राजधर्म : मनुस्मृति और भारतीय संविधान, भाग - 21 क
डॉ राकेश कुमार आर्य
डॉ कृष्ण वल्लभ पालीवाल 'मनु की दृष्टि में ब्राह्मण और शूद्र' नमक आलेख में लिखते हैं:-" गत दो सो वर्षों में भारत के सामाजिक, राजनीतिक एवं धार्मिक क्षेत्र में यदि सबसे अधिक चर्चा किसी ग्रंथ की हुई है तो वह है मनु की 'मनुस्मृति '। जिसका हिंदू धर्म शास्त्रों में वेद के बाद सबसे महत्वपूर्ण स्थान है। इसके कई कारण हैं । पहले तो यह ग्रंथ समग्र मानव धर्म को व्यक्त करता है तथा वैदिक वांग्मय का सार और वैदिक ( हिंदू ) विधि विधान है। दूसरे, जहां प्राच्य विद्या के निष्पक्ष जिज्ञासु हजारों वर्षों पूर्व की धार्मिक मान्यताओं तथा सामाजिक एवं राजनीतिक व्यवस्था को इससे समझना चाहते हैं तथा श्रद्धालु हिंदू इसमें अपने कर्तव्यों अकर्तव्यों का मार्ग ढूंढते हैं, वहीं दूसरी ओर हिंदू धर्म शास्त्रों के आलोचक वैदिक परंपराओं से अनभिज्ञ पूर्वाग्रह से ग्रसित कतिपय बिखरे सूत्रों के आधार पर मनुस्मृति को ब्राह्मणवादी तथा शूद्र एवं स्त्री विरोधी होने का आरोप लगाते हैं।"
यह एक सच्चाई है की मनुस्मृति एकमात्र ऐसा ग्रंथ है जो मानवता का धर्मशास्त्र कहा जा सकता है। इस ग्रंथ के माध्यम से मनु महाराज ने मानव का धर्म तो निश्चित किया ही है ,राजनीति का धर्म भी निश्चित किया है। धर्म के बिना राजनीति वैसे ही है जैसे आत्मा के बिना शरीर हो जाता है। राजनीति अपने सही मार्ग पर तभी चल सकती है जब वह अपना धर्म जानती हो। अपना गंतव्य और मंतव्य जानती हो। अपना कर्तव्य जानती हो। अपना अकर्तव्य जानती हो। धर्म के बिना राजनीति अशिक्षित है। पथभ्रष्ट है। दिशाविहीन है। मूढ़ और कर्तव्यशून्य है। इन्हीं सब बातों की दृष्टिगत मनु महाराज ने राजनीति का भी धर्म सुनिश्चित किया। क्योंकि उन्होंने यह भली प्रकार समझ लिया था कि संसार में जितने भी पदार्थ हैं, उन सब का अपना - अपना धर्म है। इसलिए राजनीति का भी धर्म होना चाहिए। वे जानते थे कि धर्म विहीन राजनीति मानवता की हत्यारी हो जाएगी।
राजनीति का धर्म
मनु महाराज के आदि धर्मशास्त्र अथवा आदि संविधान का राजधर्म स्पष्ट है कि देशद्रोही, आतंकवादी लोगों का अंत किया जाए और सज्जन शक्ति का कल्याण किया जाए अर्थात सज्जनों के लिए समाज और राष्ट्र में शांति स्थापित कर उपद्रवी लोगों का अंत किया जाए। लोक, परलोक और विधिलोक सुधारने के लिए राजनीति का पवित्र होना बहुत आवश्यक है और यह तभी संभव है जब राजनीति अपना धर्म जानती हो। अपना उद्देश्य जानती हो। अपना कर्तव्य जानती हो।
आज के संविधान का धर्म
आज का संविधान भी लोक कल्याण को अपने लिए आदर्श मानता है। यदि आज के संविधान का राजधर्म लोक कल्याण माना जाए तो मनु के उपरोक्त राजधर्म के समक्ष यह बहुत छोटा सिद्ध होता है। क्योंकि आज के संविधान ने लोक कल्याण को लोगों की भूख मिटाने और उन्हें शिक्षित बना देने के बाद नौकरी देने को ही महत्व दिया है। यहीं पर लोक कल्याण रुक जाता है। इसके अतिरिक्त उसने दूसरी बातों पर ध्यान नहीं दिया। यह सुनते-सुनते हम सबके कान पक गये कि ' मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है' - उसे सामाजिक रहकर ही जीना है। इसके उलट वर्तमान संविधान ने ऐसी व्यवस्था दी कि आज के कथित सभ्य मानव को फ्लैटों में बंद कर दिया। उसे नहीं पता होता कि पड़ोसी फ्लैट किसका है ? या उसमें क्या हो रहा है ? उसे यह सिखाया गया कि वह संवेदनाशून्य होकर समाज से अलग अपनी स्वयं की बसाई हुई दुनिया में रहे। शेष समाज से उसे कोई लेना देना नहीं है। इसका परिणाम यह हुआ है कि आज की संतानें समाज की तो बात छोड़िए, घर के लिए भी उपयोगी नहीं रही हैं। सामाजिक और पारिवारिक संबंधों में तनाव इतना बढ़ गया है कि पति-पत्नी भी एक दूसरे के साथ रहने को तैयार नहीं हैं। वर्तमान संविधान से पूछा जा सकता है कि क्या वह इसी सभ्यता को विकसित करना चाहता था ? और क्या वह बनी बनाई और बसी बसाई सभ्यता को उजाड़ देना चाहता था ?
मनु का राजधर्म बहुत दूर तक जाता है
आज की संवैधानिक व्यवस्था और उसकी परिणति के विपरीत मनु का राजधर्म इससे बहुत आगे जाता है। मनु का चिंतन है कि भूख मिटा लेना और शिक्षित बन जाना- मनुष्य का इससे काम नहीं चलता। उसे समाज और राष्ट्र में अपनी प्रगति को सुनिश्चित करने के लिए सुरक्षित परिवेश भी चाहिए। यदि सुरक्षित परिवेश है और वह ज्ञानवान है ( शिक्षित नहीं) तो भूख मिटने में देर नहीं लगती। इसलिए मनु की व्यवस्था मनुष्य को सबसे पहले ज्ञानवान बनाना चाहती है। संस्कारवान बनाना चाहती है। चरित्रवान बनाना चाहती है। इस व्यवस्था का उद्देश्य है कि ज्ञानवान, संस्कारवान और चरित्रवान व्यक्ति ही मानव समाज के लिए उपयोगी हो सकता है। ऐसा व्यक्ति ही संसार के लिए उपयोगी हो सकता है।
आज का संविधान मनुष्य को साक्षर बनाकर छोड़ देता है। वह उसे ज्ञानवान, संस्कारवान और चरित्रवान बनने के लिए न तो प्रेरित करता है और न ही वे साधन उपलब्ध कराता है जिनसे मनुष्य ज्ञानवान, संस्कारवान और चरित्रवान बनकर समाज और संसार के लिए उपयोगी हो सकता है। यही कारण है कि आज के संविधान के अंतर्गत कार्य करते हुए सरकारों ने मनुष्य को साक्षर बनाने को भी लोक कल्याण समझा है।
कूड़े को महत्व देती व्यवस्था
यदि मनुस्मृति के चिंतन पर विचार किया जाए तो पता चलता है कि श्रुति परंपरा से मनुष्य ने वेद ज्ञान को लाखों करोड़ों वर्षों तक सुरक्षित रखा। तब लोग साक्षर नहीं होते थे,
परंतु ज्ञानी होते थे। संस्कारवान और चरित्रवान होते थे। इसका अर्थ यह हुआ कि ज्ञानी बनने के लिए तो साक्षर होना भी आवश्यक नहीं ? ज्ञान और साक्षरता का कोई मेल नहीं है। श्रुति परंपरा से मनुष्य निर्माण की योजना को भारत के लोगों ने आज भी भारत के अनेक क्षेत्रों में सुरक्षित रखा हुआ है। आज के लाखों करोड़ों पढ़े लिखे उन शिक्षित लोगों की भीड़ से ( जो माता-पिता की उपेक्षा करते हैं, उनके साथ अभद्र व्यवहार करते हैं, जो नशेड़ी होकर जीवन व्यतीत कर रहे हैं, जो अपने जीवनसाथी के साथ तनावपूर्ण जीवन जीते हैं, जो अपनी संतान का निर्माण नहीं कर पाते, उसे समाज, राष्ट्र और संसार के लिए उपयोगी नहीं बना पाते ) एक वह संस्कारवान और चरित्रवान परंतु अनपढ़ व्यक्ति महत्वपूर्ण है जिसने शांतिपूर्वक अपना जीवन व्यतीत किया है , जो माता-पिता के प्रति सेवाभावी रहा, जिसने पत्नी के साथ मिलकर प्रेम पूर्ण जीवन जिया और अपनी अच्छी संतान के लिए मेहनत कर उसका अच्छा संस्कारवान जीवन बनाने के लिए अपने आप को समर्पित किया। आज का मूर्खों का संसार ऐसे व्यक्ति को अनपढ़ कहकर आगे बढ़ जाता है। वह नहीं जानता कि जो ' हीरा' है उसके साथ वह क्या कर रहा है ? और जो ' कूड़ा ', उसे वह सिर पर क्यों उतार फिर रहा है ? कूड़े को महत्व देती हुई इस व्यवस्था को आप क्या कहेंगे ? यदि व्यवस्था ही कूड़े और हीरे में अंतर नहीं कर पा रही हो तो संसार की गति क्या होगी ? - तनिक विचार कीजिए।.... और बनाओ धर्मनिरपेक्ष संविधान, और बनाओ धर्मनिरपेक्ष सरकार और बनाओ धर्मनिरपेक्ष समाज।
परिणाम के लिए तैयार रहो ....क्योंकि तुम्हारा सर्वनाश निश्चित है। भुला दो मनु को ? क्योंकि तुम्हें वहीं जाना है- जहां तुम्हारा सर्वनाश तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा है। यही तुम्हारी नियति ही बन चुकी है।
निरक्षर लोगों की विशेषता
जो कहने के लिए तो निरक्षर हैं, परंतु उनके पास ज्ञान का ऐसा भंडार है जो अच्छे पढ़े लिखे लोगों के पास भी नहीं मिलता। वह खाने पीने, रहने-सहने की अनेक ऐसी बातों को जानते हैं जिन्हें आज का तथाकथित सभ्य समाज भी नहीं जानता। यदि सूक्ष्मता से देखा जाए तो आज का सभ्य समाज भटकाव का शिकार है। भटकते - भटकते वह इतना भटका कि उसने कपड़े भी ऐसे बदरंग पहनने शुरू कर दिए, जिनमें उसका नंगापन झलकता था। नारी ने मंच पर अपने सारे कपड़े उतार दिए। नंगा समाज नंगई पर उतर आया। बारातों की स्थिति देखिए । वहां पर दारू पीकर सड़कों पर नंगे युवा नाच रहे हैं। विद्यालयों की स्थिति देखिए, वहां पर भी चरित्रहीनता का नंगा नाच हो रहा है।
आज के युवा ने बैठकर खाने के स्थान पर खड़े होकर खाना आरंभ कर दिया, पीने के नाम पर उसने बैठकर पीने के बजाय खड़ा होकर पीना आरंभ कर दिया, दूध को उसने बेकार की वस्तु बताकर कोल्ड ड्रिंक पीना आरंभ कर दिया, घी- छाछ से उसने मुंह फेर लिया, मक्की, ज्वार, बाजरा के स्थान पर अनाप-शनाप खाने लगा इत्यादि । अब जब चारों ओर से चांटे लग लिए हैं तो वह अपने पुराने भारतीय समाज के उन लोगों की ओर लौट रहा है जिनको खाने-पीने, रहने - सहने, चलने- फिरने, उठने बैठने का ढंग आता था। आज उसे यह बात पता चल रही है कि धरती गोल क्यों है ?
ऐसी स्थिति क्यों बनी ?
फिर भी यह बात विचारणीय है कि समाज की ऐसी स्थिति क्यों हो गई ? इसका उत्तर है कि हमारी दिशा बदल गई। सोचने का ढंग बदल गया, और इस परिवर्तन के लिए हमारी शिक्षा- नीति जिम्मेदार रही है। जिसने हमको साक्षर और शिक्षित तो बनाया, परंतु संस्कारित नहीं बनाया। मनु महाराज जब अपने धर्मशास्त्र अथवा आदि संविधान के माध्यम से राजधर्म घोषित कर रहे थे तो वे सज्जन शक्ति के लिए ऐसी सभी आवश्यक सुविधाएं राज्य के लिए उसका राजधर्म बताकर घोषित कर रहे थे, जिससे मनुष्य का आत्म विकास हो सके। जिसको अपनाकर समाज में तप और त्याग का परिवेश बने। लोग एक दूसरे के दु:ख-दर्द में सम्मिलित होने में प्रसन्नता की अनुभूति करें।
मनु का लोक धर्म क्या है ?
भारत की संस्कृति तप और त्याग की संस्कृति है। इसमें ब्रह्मचारी अपने आश्रम में रहता हुआ तप करता है। उसका तप और त्याग आत्म विकास के लिए होता है। वह अपने आप को इसलिए तपा रहा होता है कि उसे आगे चलकर समाज और संसार का उद्धार करना है। गृहस्थ में रहने वाला व्यक्ति परिवार के लिए, संतान के लिए तप करता है, त्याग करता है । उसका तप इसलिए होता है कि वह यदि सुसन्तान का निर्माण करने में सफल हुआ तो वह आगे चलकर समाज का उद्धार करने में सहायक होगी। वानप्रस्थ में रहने वाला व्यक्ति समाज के लिए तप-त्याग करता है। वह समाज और संसार के उद्धार के लिए अपने आप को प्रस्तुत कर रहा होता है। संन्यास में रहने वाला व्यक्ति तो पूर्ण तन्मयता के साथ संसार के लिए ही तप करता है । त्याग करता है। मोक्ष की प्राप्ति के लिए तप और त्याग करता है। इसी प्रकार अपने-अपने वर्ण में रहकर भी लोग एक दूसरे के कल्याण के लिए अर्थात संसार के उद्धार के लिए तप और त्याग करते हैं।
पता चला कि मनु महाराज का संविधान ऐसा है जो प्रत्येक व्यक्ति को संसार के उद्धार के लिए समर्पित करता है। प्रत्येक आश्रम को और प्रत्येक वर्ण को संसार के उद्धार के लिए तैयार करता है। मनु और मनुस्मृति का यही लोक धर्म है। मनु का यही पुरुषार्थ उन्हें आज भी संसार का सिरमौर बनाने में सक्षम है।
इस प्रकार हाथ में हाथ डालकर चलने वाले लोगों की एक सामूहिक श्रृंखला बनती है। जिससे एक भी व्यक्ति वंचित नहीं रहता । सब एक दूसरे के हाथ में हाथ डालकर मानो झूमते हुए चल रहे हों और एक ही लक्ष्य बनाकर अपने जीवन को तप और त्याग से भर रहे हों। इस पूरे स्वरूप को क्रियान्वित करने के लिए मनु महाराज हमें पूरा एक दर्शन, एक फिलासफी, एक सोच और एक चिंतन मनुस्मृति के माध्यम से प्रदान करते हैं। जबकि वर्तमान संविधान इन सारे बिंदुओं पर मौन है।
वेद का धर्मादेश
ऋग्वेद ( 10/62/ 11) में उल्लेख आता है कि " ग्रामीण ( आज की भाषा में कहें तो प्रधान ) कल्याण युक्त हो। प्रभूत देने वाला सहस्त्रदा मनु है। उसकी दक्षिणा सूर्य से प्रतिद्वंद्विता करें अर्थात जैसे सूर्य सब पर समान रूप से अपनी किरण बिखेरता है, उसी प्रकार ग्रामीण की दृष्टि में संपूर्ण जनता समान हो।"
राजधर्म के लिए वेद का यह आदेश है। इस आदेश को शिरोधार्य कर मनु महाराज ने ऐसी ही व्यवस्था ग्राम प्रधान से लेकर देश के राजा तक के लिए बनायी। इस व्यवस्था में कोई आरक्षण नहीं, कोई तुष्टीकरण नहीं। किसी भी आधार पर किसी का पक्ष पोषण नहीं। सबके प्रति समान दृष्टि, समान वृष्टि रखने से समान सृष्टि बनना संभव होता है। मनु महाराज जैसे भारतीय मनीषियों ने मनुष्य जीवन के लिए जिन पांच क्लेशों अर्थात अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश को चिन्हित किया है, उनमें सबसे पहला क्लेश अविद्या है। इस अविद्या को ' साक्षरता अभियान ' नहीं मिटा सकता। यहां तक कि सबको शिक्षित करने का अभियान भी नहीं मिटा सकता। विशेष रूप से तब जब ' साक्षरता अभियान ' में लगे लोग स्वयं ही अविद्याग्रस्त हों।
महात्मा गुरु की आवश्यकता
अविद्या के अंधकार को वही मिटा सकता है, जो स्वयं विद्या के प्रकाश का आनंद ले रहा हो। इस अविद्या को मिटाने के लिए सुरक्षित परिवेश की आवश्यकता होती है। साथ ही शांत सात्विक परिवेश बना रहना भी आवश्यक होता है। इसके अतिरिक्त विद्यानुरागी शिष्यों का होना भी आवश्यक होता है और इन सबसे बढ़कर विद्या के प्रकाश में विचरण करने वाले शान्त सात्विक वृत्तियों वाले महात्मा गुरु की भी आवश्यकता होती है। यह ध्यान रखना चाहिए कि शिष्य के निर्माण से पहले गुरु का निर्माण होता है। यह भूल जाइए कि गुरु से पहले शिष्य होता है। ध्यान रखिए कि गुरु से पहले सबका गुरु परमेश्वर खड़ा है। वहां से आगे सब शिष्य हैं। हम सब महानतम गुरु के शिष्य हैं, इस बात को सदा ध्यान रखिए। मनु ने इसी बात को ध्यान में रखकर अपने विधान की रचना की। गुरुत्व में सबसे बढ़कर भी उन्होंने अपने आप को शिष्यत्व भाव से प्रस्तुत किया। यही उनकी महानता है।
विद्यालय बन गये वेश्यालय
गुरु यदि हल्का रह गया तो शिष्यों का हल्का रहना स्वाभाविक है और यदि गुरु चरित्र और आचरण में ऊंचा है तो शिष्यों का भी वैसा ही बनना निश्चित है। मनु आदर्श गुरु निर्माण के बाद आदर्श शिष्य निर्माण पर ध्यान देते हैं, जबकि आज का संविधान सर्वप्रथम तो अपना राजधर्म घोषित ही नहीं करता और यदि करता भी है तो वह न तो आदर्श गुरु निर्माण की कोई योजना बताता है और न ही आदर्श शिष्य निर्माण पर ध्यान देता है। यह देखकर सिर शर्म से झुक जाता है जब किसी समाचार पत्र में यह समाचार प्रकाशित होता है कि एक चरित्रभ्रष्ट 'गुरु ' ( वास्तव में इसे गुरु तो कहा ही नहीं जा सकता ) विद्यालय में अकेले में लड़कियों को बुलाकर उनको अंक बढ़ाने का झांसा देकर उनका देह शोषण कर रहा है और शिष्य विद्यालय में ही वह सारा अनाचार और व्यभिचार कर रहा है, जिसकी उससे अपेक्षा नहीं की जा सकती। इस प्रकार जो गुरुकुल कभी चरित्र निर्माण की शिक्षा दिया करते थे , वह आज विद्यालय के रूप में वेश्यालय का काम कर रहे हैं। गुरुकुल और विद्यालयों से तो देश का, देश के युवा का निर्माण हो सकता है, राष्ट्र और विश्व का निर्माण हो सकता है परंतु किसी वेश्यालय से युवा का निर्माण नहीं हो सकता, राष्ट्र और विश्व का निर्माण नहीं हो सकता। वहां से तो राष्ट्र विनाश और विश्व विनाश निकलता है। उसका विषैला धुंआ निकलता है, उसकी जहरीली गैस निकलती है, जो सारे संसार का दम घोंट देती है।
यह बहुत ही आश्चर्य का विषय है कि हमारे संविधान में एक भी अनुच्छेद ऐसा नहीं है जो भारत के राजधर्म की घोषणा करता हो। विद्यालयों को गुरुकुल के रूप में परिवर्तित करने की बात करता हो और विद्यालयों को वेश्यालय बनने से रोकता हो। जबकि मनु के धर्मशास्त्र में ऐसा नहीं है।
( लेखक डॉ राकेश कुमार आर्य सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता हैं)
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