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परिवार

परिवार

अरुण दिव्यांश

दादा दादी चाचा चाची ,
माता पिता भाई बहन ।
आदर स्नेह निष्ठा प्यार ,
होता है जहाॅं निर्वहन ।।
इन्हें मिलाकर है बनता ,
सुंदर सुसज्जित परिवार ।
सुख दुःख साथ निभाना ,
है काशी मथुरा हरिद्वार ।।
परियों सा निजको वार दे ,
परियों सा ही जो प्यार दे ।
ईश्वर तब बरसाता प्यार ,
मधुरिम बेला इंतजार दे ।।
सुंदर मधुर ही ये उद्गार हो ,
सुंदर सजल व्यवहार हो ।
निश्छल प्रेम का संचार हो ,
परिवार में भी बहार हो ।।
जन जन में हो निश्छलता ,
निष्कपट आदर प्यार हो ।
नित्य जीवन खुशियाॅं बरसे ,
नित्य बरसता त्यौहार हो ।।

पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )बिहार ।
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