ज्येष्ठ मास महात्मय {चौदहवां अध्याय}
आनन्द हठीला
ऋषि लोग बोले कि हे पडानन ! (छ मुखधारी)! राजा सगर की समस्त सन्तति जलकर भस्म हो गई, और राजा सगर का यज्ञ आरब्ध है, हे पड़ानन ! उस समय राजा सगर ने क्या किया ? ॥ १ ॥
तथा उनके सैनिको ने क्या किया ? यह सब कृपा कर कहिये। स्कन्द जी बोले कि हे शौनकादि ऋषि लोग ! बिल के द्वार पर स्थित सैनिक लोग भय से विह्वल हो गये ॥ २ ॥
और बिल की अग्निज्वाला से सन्तप्त होकर समाचार कहने को राजा सगर के पास गये । वहाँ जाकर सभोंने त्रैलोक्य का विजयादि सब समाचार कहा ॥ ३ ॥
आपके पुत्रों ने जब यज्ञाश्व को कहीं न देखा तब आ के पुत्रों ने अपने हाथ से पृथिवी के तल भाग को खोद डाला ॥ ४ ॥
उसके अन्दर सौ योजन के विस्तार में उस विवर से मिला हुआ गडर (गुफा) मिला, उसके अन्दर बहुत से सैनिकों के साथ आपके सब पुत्र चले गये ।।५।।
और हमलोगों को बिल के द्वार पर स्थित कर दिया। जब उसके अन्दर उन लोगों को बहुत दिन बीत गये, और वहाँ जाकर उन लोगों ने क्या किया ? यह समाचार बिल द्वार पर रहने के कारण हमलोगों को नहीं मालूम हुआ ॥६।।
और पाताल के 'समान वह विल अग्नि से पूर्ण हो गया और हमलोग उस अग्नि ज्वाला से व्याप्त हो गये तब हमलोग समाचार कहने के लिये आपके पास आये ॥ ७ ॥
हे राजन् ! उनकी क्या गति हुई यह हमलोग अत्यन्त मुग्ध हो जाने के कारण नहीं जानते। यह उन सैनिकों के वचन को सुनकर वजूप्रहार से पर्वत के समान ॥८॥
पृथिवी पर राजा सगर गिर गये और उसो चक्षण में विनष्ट के समान मालूम होने लगे । यह देखकर अमात्यवर्ग तथा सभी ऋत्विग्वर्ग हाहाकार करने लगे ॥ ९ ॥
वाद राजा सगर को उठाकर मुखकमल पर जज से सिञ्चन करने लगे और राजा को होश में लाकर ऋत्विज आदिकों ने कहा कि ॥ १० ॥
हे नृपशार्दूल ! शोक न करें, हे समस्त प्राणियों के हित मे रत! शोक नहीं करना चाहिये, क्योंकि पुरुप लोग वीर्यशाली होते है ॥ ११ ॥
हे राजन् ! उस बिल के अन्दर आप और हम तथा वीर लोग चलेंगे। यह निश्चय कर यज्ञ का शेष कार्य समाप्त किया ॥ १२ ॥
और सभी लोग उस बिलान्तर्गत जीव के बल पराक्रम को देखने के निमित्त निकल पड़े। माग मे सैनिकों ने जोदेवताओं से भी दुष्कर कर्म है जिसको सगरपुत्रों ने किया था उसको दिखाया ॥ १३ ॥
विवर पर्यन्त पृथिवी का समस्त तल भाग खोदा हुआ देखकर ऋषि लोग बोले कि हे उपस्थितवृन्द ! आपलोग सुनिये । हम सब ऋषिगण राजा सगर के भाव को समझ कर कहते हैं ॥ १४ ॥
ये अधिक विस्तीर्ण जो गर्त (गढ्ढा) हैं वे सब सागर (समुद्र) हो जायँगे। इस तरह विवाद करते हुए वे सब विवर के समीप आ गये ॥१५॥
और उस विवर के समीप सेना को खड़ी कर ऋपियों के साथ धर्मात्मा, राजा सगर प्रयत होकर परम अद्भुत भूगृह के अन्दर गये ॥ १६ ॥
वह भूगृह इन्द्रलोक के समान, रत्नों के दीप से प्रदीप्त, प्राणियों के संचार से रहित ओर सुन्दर भस्मराशि से पूर्ण था ॥ १७ ॥
राजा तथा वे ऋषि लोग देखकर क्रम से उस तेजःपुञ्ज के समीप गये । ज्वलन्त अग्नि के समान तेज से व्याप्त उनको देखकर ॥ १८ ॥
जो कि प्रज्वलमान, परमात्मा, ध्यानमग्न और योगगम्य हैं उनको कुछ देर के बाद कपिल ऋपि जानकर नमस्कार किया और उनकी स्तुति करने लगे ॥ १९ ॥
वे लोग बोले कि हे नित्य ! हे परानन्द ! आपकी जय हो, जगत् के कारणस्वरूप तथा मन से सृष्टि संहार करने वाले आपको नमस्कार है॥ २० ॥
हे सत्त्वगुण धारी हरिस्वरूप ! आपको नमस्कार है, हे रजोगुण घारी ! ब्रह्मस्वरूप आपको नमस्कार है ॥२१॥
तथा तमः स्वरूप में स्थित शिवस्वरूप आपको नमस्कार है । हे अखित लोक के वन्य (वन्दना के योग्य)! हे सुरासुर से पूजित चरणकमल ! आपको नमस्कार है नमस्कार हैं ॥ २२ ॥
हे दयानिधे ! संसाररूपी समुद्र मे मग्न हमलोगों को रक्षा करें, हे भूसुरेन्द्र (विनों के स्वामी) ! शीघ्र हमलोगों का उद्धार करें । शोकरूपी विशाल तीर रहित अथाह जजराशि में पतित इस पृथिवी का उद्धार करें, क्योंकि हे दोनबन्धो ! आप ही' आदि वराहरूपधारी हैं। इस तरह स्तुति करके राजा सगर पुनः शोकनग्न हो गये और वर्गकाल मे महान् पर्वत से पापाण के समान पृथिवी पर गिर गये ॥ २३-२४ ॥
नेत्र को खोलने पर कपिल ऋति अपने सामने निश्चित रूप से पतित राजा सगर को जानकर राजा तथा ऋषिगणों को देखकर यह वचन बोले ॥ २५--२६ ॥
इति श्री भविष्यपुराणे ज्येष्ठमासमादात्म्ये सनाढ्यवंशोद्भवव्याकरणाचार्य 'विद्यारत्न' पं० माधवप्रसादव्यासेन कृतायां भापाटीकायां चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥
क्रमशः...
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