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भारतीय स्वर्ण-नीति

भारतीय स्वर्ण-नीति

सत्येन्द्र कुमार पाठक
आर्थिक राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक सुरक्षा के अंतर्संबंधों पर आधारित है। लेखक ने यह तर्क दिया है कि भारत में सोने की खरीद को हतोत्साहित करना केवल एक वित्तीय निर्णय नहीं है, बल्कि यह एक रणनीतिक जोखिम भी हो सकता है। लेख का मुख्य केंद्र यह है कि भारत की घरेलू स्वर्ण मांग में कमी, वैश्विक स्तर पर चीन की आर्थिक स्थिति को और अधिक सुदृढ़ कर सकती है।
दिव्य रश्मि संपादक डॉ राकेश दत्त मिश्र ने सही पहचाना है कि भारत में सोना "भावनात्मक और सामाजिक सुरक्षा" का प्रतीक है, जबकि चीन के लिए यह "डॉलर के प्रभुत्व" को चुनौती देने वाला एक रणनीतिक हथियार है। यह तुलना भारत की जमीनी हकीकत को दर्शाती है। अर्थशास्त्र के मांग और आपूर्ति सिद्धांत के अनुसार, यदि भारत (दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा खरीदार) अपनी मांग कम करता है, तो वैश्विक कीमतें प्रभावित हो सकती हैं, जिसका लाभ चीन जैसे देश अपना 'गोल्ड रिजर्व' बढ़ाने में उठा सकते हैं।: लेख इस महत्वपूर्ण पक्ष को उजागर करता है कि बैंकिंग सुविधाओं की पहुँच से दूर ग्रामीण क्षेत्रों में सोना ही एकमात्र तरल और विश्वसनीय संपत्ति (Liquid A लेखक ने जनता के पास मौजूद सोने को "जनता का स्वर्ण भंडार" कहकर इसे राष्ट्र की अप्रत्यक्ष शक्ति के रूप में परिभाषित किया है, जो सराहनीय है। 1991 के भुगतान संतुलन संकट के समय सोने ने ही भारत की साख बचाई थी, यह संदर्भ लेखक के तर्क को मजबूती देता चीन जिस तरह से 'डी-डलराइजेशन' की ओर बढ़ रहा है, उसे देखते हुए सोने पर उसकी पकड़ वैश्विक अर्थव्यवस्था में पासा पलट सकती है। लेखक का यह अंदेशा तार्किक है।लेख में इस बात का उल्लेख कम है कि भारत सोने का उत्पादक नहीं, बल्कि आयातक है। अत्यधिक सोना खरीदना देश के 'विदेशी मुद्रा भंडार' पर दबाव डालता है और राजकोषीय घाटे को बढ़ाता है। सरकार का इसे हतोत्साहित करना अक्सर अर्थव्यवस्था को स्थिर रखने की मजबूरी होती है।अर्थशास्त्री अक्सर सोने को 'अनुत्पादक संपत्ति' मानते हैं क्योंकि यह शेयर बाजार या उद्योगों की तरह नई नौकरियों या बुनियादी ढांचे का निर्माण नहीं करता। लेखक ने इस आधुनिक आर्थिक दृष्टिकोण को "पारंपरिक बचत" के नीचे दबा दिया है। डॉ. राकेश दत्त मिश्र का लेख एक गंभीर चेतावनी देता है कि भारत को अपनी स्वर्ण-नीति केवल पश्चिमी आर्थिक चश्मे से नहीं देखनी चाहिए। यदि हम अपनी जनता को सोने से दूर करते हैं और उस स्थान को चीन जैसा प्रतिस्पर्धी देश भर लेता है, तो भविष्य में वैश्विक वित्तीय वार्ताओं (Financial Negotiations) में भारत का पलड़ा हल्का हो सकता है। आर्थिक नीतियों के सामाजिक और भू-राजनीतिक (Geopolitical) प्रभावों का एक उत्कृष्ट विश्लेषण है। यह पाठकों को सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हमारी व्यक्तिगत बचत की आदतें वास्तव में वैश्विक शक्ति संतुलन को प्रभावित कर रही हैं?

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