सौहार्द को जीत लो
अरुण दिव्यांशमधुर स्वभाव प्रीत ले ,
मानवता को मीत ले ,
हर्षित मन तू गीत ले ,
सुखद सौहार्द जीत ले ।
जीवों का त्रास भरेगा ,
हथेली पे वास करेगा ,
प्राणों से सबका प्यारा ,
सुखद एहसास करेगा ।
बन जाना तू श्रीकृष्ण ,
सुदामा समझ अपना ले ,
विश्व चलेगा संग तेरे ,
मन तू सुंदर सपना ले ।
जग से तू न्यारा होगा ,
ऑंखों का तारा होगा ,
विश्व चले पदचिन्ह तेरे ,
एक तेरा इशारा होगा ।
तू बनेगा प्यारा सूरज ,
तू शीतल चान बनेगा ,
तू बनेगा भारत गौरव ,
तू विश्व अरमान बनेगा ।
पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )बिहार ।
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