रुपया बोला - “अब तो मुझे गिरने की आदत हो गई है!”
एक समय था जब देश में रुपया गिरता था तो संसद से लेकर सड़क तक शोर मच जाता था। टीवी चैनलों पर बहस होती थी, अर्थशास्त्री माथा पकड़ लेते थे और नेता लोग ऐसे दुखी दिखते थे मानो रुपया नहीं, देश की आत्मा गिर गई हो।
वर्ष 2013 में जब डॉलर 60 रुपये के आसपास पहुंचा था, तब बड़े-बड़े भाषण दिए गए। कहा गया कि “सरकार और रुपया दोनों में प्रतियोगिता चल रही है कि कौन ज्यादा गिर रहा है।” जनता ने भी ताली बजाई, क्योंकि उस समय गिरता रुपया राष्ट्रीय चिंता का विषय था।
लेकिन राजनीति भी बड़ी अद्भुत चीज है।
जो बात कल देशद्रोह लगती थी, वही आज “वैश्विक परिस्थिति” बन जाती है।
आज वही डॉलर जब 96 रुपये के करीब पहुंच गया है, तो रुपया शायद खुद सोच रहा होगा —
“पहले मेरे गिरने पर प्रेस कॉन्फ्रेंस होती थी, अब सन्नाटा क्यों है?”
रुपये की हालत उस छात्र जैसी हो गई है जो हर साल फेल होता है, लेकिन घर वाले अब डांटना छोड़ चुके हैं। उन्हें भी आदत पड़ गई है।
पहले कहा जाता था -
“रुपया गिर रहा है क्योंकि सरकार कमजोर है।”
अब कहा जाता है -
“डॉलर मजबूत हो रहा है।”
वाह री राजनीति!
अर्थशास्त्र भी अब पार्टी कार्यालय से तय होने लगा है।
जनता भी बड़ी समझदार हो गई है।
पेट्रोल महंगा हो तो कहा जाता है - “अंतरराष्ट्रीय संकट है।”
गैस सिलेंडर महंगा हो तो कहा जाता है - “देशहित में त्याग करना चाहिए।”
और रुपया कमजोर हो जाए तो कहा जाता है - “भारत विश्वगुरु बनने की राह पर है।”
ऐसा लगता है कि अब रुपया नहीं गिरता, केवल जनता की याददाश्त गिरती है।
कभी विपक्ष में बैठकर नेताओं को रुपया 60 पर राष्ट्रीय आपदा लगता था। आज 96 पर भी सब सामान्य है। शायद इसलिए क्योंकि अब रुपया नहीं, बयान बदल चुके हैं।
रुपया भी मन ही मन मुस्कुरा रहा होगा -
“जब मैं 60 पर था तब मेरी बहुत चिंता थी,
अब 96 पर हूँ तो सब ‘विकास’ देख रहे हैं!”
सच तो यह है कि राजनीति में गिरने का दर्द केवल तब तक होता है, जब तक कुर्सी दूर हो।
कुर्सी मिलते ही गिरता रुपया भी “आर्थिक रणनीति” बन जाता है।

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