तुम्हारे चेहरे का निखार, देता आनंद अपार
कुमार महेंद्रतुम्हारे नयनों की नीलिमा में,
यह चंचल मन खो जाता है।
जब अधरों पर मुस्कान खिले,
हर मौसम मधुवन हो जाता है।
यह मंद-मंद बहती शीतल समीर,
लाए प्रणय-संदेशों की फुहार।
तुम्हारे चेहरे का निखार, देता आनंद अपार।।
इस कांतिमय मुखमंडल का,
दर्शन परम सुखधाम लगे।
तुम्हारे संग बीता हर एक पल,
जीवन का पावन धाम लगे।
जब थामूँ मैं तेरा कोमल कर,
झंकृत हो उठे मन के तार।
तुम्हारे चेहरे का निखार, देता आनंद अपार।।
जब-जब मैं निहारूँ तुम्हें,
युग-युग का विरह सिमट जाए।
यह सृष्टि लगे स्वर्गिक उपवन,
जब प्रेम-दीप अंतर में छाए।
रब से बस इतनी अभिलाषा,
हो प्रीत-स्वप्न साकार।
तुम्हारे चेहरे का निखार, देता आनंद अपार।।
जब तुम समीप आती हो,
धड़कन प्रीति-राग सुनाती है।
मेरे जीवन की हर श्वास,
तेरा ही नाम जपाती है।
तुम ही मेरा आदि-अंत हो,
तुम ही मेरा प्राणाधार।
तुम्हारे चेहरे का निखार, देता आनंद अपार।।
तुम चाँद नहीं, चाँदनी भी हो,
तुम स्वप्न नहीं, विश्वास प्रिये।
मेरे सूने मन-आँगन की,
तुम सबसे मधुर सुवास प्रिये।
तेरे होने से ही जीवन में,
खिलता है सुख का संसार।
तुम्हारे चेहरे का निखार, देता आनंद अपार।।
कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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