कला एवं संस्कृति विभाग की ‘आम्रपाली प्रशिक्षण केंद्र’ योजना पर गंभीर प्रश्न
पंडित हृदय नारायण झा
बिहार की गौरवशाली एवं समृद्ध सांगीतिक-सांस्कृतिक परंपरा के संरक्षण एवं संवर्द्धन के नाम पर कला एवं संस्कृति विभाग द्वारा जिला स्तरीय ‘आम्रपाली प्रशिक्षण केंद्र’ संचालित करने की पहल अनेक गंभीर प्रश्नों को जन्म देती है। यह पहल विभागीय अधिकारियों की बिहार की मौलिक संगीत एवं नृत्य परंपराओं के प्रति समझ और संवेदनशीलता के अभाव को भी उजागर करती है।
योजना में कथक एवं भरतनाट्यम जैसे नृत्य रूपों के प्रशिक्षण को शामिल किया गया है। निस्संदेह ये भारतीय संस्कृति की प्रतिष्ठित शास्त्रीय विधाएँ हैं, किंतु ये बिहार की मूल सांस्कृतिक परंपरा का हिस्सा नहीं रही हैं। कथक की प्रमुख परंपराएँ बनारस, लखनऊ और जयपुर घरानों से संबद्ध हैं, जबकि भरतनाट्यम दक्षिण भारत की विशिष्ट नृत्य शैली है, जिसका आधुनिक पुनर्जागरण रुक्मिणी देवी अरुंडेल द्वारा किया गया।
प्रश्न यह है कि बिहार की अपनी लुप्तप्राय सांगीतिक एवं नृत्य परंपराओं की उपेक्षा कर इन विधाओं को बढ़ावा देने से बिहार की किस सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण होगा?
आज आवश्यकता बिहार की उन परंपराओं के पुनर्जीवन की है जो विलुप्ति के कगार पर खड़ी हैं। विशेष रूप से मधुबनी के दरबारी दास के नर्तक घराने की परंपरा, जिसमें महाकवि जयदेव की गीतगोविंद अष्टपदी तथा विद्यापति, उमापति, मनबोध और गोविंददास जैसे कवियों की रचनाओं पर आधारित विशिष्ट गायन एवं भावनृत्य शैली विकसित हुई थी, संरक्षण की प्रतीक्षा कर रही है। यह परंपरा कभी राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित थी और इसे देखने-सुनने के लिए सिद्धेश्वरी देवी तथा कुंदनलाल सहगल जैसे महान कलाकार भी आते थे।
विडंबना यह है कि बिहार संगीत नाटक अकादमी के अंतर्गत लुप्तप्राय गीत, संगीत, नाटक और लोकगाथाओं के दस्तावेजीकरण का प्रावधान होने के बावजूद इस दिशा में अपेक्षित कार्य नहीं हो सका। बिना किसी व्यापक शोध, सर्वेक्षण या सांस्कृतिक अध्ययन के किसी योजना को बिहार की संगीत परंपरा के संरक्षण का माध्यम घोषित कर देना दूरदर्शिता नहीं कहा जा सकता।
बिहार की सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण हेतु निम्नलिखित क्षेत्रों में प्राथमिकता के आधार पर कार्य होना चाहिए:-
- मैथिली, भोजपुरी, मगही, अंगिका एवं बज्जिका के लुप्तप्राय लोकगीतों और धुनों का संग्रह एवं दस्तावेजीकरण।
- लोकगाथाओं तथा नदी संस्कृति से जुड़े गीतों का संरक्षण।
- विद्यापति संगीत की नृत्य, नाट्य एवं नाटिका परंपरा का पुनर्जीवन।
- दरभंगा, बेतिया एवं डुमरांव घरानों की ध्रुपद गायिकी का संरक्षण।
- बिहार के खयाल गायन घरानों पर शोध एवं संरक्षण कार्यक्रम।
- लोकजीवन में प्रचलित संस्कृत श्लोक, छंद एवं स्तोत्र गायन की परंपरा का पुनर्जागरण।
- कबीर, सूर, तुलसी, मीरा, नानक, लक्ष्मी सखी, धर्मदास एवं ब्रह्मानंद जैसे संत कवियों के लोकभजनों की परंपरा का संरक्षण एवं संवर्द्धन।
जब बिहार की अपनी असंख्य सांस्कृतिक विधाएँ संरक्षण की बाट जोह रही हैं, तब कला एवं संस्कृति विभाग द्वारा कथक और भरतनाट्यम आधारित प्रशिक्षण केंद्रों को बिहार की सांगीतिक परंपरा के संरक्षण का माध्यम बताना स्वाभाविक रूप से बहस का विषय है।
अतः कला एवं संस्कृति विभाग तथा विभागीय मंत्री को सार्वजनिक रूप से यह स्पष्ट करना चाहिए कि बिहार की संगीत एवं सांस्कृतिक परंपराओं के संरक्षण की उनकी अवधारणा क्या है, और किस आधार पर इस योजना को बिहार की सांस्कृतिक आवश्यकताओं के अनुरूप माना गया है।
संस्कृति का संरक्षण तभी सार्थक होगा जब वह अपनी जड़ों से जुड़ा हो। बिहार की सांस्कृतिक पहचान उसकी अपनी लोक, शास्त्रीय और आध्यात्मिक परंपराओं में निहित है। संरक्षण की योजनाओं का केंद्र भी इन्हीं परंपराओं को होना चाहिए।
— पंडित हृदय नारायण झा
संगीत एवं संस्कृति शोधकर्ता
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