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आदि-सांस्कृतिक महासंगम: कीकट, मगध और हिरण्य प्रदेश

आदि-सांस्कृतिक महासंगम: कीकट, मगध और हिरण्य प्रदेश

सत्येन्द्र कुमार पाठक
भारतीय इतिहास और पौराणिक वास्तुकला का अध्ययन जब हम वैदिक और उत्तर-वैदिक काल के परिप्रेक्ष्य में करते हैं, तो पूर्वोत्तर भारत की भूमि—विशेषकर आधुनिक बिहार का क्षेत्र—एक अत्यंत विशिष्ट सांस्कृतिक इकाई के रूप में उभरता है। जहाँ एक ओर सप्त-सैंधव, ब्रह्मावर्त और आर्यावर्त का क्षेत्र मुख्यधारा के वैदिक सूक्तों, कठोर यज्ञ-कर्मकांडों और संहिताओं के निर्माण में लीन था, वहीं दूसरी ओर तत्कालीन 'कीकट प्रदेश' (मगध) और 'हिरण्य प्रदेश' (अंग-मुंगेर) की भूमि एक भिन्न विचार-सरणी का नेतृत्व कर रही थी। वैदिक साहित्यों में इस क्षेत्र को प्रायः 'अनार्य' या 'व्रात्य' संस्कृति का केंद्र कहा गया है। 'व्रात्य' का अर्थ है—वह जो किसी रूढ़िवादी नियम, संकीर्ण कर्मकांड या पूर्वनिर्धारित संहिताओं के बंधनों से मुक्त हो। यह भूमि स्वतंत्र चिंतन, प्रकृति-पूजा, तांत्रिक साधना और गणतांत्रिक मूल्यों की जननी थी। इस अनूठी संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि यहाँ नारी केवल समाज की मूक दर्शक या महलों की शोभा नहीं थी; वह ज्ञान के शिखर पर बैठकर ऋषियों से शास्त्रार्थ भी करती थी, रणक्षेत्र में रथ के घोड़े भी दौड़ाती थी, और आवश्यकता पड़ने पर अपनी स्वतंत्र सत्ता के लिए स्थापित व्यवस्थाओं को चुनौती भी देती थी। प्रस्तुत आलेख वैदिक विदुषियों से लेकर कीकट और हिरण्य प्रदेश की उन महान देव, असुर और राक्षस संस्कृतियों की वीरांगनाओं को समर्पित है, जिन्होंने भारत के वैचारिक और राजनैतिक इतिहास को एक नया आयाम दिया।
वैदिक युग में स्त्रियों को उपनयन संस्कार, वेदाध्ययन और दार्शनिक चिंतन के सर्वोच्च अधिकार प्राप्त थे। इस काल में स्त्रियों की दो श्रेणियाँ थीं—'सद्योवधू' (जो विवाह पूर्व तक शिक्षा प्राप्त करती थीं) और 'ब्रह्मवादिनी' (जो जीवनभर अविवाहित रहकर वेद-वेदांगों पर शोध और शास्त्रार्थ करती थीं)। तत्कालीन भारत और विशेषकर विदेह (मिथिला) की सीमाओं से जुड़े क्षेत्रों में इन विदुषियों ने ज्ञान की जो मशाल जलाई, वह आज भी अनुकरणीय है।
गार्गी वाचक्नवी: परम तार्किक चेतना - वैदिक साहित्य की सबसे प्रखर और निर्भीक विदुषी गार्गी थीं। राजा जनक की राजसभा में जब महर्षि याज्ञवल्क्य ने स्वयं को सर्वश्रेष्ठ ज्ञानी घोषित करते हुए सहस्त्रों स्वर्ण-मंडित गाएँ ले जाने का प्रयास किया, तब पूरी सभा स्तब्ध थी। उस समय गार्गी ने खड़े होकर याज्ञवल्क्य को चुनौती दी। उन्होंने 'ब्रह्म-विद्या' और ब्रह्मांड के रहस्यों पर ऐसे सूक्ष्म और अकाट्य प्रश्न पूछे कि परम ज्ञानी याज्ञवल्क्य भी एक क्षण के लिए निरुत्तर हो गए और उन्हें कहना पड़ा—"गार्गी! इससे आगे मत पूछो, अन्यथा तुम्हारा सिर गिर जाएगा।" गार्गी का यह शास्त्रार्थ इस बात का साक्षात प्रमाण है कि उस युग में नारी की तार्किक क्षमता पुरुष प्रधान बौद्धिक सत्ता से कहीं आगे थी।
मैत्रेयी: आत्मा और अमरत्व की खोजी - महर्षि याज्ञवल्क्य की पत्नी मैत्रेयी भौतिक संपदा से ऊपर उठकर आत्मज्ञान को महत्व देने वाली परम दार्शनिक थीं। जब याज्ञवल्क्य ने गृहस्थ आश्रम त्यागकर संन्यास लेने का निर्णय किया और अपनी धन-संपत्ति को अपनी दो पत्नियों (कात्यायनी और मैत्रेयी) में बांटना चाहा, तब मैत्रेयी ने इतिहास का सबसे सुंदर प्रश्न पूछा—"भगवन! यदि यह संपूर्ण पृथ्वी धन से पूर्ण होकर मुझे मिल जाए, तो क्या मैं अमर हो जाऊँगी?" याज्ञवल्क्य ने उत्तर दिया—"नहीं, तुम्हारा जीवन भी वैसा ही हो जाएगा जैसा साधन-संपन्नों का होता है, धन से अमरत्व की आशा नहीं है।" तब मैत्रेयी ने कहा—"जिससे मुझे अमरत्व न मिले, मैं उसका क्या करूँगी? मुझे वह ज्ञान दीजिए जिससे आत्मा का कल्याण हो।" उनके बीच का यह संवाद 'बृहदारण्यक उपनिषद' का सबसे मूल्यवान दार्शनिक हिस्सा है।
लोपामुद्रा: मंत्र-द्रष्टा और गृहस्थ साधिका - अगस्त्य ऋषि की पत्नी लोपामुद्रा स्वयं एक महान विदुषी और ऋग्वेद के कई मंत्रों (सूक्तों) की द्रष्टा (रचयिता) थीं। उन्होंने तपस्या और गृहस्थ जीवन के बीच एक अद्भुत संतुलन स्थापित किया। उनका मानना था कि साधना केवल वनों में भूखे रहने का नाम नहीं है, बल्कि जीवन के कर्तव्यों को निभाते हुए चेतना को जाग्रत रखना ही सच्ची आध्यात्मिक विजय है
पौराणिक कालक्रम में, 'स्वायंभुव मन्वंतर' और 'वैवस्वत मन्वंतर' के दौरान पूर्वी भारत के इस भूभाग की भौगोलिक और सांस्कृतिक पहचान आकार ले रही थी। 'ऋग्वेद' में जिसे 'कीकट' कहा गया, उसे ही बाद के साहित्यों में मगध, अंग, मिथिला, वज्जि और करुष (आधुनिक बक्सर-भोजपुर क्षेत्र) के नाम से जाना गया। इस पौराणिक काल में भी इस क्षेत्र की नारियों का संबंध देश के सर्वोच्च दार्शनिक और राजनीतिक परिवारों से था।
इला: वैवस्वत मनु की पुत्री (जिन्हें पौराणिक कथाओं में परिस्थितियों के अनुसार चंद्रवंश की मूल प्रवर्तक भी माना गया है)। बुद्ध (चंद्रमा के पुत्र) की पत्नी इला का संबंध इस क्षेत्र की प्रारंभिक चेतना और भूमि प्रबंधन से जुड़ता है। सुकन्या: राजा शर्याति की पुत्री सुकन्या का चरित्र अदम्य निष्ठा और साहस का प्रतीक है। कीकट की सीमाओं से जुड़े घने वनों में तपस्यारत वृद्ध और दृष्टिहीन च्यवन ऋषि से उनका विवाह हुआ। सुकन्या ने अपने पातिव्रत्य और बुद्धिमत्ता से देव-वैद्यों (अश्विनी कुमारों) को विवश किया कि वे च्यवन ऋषि को पुनः युवा और दृष्टि-संपन्न करें। सुकन्या का यह प्रयास इस क्षेत्र में जड़ी-बूटी विज्ञान और प्रारंभिक आयुर्वेद (जिससे च्यवनप्राश का आविष्कार हुआ) के संरक्षण का आधार बना।
कीकट प्रदेश में संस्कृतियों का टकराव और वीरांगनाएँ
कीकट या मगध प्रदेश अपनी युद्ध-कौशल, स्वतंत्र चेतना और गणतांत्रिक मूल्यों के लिए विख्यात था। यहाँ देव, - असुर और राक्षस संस्कृतियों का एक ऐसा ताना-बाना था, जहाँ प्रत्येक संस्कृति की अपनी महिला नायक थीं। कीकट , मगध की नारी चेताना का देव संस्कृति में मंगला गौरी , कालिका उग्रतारा , असुर संस्कृति का निभीषणी , विभिक्षुणी , ज़रा , राक्षस संस्कृति की ताड़का शास्त्र संचालिका एवं सैन्य बल , थी ।
देव संस्कृति की वीरांगनाएँ (स्थापना और आध्यात्मिक ऊर्जा) - देव संस्कृति के अंतर्गत इस क्षेत्र में उन शक्तियों का प्रकटीकरण हुआ, जिन्होंने तांत्रिक और आध्यात्मिक साधना चक्र को सुचारू किया। मंगला गौरी: शिव पुराण और देवी भागवत के अनुसार, राजा दक्ष के साम्राज्य में जब सती ने देह त्यागी, तब उनके अंगों के गिरने से जो शक्तिपीठ बने, उनमें गया का भस्मकूट पर्वत सबसे प्रमुख था, जहाँ देवी 'मंगला' (मंगला गौरी) के रूप में प्रतिष्ठित हुईं। वे लोक-कल्याण और स्त्री-ऊर्जा की प्रतीक बनीं।
कालिका (उग्र तारा): कीकट प्रदेश प्राचीन काल से ही तंत्र का मुख्य केंद्र था। यहाँ देवताओं के तेज और आदि-शक्ति के क्रोध से महाकाली का प्राकट्य हुआ, जिन्होंने महिषासुर, शुंभ-निशुंभ और रक्तबीज जैसी उग्र आसुरी सत्ताओं का दमन किया, जो तत्कालीन भौगोलिक सीमाओं में फैली हुई थीं।
असुर संस्कृति की वीरांगनाएँ (समानान्तर सत्ता और रक्षण) - असुर संस्कृति में मगध को गयासुर और कोलाहल जैसे राजाओं की भूमि माना गया है। यहाँ की वीरांगनाएँ वैदिक कर्मकांडों के प्रभुत्व के विरुद्ध अपनी भूमि की रक्षा करती थीं। विभीषणी / विभूक्षणी (किकट रक्षिणी): इन्हें पौराणिक आख्यानों में असुरों की कुलदेवी या रक्षक शक्ति माना गया है। इनका मुख्य कार्य कीकट प्रदेश की सीमाओं में बलात प्रवेश करने वाले बाहरी तत्वों को रोकना और स्थानीय निवासियों की जीवन पद्धति की रक्षा करना था। महाभारत काल में भी इसी परंपरा के अंतर्गत 'जरा' नाम की राक्षसी/असुरी का वर्णन मिलता है, जिसने जरासंध के दो अलग-अलग टुकड़ों को जोड़कर उसे जीवनदान दिया था, और इसी कारण वह मगध की कुलदेवी पूजनीय बनी।
राक्षस संस्कृति की वीरांगना: ताड़का (सैन्य प्रभुत्व) - राक्षस संस्कृति का कीकट और कारुष (बक्सर , रोहतास , भभुआ , भोजपुर ) की सीमा पर सबसे सशक्त हस्तक्षेप त्रेतायुग में देखने को मिलता है। ताड़का: ताड़का मूल रूप से सुकेतु यक्ष की पुत्री थी, जो अस्त्र-शस्त्र संचालन में अत्यंत निपुण थी। उसका विवाह 'सुन्द' नाम के दैत्य से हुआ था। पति की मृत्यु के बाद अगस्त्य ऋषि के शाप से वह राक्षसी रूप में परिवर्तित हो गई। उसने अपने पुत्रों (मारीच और सुबाहु) के साथ मिलकर कारुष और कीकट की सीमा (आधुनिक बक्सर का सुंदर वन क्षेत्र) पर अपना एक छत्र साम्राज्य स्थापित किया। ताड़का कोई सामान्य स्त्री नहीं थी; उसमें 'हजार हाथियों का बल' था और वह बिना अस्त्रों के केवल पत्थरों की वर्षा और मायावी युद्ध से शत्रुओं को परास्त कर देती थी। वह लंका के राजा रावण के साम्राज्य का एक तरह से उत्तरी सुरक्षा कवच (Buffer Zone) थी, जो सिद्धाश्रम (महर्षि विश्वामित्र के आश्रम) के यज्ञों को नष्ट करती थी, क्योंकि वे यज्ञ वनों को काटकर देव-साम्राज्य के विस्तार के लिए किए जा रहे थे। अंततः विश्वामित्र की आज्ञा से भगवान श्री राम ने इस वीर और मायावी राक्षसी का वध किया।
. हिरण्य प्रदेश आधुनिक अरवल , औरंगाबाद ,पटना , नालंदा , गया , जहानाबाद की वीरांगनाएँ: शौर्य और तप का संगम था । आधुनिक मुंगेर, भागलपुर और खगड़िया का क्षेत्र, जो प्राचीन काल में 'अंग देश' और मगध की पूर्वी सीमा का हिस्सा था, पौराणिक साहित्यों में हिरण्य प्रदेश के नाम से जाना जाता है। इसका नामकरण यहाँ की स्वर्णमयी भूमि, नदियों और असुर सम्राट हिरण्यकशिपु के प्रभाव के कारण हुआ। यहाँ भी देव और असुर संस्कृतियों की वीरांगनाओं ने इतिहास पर अपनी अमिट छाप छोड़ दिया ।
मुदगलानी (इंद्रसेना) — ऋग्वेद की अदम्य योद्धा: हिरण्य प्रदेश की पश्चिमी सीमा पर मुंगेर की पहाड़ियों में महर्षि मुद्गल का आश्रम था। ऋषि मुद्गल की पत्नी मुदगलानी (इंद्रसेना) ऋग्वेद के दसवें मंडल (१०.१०२) की सूक्त-द्रष्टा होने के साथ-साथ एक अत्यंत कुशल रथ-सारथी और योद्धा थीं। जब असुरों ने उनके आश्रम पर आक्रमण कर उनकी गायों (गोधन) को चुरा लिया, तब मुदगलानी घबराई नहीं। उन्होंने स्वयं रथ की कमान संभाली, हाथ में अस्त्र-शस्त्र धारण किए और युद्ध के मैदान में उतर गईं। उन्होंने अद्भुत शौर्य का प्रदर्शन करते हुए असुर सेना को खदेड़ दिया और अपने गोधन को सकुशल मुक्त कराया। वे भारतीय इतिहास की उन प्रारंभिक नारी पात्रों में से हैं जो शास्त्र और शस्त्र दोनों में पारंगत थीं।
देवी शांता — त्याग और बुद्धिमत्ता की प्रतिमूर्ति: महाराजा दशरथ की पुत्री और अंगराज लोमपाद की दत्तक पुत्री शांता अत्यधिक विदुषी थीं। जब हिरण्य/अंग प्रदेश में भयंकर अकाल पड़ा, तब शांता ने अपने सुखों का त्याग कर महान तपस्वी महर्षि ऋष्यश्रृंग को अंग देश (आधुनिक ऋषिकुंड, मुंगेर) आने के लिए प्रेरित किया। उनके इस त्याग और धार्मिक अनुष्ठान के प्रभाव से संपूर्ण क्षेत्र मूसलाधार वर्षा से सराबोर हो गया और प्रजा को भुखमरी से मुक्ति मिली। बाद में, शांता की ही देखरेख में अयोध्या में 'पुत्रेष्टि यज्ञ' संपन्न हुआ, जिसके परिणामस्वरूप देव संस्कृति के महानायक श्री राम का अवतरण हुआ।
हिरण्य प्रदेश का सीधा संबंध असुर सम्राट हिरण्यकशिपु और राजा बलि के वंश से रहा है। यहाँ की असुर नारियाँ अपनी विशिष्ट तांत्रिक और मायावी विद्याओं के लिए जानी जाती थीं। सिंहिका: सिंहिका असुर सम्राट हिरण्यकशिपु की पुत्री और होलिका की बहन थी। वह हिरण्य प्रदेश (मुंगेर-खगड़िया की सीमा, जहाँ गंगा और कोसी का संगम होता है) में सक्रिय थी। सिंहिका के पास एक अत्यंत दुर्लभ तांत्रिक विद्या थी, जिसे 'छायाग्राही विद्या' कहा जाता था। इसके बल पर वह आकाश में उड़ने वाले किसी भी जीव या विमान की परछाई को धरती से ही पकड़कर उसे नीचे खींच लेती थी। उसका उद्देश्य आर्यावर्त के देव-दूतों और विमानों को अपने पिता के साम्राज्य की सीमा में प्रवेश करने से रोकना था। वाल्मीकि रामायण के सुंदरकांड में जब हनुमान जी लंका जा रहे थे, तब समुद्र में उन्हें रोकने वाली सिंहिका को इसी तांत्रिक असुरी शक्ति का विस्तार माना गया है, जिसकी ऐतिहासिक जड़ें इस हिरण्य भूमि से जुड़ी थीं।
वैदिक और पौराणिक काल के बाद जब हम छठी शताब्दी ईसा पूर्व के ऐतिहासिक काल में प्रवेश करते हैं, तो कीकट/मगध क्षेत्र के वैशाली गणराज्य की लिच्छवी राजकुमारी त्रिशला (विदेहदत्ता) का चरित्र स्त्री-चेतना के एक नए रूप को प्रकट करता है। वैशाली विश्व का पहला गणतंत्र था, जहाँ स्वतंत्रता और अधिकारों का मूल्य सर्वोपरि था। इसी गणतांत्रिक आबो-हवा में पली-बढ़ीं माता त्रिशला जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर महावीर स्वामी की माता बनीं। वे अत्यंत साहसी, दूरदर्शी और प्रभावशाली व्यक्तित्व की स्वामिनी थीं। उन्होंने महावीर स्वामी को बचपन से ही स्वतंत्र चिंतन, अहिंसा, जीव-दया और रूढ़िवादी कर्मकांडों से परे हटने के संस्कार दिए। यह इस भूमि की व्रात्य (स्वतंत्र) चेतना का ही प्रभाव था कि महावीर स्वामी ने आगे चलकर एक वैचारिक क्रांति को जन्म दिया, जिसने पूरी दुनिया को शांति और अपरिग्रह का मार्ग दिखाया। प्राचीन बिहार (कीकट, मगध, अंग, बज्जि , मिथिला और करुष प्रदेश) का इतिहास केवल राजाओं के युद्धों या पुरुषों के शौर्य तक सीमित नहीं है। यह भूमि आदिकाल से ही नारी-चेतना के बहुआयामी रूपों की साक्षी रही है। जहाँ एक ओर मिथिला और आर्यावर्त की सीमाओं पर गार्गी और मैत्रेयी जैसी विदुषियों ने अपनी प्रखर बुद्धि से पुरुष प्रधान दार्शनिक सत्ताओं को चुनौती दी और ज्ञान की मशाल जलाई; वहीं दूसरी ओर कीकट और हिरण्य प्रदेश की स्वतंत्र और व्रात्य हवाओं में मुदगलानी जैसी योद्धाओं ने अस्त्र-शस्त्र संभाले। यहाँ ताड़का जैसी राक्षस वीरांगनाओं ने अपनी सैन्य शक्ति से स्थापित व्यवस्थाओं को कंपित किया, तो सिंहिका जैसी असुर नारियों ने अपनी विशिष्ट वैज्ञानिक व तांत्रिक विद्याओं (छायाग्राही विद्या) का प्रदर्शन किया। अंततः, इसी स्वतंत्र चेतना की भूमि से माता त्रिशला जैसी वीरांगनाएँ निकलीं, जिन्होंने विश्व कल्याण के मार्ग को सुगम किया। यह संपूर्ण भूभाग भारत की स्त्री-शक्ति, शौर्य, ज्ञान और स्वतंत्र सोच का वह आदि-स्रोत है, जिस पर संपूर्ण मानवता को गर्व होना च
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