"कुंतलिनी"
✍️ डॉ. रवि शंकर मिश्र "राकेश"चंचल नयनों में राग भरा,
अंगना में उतरा रूप धरा।
कंचन काया की दीप्ति ऐसी,
परी अम्बर से उतरी जैसी।
कुंतल-केशों का सघन जाल,
जैसे सावन का मेघ काल।
मृदु मुस्कान अधर पर साजे,
रिमझिम नूपुर की ध्वनि बाजे।
चंदन सा मस्तक दमक रहा,
कुमकुम का बिंदु चमक रहा।
तव कंकन की झंकार प्रिये,
करती मन का शृंगार प्रिये।
जब-जब कंचन घट भर लाती,
यमुना तट पर लहरें गातीं।
मलयज-शीतल बहती समीर,
हिय में उपजाती मधुर पीर।
"राकेश" हृदय का मान तुम्ही,
इस जीवन का अरमान तुम्ही।
तुम रमण करो हिय-कुंजन में,
आ जाओ प्रीतम जीवन में।
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