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क्या भारत में कानून सबके लिए समान है?

क्या भारत में कानून सबके लिए समान है?

डॉ. राकेश दत्त मिश्र

भारतीय संविधान का मूल सिद्धांत है कि देश का प्रत्येक नागरिक और प्रत्येक संस्था कानून की दृष्टि में समान है। संविधान के अनुच्छेद 14 में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि राज्य किसी व्यक्ति के साथ कानून के समक्ष भेदभाव नहीं करेगा। किंतु व्यवहारिक धरातल पर जब हम व्यवस्था को देखते हैं तो अनेक ऐसे प्रश्न खड़े होते हैं जो इस सिद्धांत की वास्तविकता पर गंभीर संदेह उत्पन्न करते हैं।

आज देश में ऐसी अनेक संस्थाएँ हैं जो बिना किसी विधिवत पंजीकरण, लेखा-परीक्षा अथवा नियामकीय निगरानी के अरबों रुपये का चंदा और दान प्राप्त करती हैं। उनके वित्तीय स्रोतों, खर्चों और पारदर्शिता पर शायद ही कभी कोई प्रश्न उठाया जाता है। दूसरी ओर वे संस्थाएँ जो विधिवत पंजीकृत हैं, आयकर अधिनियम के अंतर्गत मान्यता प्राप्त हैं, नियमित लेखा-परीक्षा कराती हैं और सरकार के समक्ष समय-समय पर अपने प्रतिवेदन प्रस्तुत करती हैं, वे अक्सर विभिन्न विभागों की जांच, नोटिसों और प्रशासनिक उत्पीड़न का सामना करती दिखाई देती हैं।

यह स्थिति कई गंभीर प्रश्न खड़े करती है। यदि कोई संस्था कानून का पालन करते हुए पंजीकरण कराती है, आयकर अधिनियम की शर्तों का पालन करती है और अपनी गतिविधियों को पारदर्शी बनाती है, तो क्या उसे इसका पुरस्कार मिलना चाहिए या दंड? क्या ईमानदार संस्थाओं को बार-बार संदेह की दृष्टि से देखना और उन्हें कागजी कार्यवाहियों में उलझाना न्यायसंगत कहा जा सकता है?

विडंबना यह है कि जो संस्थाएँ व्यवस्था के दायरे में आती हैं, उन्हीं पर नियमों का सबसे अधिक बोझ डाला जाता है। वहीं जो संस्थाएँ किसी भी प्रकार की जवाबदेही से दूर हैं, वे कई बार प्रशासनिक निगाहों से बची रहती हैं। परिणामस्वरूप समाज में यह संदेश जाता है कि कानून का पालन करने वाला व्यक्ति और संस्था ही सबसे अधिक परेशान किए जाएंगे, जबकि नियमों की अनदेखी करने वालों पर कार्रवाई अनिश्चित है।

लोकतंत्र की सफलता का आधार केवल कानून बनाना नहीं, बल्कि उनका निष्पक्ष और समान अनुपालन सुनिश्चित करना है। यदि जांच और कार्रवाई केवल चुनिंदा व्यक्तियों या संस्थाओं तक सीमित रह जाए, तो कानून की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है। कानून का उद्देश्य भय उत्पन्न करना नहीं, बल्कि न्याय और पारदर्शिता स्थापित करना होना चाहिए।

आयकर विभाग और अन्य नियामक संस्थाओं की जिम्मेदारी है कि वे कर चोरी, वित्तीय अनियमितताओं और अवैध लेन-देन पर कठोर कार्रवाई करें। किंतु यह कार्रवाई तथ्यों और प्रमाणों के आधार पर होनी चाहिए, न कि केवल इसलिए कि कोई संस्था पंजीकृत है और आसानी से जांच के दायरे में लाई जा सकती है। यदि कोई संस्था वर्षों से नियमों का पालन कर रही है, नियमित विवरण प्रस्तुत कर रही है और समाजहित में कार्य कर रही है, तो उसे अनावश्यक उत्पीड़न का शिकार नहीं बनाया जाना चाहिए।

आज आवश्यकता इस बात की है कि सरकार और उसके विभाग यह सुनिश्चित करें कि कानून का राज वास्तव में सबके लिए समान हो। चाहे संस्था छोटी हो या बड़ी, प्रभावशाली हो या साधारण, पंजीकृत हो या अपंजीकृत—सभी के लिए एक ही मापदंड होना चाहिए। यदि ऐसा नहीं होता, तो संविधान द्वारा प्रदत्त समानता का सिद्धांत केवल पुस्तकों तक सीमित रह जाएगा।

भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहलाता है। इस लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति तभी सिद्ध होगी जब कानून का पालन व्यक्ति या संस्था की पहचान देखकर नहीं, बल्कि तथ्य और न्याय के आधार पर किया जाएगा। अन्यथा यह धारणा और मजबूत होगी कि भारत में कानून की कठोरता और उदारता, दोनों का निर्धारण व्यक्ति या संस्था की स्थिति देखकर किया जाता है, न कि कानून की कसौटी पर।

यही प्रश्न आज देश के करोड़ों नागरिकों के मन में है-क्या भारत में कानून वास्तव में सबके लिए समान है, या फिर उसका अनुपालन व्यक्ति और परिस्थिति देखकर किया जाता है?

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