तृष्णा पर विजय
अरुण दिव्यांशतृष्णा पर विजय प्राप्त कर ,
तृष्णा है अपूर्ण अभिलाषा ।
तृष्णा में ही ये जीवन बीता ,
अंतिम श्वास ये बीता त्रासा ।।
तृष्णा पर विजय तू पा ले ,
तृष्णा करता आजाद नहीं ।
दौड़ते रहोगे हिरन बनकर ,
कभी होगे तू आबाद नहीं ।।
जीवन को मिले सुख नहीं ,
रौनकता तेरे ये मुख नहीं ।
दौड़ते रहेगा तू भूखे प्यासे ,
मिट सकता ये भूख नहीं ।।
जीत लो प्यारे बंधु तृष्णा ,
दिल को तो हारकर देख ।
मन होता है बहुत चंचल ,
मन तू निज मारकर देख ।।
त्याग दे मन से तृष्णा को ,
तृष्णा त्याग ही विजय है ।
तृष्णा त्याग कृष्णा मिले ,
पावन धरा तेरा ये जय है ।।
पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण ) बिहार ।
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