावित है। इसी काल में श्रीलंका के राजा कीर्ति श्रीमेघवर्ण ने समुद्रगुप्त की अनुमति से बोधगया में बौद्ध विहार बनवाया, जो गया के वैश्विक सांस्कृतिक संबंधों का सूत्रपात था। हर्षवर्धन काल: शिक्षा और साधना का संगम।७वीं शताब्दी में सम्राट हर्षवर्धन के काल में गया में धार्मिक सह-अस्तित्व चरम पर था। चीनी यात्री ह्वेनसांग के यात्रा वृत्तांतों से ज्ञात होता है कि इस काल में गया सनातन विद्वानों (ब्राह्मणों) और बौद्ध भिक्षुओं की उच्च शिक्षा, दर्शन और आध्यात्मिक साधना का एक जीवंत और सुरक्षित केंद्र था। पाल और सेन काल: मूर्तिकला की पराकाष्ठा ९वीं से १२वीं शताब्दी के बीच पाल राजवंश (धर्मपाल, देवपाल, नारायणपाल) के समय गया 'मगध स्कूल ऑफ आर्ट' का सबसे बड़ा केंद्र बना। काले बेसाल्ट (कसौटी) पत्थरों से निर्मित उत्कृष्ट मूर्तियों का निर्माण इसी काल में हुआ। बागेश्वरी मंदिर, गदाधर मंदिर और फल्गु के विभिन्न घाटों पर पाल कालीन मूर्तियों और शिलालेखों के साक्ष्य आज भी बिखरे पड़े हैं। सेन काल में यहाँ तांत्रिक और शाक्त संप्रदायों का प्रभाव और गहरा हुआ। मुगल काल के दौरान देश में व्यापक राजनीतिक उथल-पुथल के बावजूद गया की धार्मिक स्वायत्तता काफी हद तक बनी रही। जहांगीर और शाहजहाँ के काल के कुछ स्थानीय अभिलेखों से पता चलता है कि गया के तीर्थ पुरोहितों (गयावल पंडा समाज) को करों से मुक्ति दी गई थी ताकि देश भर से आने वाले तीर्थयात्री बिना किसी बाधा के पिंडदान का अनुष्ठान पूरा कर सकें।।ब्रिटिश काल में गया एक प्रशासनिक मुख्यालय (१८६५ में स्वतंत्र जिला) बना। परंतु इस काल की सबसे महान सांस्कृतिक घटना १८वीं शताब्दी के उत्तरार्ध (१७८७ ईस्वी) में इंदौर की मराठा होल्कर रियासत की महारानी अहिल्याबाई होल्कर द्वारा वर्तमान विष्णुपद मंदिर का पुनर्निर्माण है। उन्होंने अपनी अगाध श्रद्धा और स्थापत्य सूझबूझ से गया को वह भव्य स्वरूप दिया, जो आज भी गया की पहचान है।
आधुनिक काल में गया स्वाधीनता संग्राम (१९२२ का ऐतिहासिक गया कांग्रेस अधिवेशन) और स्वामी सहजानंद सरस्वती एवं पादित यदुनंदन शर्मा के किसान आंदोलनों का साक्षी रहा। आज गया और बोधगया यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल होकर वैश्विक पर्यटन, सर्वधर्म समभाव और शांति का अंतरराष्ट्रीय केंद्र बन चुके हैं।
भारतीय वांग्मय और धर्मग्रंथों में गया को जो स्थान प्राप्त है, वह किसी अन्य तीर्थ को दुर्लभ है।
ऋग्वेद में इस क्षेत्र को 'कीकट' कहा गया है। ऋग्वेद की ऋचाओं में भगवान विष्णु के तीन कदमों (त्रिविक्रम) का जो उल्लेख है, पौराणिक विद्वानों ने उसकी परिणति गया के 'विष्णुपद' के रूप में की है। उत्तर-वैदिक काल तक आते-आते यह भूमि यज्ञ और श्राद्ध के लिए सर्वोपरि मान ली गई।
गरुड़ पुराण , वायु पुराण का 'गया महात्म्य' (उत्तरार्ध के ८ अध्याय) गया के भूगोल और अध्यात्म का सबसे प्रामाणिक दस्तावेज है। इसमें गया की ५० से अधिक वेदियों और पिंड दान की वैज्ञानिक व आध्यात्मिक विधियों का वर्णन है। गरुड़ पुराण स्पष्ट घोषणा करता है: “न वै गयासमो तीर्थं देवलोके च मानुषे” अर्थात् देवलोक और पृथ्वी लोक में गया के समान कोई दूसरा तीर्थ नहीं है। अग्नि, पद्म और कूर्म पुराण भी इसके अक्षयवट और फल्गु स्नान की महिमा गाते हैं।
स्मृति ग्रंथों का निर्देश: मनुस्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति और परवर्ती मध्यकालीन ग्रंथों जैसे 'श्राद्ध कल्पतरु' और 'निर्णयसिंधु' में प्रत्येक मनुष्य के लिए तीन ऋणों (देव-ऋण, ऋषि-ऋण, पितृ-ऋण) में से पितृ-ऋण की मुक्ति के लिए जीवन में कम से कम एक बार गया यात्रा और श्राद्ध कर्म को अनिवार्य धार्मिक कर्तव्य घोषित किया गया है।
प्रमुख ऐतिहासिक मंदिरों, सरोवरों और घाटों का निर्माण कालक्रम में गया की ऐतिहासिक धरोहरों का निर्माण विभिन्न साम्राज्यों और कालखंडों में हुआ, जिसका विवरण तालिका के माध्यम से स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है:
विष्णुपद मंदिर महारानी अहिल्याबाई होल्कर (मराठा होल्कर साम्राज्य) १७८७ ईस्वी कसौटी पत्थर (काले बेसाल्ट) से निर्मित अष्टकोणीय मंदिर, जो वैष्णव चेतना और देश के कोने-कोने से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए पितृ-मुक्ति का मुख्य केंद्र है।मंगला गौरी मंदिर मूल पीठ पौराणिक; गर्भगृह और संवर्धन पाल राजवंश द्वारा ९वीं से ११वीं शताब्दी भारत के ५१ शक्तिपीठों में से एक; शाक्त साधना और तंत्र-मंत्र का ऐतिहासिक केंद्र।
बागेश्वरी (वागीश्वरी) मंदिर पाल राजवंश (राजा महिपाल के समकालीन) १०वीं-११वीं शताब्दी गया रेलवे स्टेशन के पास प्राचीन सरस्वती (वागीश्वरी) उपासना और शिक्षा-शिल्प की चेतना का प्रतीक।
पितामहेश्वर मंदिर गुप्त साम्राज्य और उत्तर-वर्ती गुप्त काल के सामंत ५वीं से ७वीं शताब्दी गया के प्राचीनतम शिव मंदिरों में से एक; उत्तर-मुखी शिवलिंग जो शैव और वैष्णव मतों के ऐतिहासिक समन्वय को दर्शाता है।
आदित्य सूर्य मंदिर (दक्षिणार्क) काकतीय साम्राज्य (दक्षिण भारत) / स्थानीय मगध सामंत १३वीं शताब्दी (उत्तर-मध्यकाल) आरोग्य, तेज और कुष्ठ रोगों से मुक्ति के लिए सौर संस्कृति का अद्भुत केंद्र। ग्रेनाइट पत्थरों पर दक्षिण भारतीय शिल्पकला का प्रभाव।
ब्रह्म सरोवर (ब्रह्मकुंड) पौराणिक मान्यता; पक्के घाट गुप्त काल और बाद में मराठा शासकों द्वारा प्राचीन काल; जीर्णोद्धार १८वीं शताब्दी ब्रह्मा जी के यज्ञ की स्मृति; गया श्राद्ध की यात्रा की शुरुआत और पहला पिंड दान यहीं से प्रारंभ होता है। राम सरोवर (रामकुंड) त्रेतायुगीन स्मृति; आधुनिक निर्माण टेकारी राज (भूमिहार ब्राह्मण साम्राज्य) और मारवाड़ी व्यापारियों द्वारा १९वीं शताब्दी का उत्तरार्ध रामशिला पहाड़ी की तलहटी में स्थित; श्रीराम के गया आगमन की स्मृति और अनुष्ठानिक स्थल।।कठोतर तलाव (कठौत तालाब) पाल कालीन सामंत और गयावल पंडा समाज के पूर्वज १२वीं से १४वीं शताब्दी लोकमान्यता के अनुसार विष्णुपद मंदिर निर्माण के समय कारीगरों के काठ के बर्तनों (कठौत) को धोने और जल संचयन के लिए निर्मित पवित्र कुंड।
ब्राह्मणी घाट महारानी अहिल्याबाई होल्कर और गयावल पंडा समाज १७८०-१७९० ईस्वी फल्गु नदी के पश्चिमी तट पर स्थित; तीर्थयात्रियों को सुरक्षित ढंग से फल्गु के जल में तर्पण और स्नान करने की सुविधा देने हेतु निर्मित सुंदर सीढ़ियाँ।।सीता कुंड ; लघु मंदिर और वेदी का निर्माण टेकारी राज और मराठा सरदारों द्वारा १८वीं शताब्दी के अंत से १९वीं शताब्दी का प्रारंभ फल्गु के पूर्वी तट पर स्थित; जहाँ माता सीता ने बालू का पिंड देकर राजा दशरथ की आत्मा को तृप्त किया था। यहाँ आज भी बालू के पिंड दान की अनूठी परंपरा है। समन्वय और मोक्ष की अमर विरासत।गया की सांस्कृतिक चेतना का सूक्ष्म अध्ययन यह स्पष्ट करता है कि यह भूमि किसी एक संप्रदाय, साम्राज्य या कालखंड की बपौती नहीं है। सतयुग के असुर-त्याग से शुरू होकर, वेदों की ऋचाओं, मौर्य-गुप्त-पाल राजाओं के राजकीय संरक्षण, और महारानी अहिल्याबाई होल्कर की धार्मिक प्रतिबद्धता से गुजरती हुई गया की संस्कृति आज भी जीवंत है।।यहाँ असुर संस्कृति और देव संस्कृति का टकराव नहीं, बल्कि समन्वय है; यहाँ शैव, शाक्त, वैष्णव और सौर संप्रदाय एक ही फल्गु के तट पर आकर एकाकार हो जाते हैं; और यहीं पर सनातन की 'मोक्ष' चेतना और बौद्ध धर्म की 'निर्वाण' चेतना एक दूसरे के पूरक बनकर खड़े हैं। गया आज भी पूरे विश्व को यही संदेश देता है कि जीवन क्षणभंगुर है, और मृत्यु से मोक्ष तथा अंधकार से प्रकाश (बुद्धत्व) की ओर जाने का मार्ग इसी पावन अंतःसलिला फल्गु के किनारों से होकर गुजरता है।
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