विकास की अंधी दौड़ में सिसकती बिहार की नदिया
सत्येंद्र कुमार पाठक
आज का मानव एक ऐसे आत्मघाती दौर में जी रहा है, जहाँ विकास की परिभाषा केवल कंक्रीट के जंगलों और बहुमंजिला इमारतों तक सिमट कर रह गई है। इस तथाकथित 'भौतिकवादी युग' में हमने अपनी जीवनदायिनी पृथ्वी, नदियों, ऐतिहासिक सरोवरों और पर्यावरण के रक्षक वृक्षों का बेरहमी से दोहन शुरू कर दिया है। हमने इसे ही अपनी 'विकासवादी नीति' मान लिया है। विडंबना देखिए, जिस प्रकृति की छाती को चीरकर, नदियों को सुखाकर और पेड़ों को काटकर हम आलीशान मकान खड़े कर रहे हैं, उसे ही हम अपनी 'भलाई' का दौर समझ बैठे हैं। हकीकत यह है कि यह भलाई नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए तबाही का रास्ता तैयार किया जा रहा है।
'जीवनधारा नमामि गंगे' के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. हरिओम शर्मा के कुशल नेतृत्व और राष्ट्रीय उपाध्यक्ष सत्येन्द्र कुमार पाठक द्वारा हाल ही में बिहार की नदियों, सरोवरों की वर्तमान स्थिति तथा कूपों (कुओं) के अस्तित्व पर एक व्यापक अध्ययन किया गया। इस अध्ययन के निष्कर्ष अत्यंत भयावह और समाज की आंखें खोलने वाले हैं।
कल तक जिन नदियों और जलाशयों का जल आचमन के योग्य था, आज उन्हें घरों की गंदी नालियों, फैक्ट्रियों के कचरे, प्लास्टिक, बोतलों और चाय के कुल्हड़ों का 'ग्लोबल डस्टबिन' बना दिया गया है। हमारी आस्था और पर्यावरण की रीढ़ कहे जाने वाले जलस्रोत आज कचरे के ढेर में तब्दील हो चुके हैं। हमारी संवेदनहीनता ने पवित्र जलधाराओं को मैला नाला बना दिया है। 'जीवनधारा नमामि गंगे' के अध्ययन के अनुसार, बिहार की प्रमुख और ऐतिहासिक नदियों की स्थिति आज अत्यंत दयनीय और चिंताजनक हो चुकी है:
गंगा और सोन नद: मोक्षदायिनी मां गंगा और अपनी विशालता के लिए विख्यात सोन नद का जलस्तर तेजी से घट रहा है। सोन नद का सूखना और गंगा का कई-कई सौ मीटर पीछे चले जाना एक बड़े जल-संकट की आहट है। पुनपुन और फल्गु: पितृ तर्पण और मोक्ष की भूमि कही जाने वाली पुनपुन और फल्गु नदियां आज अपने ही उद्धार के लिए आंसू बहा रही हैं। फल्गु का अंतःसलिला स्वरूप तो गायब हो ही रहा है, इसकी सतह पर कचरे का साम्राज्य स्थापित हो चुका है।
गंडक, बागमती, दरधा और जमुनी: उत्तर से लेकर दक्षिण बिहार तक बहने वाली ये नदियां सिल्टेशन (गाद), कचरा डंपिंग और पानी की भारी कमी से जूझ रही हैं। ये नदियां अब केवल वर्षाकाल में जीवित दिखती हैं, बाकी समय ये मृतप्राय हो जाती हैं। कूपों (कुओं) की विदाई: कभी गांवों की जीवनरेखा कहे जाने वाले पारंपरिक कूप (कुएं) आज पूरी तरह इतिहास के पन्नों में दर्ज होने की कगार पर हैं। अधिकांश कुओं को पाटकर उन पर इमारतें तान दी गई हैं, जिससे भूजल पुनर्भरण (Groundwater Recharge) का प्राकृतिक तंत्र पूरी तरह ध्वस्त हो गया है। बिहार की नदियां आज केवल प्रदूषण से ही नहीं, बल्कि 'अतिक्रमण के चंगुल' में बुरी तरह फंसी हुई हैं। नदियों की जमीन को कब्जाने और उनकी भराई (Landfilling) करके प्लॉट काटने का एक अनियंत्रित 'मकान बनाने का उद्योग' चल पड़ा है। भू-माफियाओं और स्वार्थी तत्वों ने नदियों के प्राकृतिक प्रवाह (Floodplains) को पाट दिया है।
नदी के पाट को छोटा करके कंक्रीट के ढांचे खड़े किए जा रहे हैं। इसके साथ ही, नदियों के किनारों पर लगे उन वृक्षों की अंधाधुंध कटाई हो रही है जो मिट्टी के कटाव को रोकते थे और नदी को जीवन देते थे। हम नदियों को भरकर अपना आशियाना तो बना रहे हैं, लेकिन भूल रहे हैं कि जब नदी अपना रास्ता बदलेगी या उफान पर आएगी, तो यह कंक्रीट का साम्राज्य ताश के पत्तों की तरह ढह जाएगा।
इस विनाश लीला के बीच सबसे बड़ा सवाल सरकारी तंत्र और जल संसाधन विभागों की कार्यप्रणाली पर उठता है। नदियों की सुरक्षा, सफाई और पुनरुद्धार के नाम पर बड़े-बड़े विभाग तो बना दिए गए, करोड़ों-अरबों के बजट भी आवंटित किए गए, लेकिन धरातल पर सब कुछ सिर्फ 'खानापूर्ति' और कागजी घोड़ों तक ही सीमित रह गया।
योजनाएं बनती हैं, बैठकें होती हैं, लेकिन नदियों को उनका पुराना स्वरूप लौटाने वाला कोई 'सच्चा उद्धारक' नजर नहीं आता। जब तक नीतियों में ईमानदारी और क्रियान्वयन में कड़ाई नहीं होगी, तब तक ये विभाग केवल फाइलों को मोटा करने का साधन मात्र बने रहेंगे।
प्रकृति, पर्यावरण, जल, सरोवर और वृक्ष—ये सब हमारी विलासिता की वस्तुएं नहीं, बल्कि हमारे जीवित रहने की बुनियादी शर्तें हैं। लेकिन हमने अपने ही हाथों अपनी इन जीवनधाराओं का गला घोंट दिया है। 'जीवनधारा नमामि गंगे' का यह अध्ययन संपूर्ण समाज और शासन-प्रशासन के लिए एक गंभीर चेतावनी है। यदि आज भी हम नहीं संभले, नदियों से अतिक्रमण नहीं हटा, प्लास्टिक और नालियों का गंदा पानी गिरना बंद नहीं हुआ, और वृक्षों की कटाई पर रोक नहीं लगी, तो आने वाले कुछ ही वर्षों में बिहार की ये नदियां केवल किताबों और इतिहास के नक्शों में ही दिखाई देंगी। आज ये सभी नदियां मौन खड़ी होकर किसी सच्चे उद्धारक की राह देख रही हैं। अब फैसला समाज को करना है कि उसे कंक्रीट की अंधी चकाचौंध चाहिए या जीवन देने वाला शुद्ध जल!जहानाबाद , बिहार
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