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वट-सावित्री

वट-सावित्री

✍️ डॉ. रवि शंकर मिश्र "राकेश"

वट की छाया आज भी जैसे,
सत्य सनातन कहती है—
नारी यदि संकल्पित हो तो,
मृत्यु भी पथ गहती है॥

ज्येष्ठ दुपहरी तप्त धरा पर,
सूरज अंगार बरसाए,
वट-वृक्षों की शीतल छाया,
सावित्री को पास बुलाए।

माथे पर सिंदूर सजा है,
अँखियों में विश्वास लिए,
कर में पूजा थाल सँवारे,
मन में अटल प्रकाश लिए।

पीत वसन, कर कंगन खनके,
पायल मधुर रुनझुन गाए,
सात फेरे के पावन बंधन,
आज पुनः स्मृति बन आए।

वट की जड़ में जल अर्पित कर,
सूत्र प्रेम का बाँध रही,
अपने अचल सतीत्व-बल से,
मृत्यु-द्वार भी लाँघ रही।

यम के सम्मुख अडिग खड़ी वह,
नारी की पहचान बनी,
संकट की हर घोर घड़ी में,
पतिव्रता की शान बनी।

सत्यवान का प्राण बचाने,
तप का दीप जलाया था,
अपने दृढ़ संकल्प-बल से,
भाग्य स्वयं झुकाया था।

वट-वृक्षों की अमर छाँव-सा,
अमर रहे यह नेह सदा,
जनम-जनम तक साथ निभे यह,
मन में उठती यही दुआ।

आज भी हर सुहागिन नारी,
श्रद्धा से यह व्रत करती,
सावित्री के पावन पद को,
अपने जीवन में धरती।

"राकेश" नारी-शक्ति जगत में,
सबसे अनुपम गाथा है,
त्याग, तपस्या और समर्पण,
 ही उसका अभिलाषा है।

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