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कैसे करूँ मैं तेरे यौवन का श्रृंगार

तेरे रूप-लावण्य की हर झलक मानो कविता बनकर हृदय में उतर जाती है।
शब्द छोटे पड़ जाते हैं, जब सौंदर्य स्वयं छंद बन जाए…
“कैसे करूँ मैं तेरे यौवन का श्रृंगार”
एक भावपूर्ण श्रृंगारिक काव्य प्रस्तुति

कैसे करूँ मैं तेरे यौवन का श्रृंगार

कुमार महेंद्र
तेरी आँखें कमल-गहरी,
नील गगन में डूबा चाँद।
एक झलक में मन हर लेती,
मेरा भावों भरा ब्रह्मांड।
भौंहें धनुष-सी तन जातीं,
पलकों में मधु-तीरों की धार।
कैसे करूँ मैं तेरे यौवन का श्रृंगार।।


अधर अरुणिम बिम्ब-से कोमल,
मदिर मुस्कान सुधा बरसाए।
गालों पर लज्जा की लाली,
मन में प्रणय-दीप जलाए।
गरदन श्वेत शंख-सी दमके,
कंधों पर चाँदनी की बहार।
कैसे करूँ मैं तेरे यौवन का श्रृंगार।।


अल्हड़ यौवन की मधुर तरंगें,
मन-सरोवर में लहरातीं।
कटि लता-सी मंद-मंद डोले,
पायल स्वर-संगीत सुनाती।
तेरी चंचल मृगनयनी छवि,
कर देती मन को बेकरार।
कैसे करूँ मैं तेरे यौवन का श्रृंगार।।


अंग-अंग में छंद सजे हैं,
वीणा-सी झंकृत हर तान।
तेरे रूप-सुधा के आगे,
फीका लगता स्वर्ग-विहान।
निहार तेरा निर्झर सौंदर्य,
महके भावों का संसार।
कैसे करूँ मैं तेरे यौवन का श्रृंगार।।


तू जैसे नव वसंत की आभा,
या सावन की प्रथम फुहार।
तेरी मुस्कानों के आगे,
मंद पड़े नभ के श्रृंगार।
शब्द सभी छोटे पड़ जाएँ,
कैसे लिखूँ रूप-लावण्य अपार।
कैसे करूँ मैं तेरे यौवन का श्रृंगार।।


कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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