ईश्वर का संदेश
रचना:-- डॉ. रवि शंकर मिश्र "राकेश"॥ मुखड़ा ॥
तुम सब तो करोड़ों में और मैं बस एक अकेला हूँ,
चाहूँ मैं सुकूँ, पर रोज़ स्वार्थों का ये मेला हूँ।
मंगल आरती करके मुझे गुड़िया सा सजाते हो,
भोग तुम मुझे लगाते, पर खुद ही खा जाते हो॥
अंतरा - 1
चख लूँ जो जलेबी एक, दूजा न कोई फल दोगे,
जानूँ मैं ये अच्छी तरह, प्रसाद चढ़ाना तुम तज दोगे।
कुंवारे चाहते शादी, बे-औलाद ललना मांगते हैं,
कोई नौकरी मांगे, तो कोई सुघर कन्या मांगते हैं॥
अंतरा - 2
माता-पिता नहीं भाते, सब संपत्ति ही चाहते हैं,
कोई मेहनत से कमाए, कोई चोरी की राह सजाते हैं।
जो भी आता है मंदिर में, वो घंटी बजाकर जाता है,
मेरे कानों को कर परेशान, अपनी अर्ज़ी सुनाता है॥॥
अंतरा - 3
काम न करूँ तो श्रद्धा तुम्हारी झट से कम हो जाती है,
काम जो बन जाए, तो महाभोग की थाली सज जाती है।
सूखा पड़े तो यज्ञ करो, आफ़त आए तो मुझे मनाते हो,
गलती तुम खुद करते हो, और क्षमा मुझसे ही मांगते हो॥
अंतरा - 4
किसी को बाज़ार बढ़ाना, किसी को मुफ्त का माल चाहिए,
कोई रोटी को तरसे, तो किसी को आलीशान दालान चाहिए।
सच कहूँ तो दुनिया में, मैं कुछ भी नहीं हूँ करता,
पर दोष मेरे मत्थे मढ़, हर शख़्स यहाँ है अकड़ता॥॥
अंतरा - 5
न शादी मैं कराता हूँ, न रिश्ता मैं तुड़वाता हूँ,
कोई मैरेज ब्यूरो या, न रोज़गार दफ़्तर चलाता हूँ।
दिए जंगल नहीं काटे, न इमारत मैंने ये तानी,
न मैं देता अमीरी-मुफ़लिसी, समझो ज़रा बानी॥
अंतरा - 6
हरी-भरी पृथ्वी दी तुमको, जो तुमने राख कर डाली,
मेरा क्या दोष है इसमें, जो दुनिया कर दी मतवाली।
अणु मैंने तुम्हें बख़्शा, मगर तुमने तो बम ठाना,
फिर कहते हो कि दुनिया में, अमन का लायें हम ज़माना॥॥
अंतरा - 7
प्रार्थना की आड़ में तुम, मुझे आदेश ही देते हो,
बताओ नौकर हूँ या ईश्वर, जो तुम हक़ जताते हो।
इतनी सेवा के बाद भी, कहते हो मैं सुनता नहीं,
पर अपने मन के भीतर, तुम कोई पुण्य बुनते नहीं॥
अंतरा - 8
जो देना था मैं दे बैठा, अब मेरे पास कुछ भी नहीं,
नारियल अब चढ़ाकर तुम, मुझे शर्मिंदा करो न यूँ ही।
मेरे एजेंट जो बनते, वो बस कमिशन खाते हैं,
काम करवाने का जो वादा, तुम्हें झूठा सुनाते हैं॥
अंतरा - 9
दुआएँ तो बहुत कीं तुमने, आज मेरी भी अरज़ सुन लो,
मंदिर तुम तभी आना, कोई ख़्वाहिश न जो मन में हो।
शायद ये सुनने के बाद, कोई दर्शन को न आए,
मगर मैं सच ही बोलूँगा, चाहे जो भी हो जाए॥
अंतरा - 10
दलालों और ढोंगियों से, तुम सदा बचकर रहना,
जो केवल छल सिखाते हैं, उनसे दूर ही रहना।
आज ईश्वर खुद बंदे से, एक छोटी भीख मांगता है,
निष्काम भाव से आओ, मेरा मन यही चाहता है॥
अंतरा - 11
जैसे कर्म करोगे भाई, वैसा ही फल तुम पाओगे,
कर्म किए बिन इस जग में, तुम चैन कहाँ से पाओगे।
शब्दों को विराम देकर, अब मैं भी मौन हो जाता हूँ,
तुम्हारे कर्म की रेखा में, मैं खुद को ढाल जाता हूँ॥
अंतरा - 12 समापन
"राकेश" ध्यान दो अपने, सिर्फ़ और सिर्फ़ कर्मों पर,
मिलेगा फल वही तुमको, जो लिखा कर्म के पन्नों पर।मेरी व्यथा को तुम समझो, यही मेरी गुज़ारिश है,कर्म का चक्र चलता है, इसी में सब बंदिश है॥
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