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आम

आम

अरुण दिव्यांश
आम ले लो आम ,
सस्ते लगे हैं दाम ,
आम देखो ताजा ,
खाने में है माजा ।
सुंदर स्वादिष्ट लो ,
मन भरकर खाओ ,
रोते होंगे बच्चे तेरे ,
ले उसे खिलाओ ।
मौसमी फल राजा ,
ऐसा कहाॅं है गाजा ,
आम है ताजा ताजा ,
आम बजा दे बाजा ।
आम जो खा न पाए ,
ऋतु बीतते पछताए ,
पीछे पछताए हो क्या ,
जब चिड़ी चुग जाए ।
ऋतु जब ये बीत जाए ,
आम कहाॅं मिल पाए ,
पैसे रहेंगे धरे के धरे ,
आगे न कोई उपाय ।


पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )बिहार ।
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