ज्येष्ठ मास महात्मय {सोलहवां अध्याय}

आनन्द हठीला
स्कन्द जी बोले कि हे विप्रलोग ! तदनन्तर राजा भगीरथ ने निष्कण्टक राज्य कर पूर्व पितरों के समाचार को सुनकर उदासीन हो गये ।॥ १ ॥
और राज्य दण्ड कोश (खजाना) को पितामह (राजा सगर) के अधीन तथा उनकी आज्ञा कों ग्रहण कर दारुण तप करने के निमित्त शीघ्र तपोवन को चले गये ॥ २ ॥
और तप के द्वारा श्री शिवजी को प्रसन्न करने के निमित्त निराहार रहकर स्थिर चित्त से पञ्चाक्षरी विद्या का जप करने लगे ॥ ३ ॥
तथा दश वर्ष पर्यन्त दिन रात एक पैर से स्थित होकर और जलमात्र आहार कर तथा वायु पीकर तप करने लगे ॥४।।
इस प्रकार तप करते जब राजा भगीरथ को बहुत समय बीत गया तब भक्तवत्सल श्री शिवजी स्वयं वहाँ पर आये ॥ ५ ॥
भगोरथ की भक्ति के वशीभूत होकर जब वर देने के निमित्त शिवजो वहॉपर आये तब राजा भगीरथ ने शिवजी को देखकर प्रणाम किया और उच्च स्वर से मधुर वचन बोले ॥ ६ ॥
भगीरथ ने कहा कि हे शिव ! हे शम्भो ! आपको नमस्कार है, हे सबको सुख देने वाले ! हे जगन्नाथ! आपको नमस्कार है, हे विश्व के सर्जनहार ! ॥ ७ ॥
रजोगुण स्वरूप आपको नमस्कार है, हे पालनहार ! सत्त्वगुण स्वरूप आपको नमस्कार है, हे संहार करनेवाले !
तामस रूप आपको नमस्कार है ।॥ ८ ॥ कर्मों के फलदाता, भुक्ति (भोगपदार्थ) और मुक्ति के दाता, मन वचन कर्म स्वरूप ! ब्रह्मीभूत आपको नमस्कार है ॥ ९ ॥
भीतर वायु को रोक कर ध्यानशाली योगी लोग जिस निरीह शम्भु कों देखते हैं उन सदाशिव को नमस्कार हैं ॥ १० ॥
स्कन्द जी बोले कि हे विप्रलोग ! इस प्रकार राजा भगीरथ की स्तुति से प्रकन्न होकर शिवजी बोले कि हे नृप ! तुमसे हम प्रसन्न है, वर मॉगो। श्री शिवजी के वचन को सुनकर राजा भगीरथ बोले कि हे शिव! यदि आप प्रसन्न है तो मुझको आप मे दृढ़ भक्ति दोजिये ॥ ११ ॥
और पितरों की विशुद्धि के निमित्त सिद्धिदा श्री गड्डा को ले आइये। श्री शिवजी बोले कि हे राजन् ! वह गङ्गा स्वर्ग मे वास करती है, हम उस गङ्गा को लाने में समर्थ नहीं है ॥ १२ ॥
त्रैलोक्य से वन्दित जो देवेश हैं उन विष्णु भग-वान् को प्रसन्न करो। जिस उपाय के करने से विष्णु भगवान् शीघ्र तुम्हारे समीप आ जायेंगे ॥ १३ ॥
हम उस परम गुप्त व्रत को तुमसे कहेंगे। हे राजन् ! प्रथम सूर्यपुत्र ने विष्णु भगवान् की स्तुति की, और नमस्कार कर प्रसन्न किया ॥ १४ ॥
प्रसन्न होकर विष्णु भगवान् ने उस गोप्य व्रत को करने के लिये कहा और उसकी विधि वगैरह भी कही। बाद उस व्रत को बहुत दिन तक विष्णु ने गुप्त रखा ।। १५ ।।
इस समय हम तुमसे उस व्रत को कहेंगे, विधिपूर्वक उस व्रत को तुम करो। ज्येष्ठमास में प्रात. काल उठकर विधिपूर्वक स्नान करो ॥ १६ ॥
तथा त्रिविक्रम ( वामन) भगवान् का पूजन कर पञ्चाग्नि का सेवन, ब्राह्मणों को दही चावल का दान और श्रेष्ठ जल दान करो ॥ १७ ॥
इस तरह एक मास व्रत करने से विष्णु भगवान् प्रसन्न होंगे और समस्त पापों को नष्ट करनेवाली उस स्वर्गङ्गा को ले आयेगे ॥ १८ ॥
श्री शिवजी के वचन को सुनकर राजा भगीरथ ने शिवप्रोक्त व्रत को किया, उस व्रत के अनुष्ठान मात्र से विष्णु भगवान् समीप आ गये ॥ १९ ॥
उन विष्णु भगवान् की स्तुति तथा नमस्कार कर उनसे परम पावनी गङ्गा की याचना की। विष्णु भगवान् बोले कि हे भद्र भगीरथ ! उस मन्दाकिनी के पवित्र तट पर मेरे साथ तुम चलो ॥ २० ॥
वहॉ चलकर जप, हवन, स्नान, द्विज तर्पण (ब्राह्मण भोजन), और भक्तियुक्त चित्त से अनशन व्रत को करो ॥ २१ ॥
इस प्रकार एक वर्ष इस व्रत को करो, बाद वह गङ्गा तुम्हारे साथ जायगी । विष्णु भगवान् के वचन को सत्य मानकर विष्णु के साथ मन्दाकिनी के तट को राजा भगीरथ गये ॥ २२ ॥
और मन्दा-किनी के सुन्दर तट भाग में स्थित होकर उस विष्णुप्रोक्त व्रत का परम भक्ति के साथ अनुष्ठान किया । तव सरिद्वरा गङ्गा प्रसन्न हो गई ॥ २३ ॥
और राजा भगीरथ के सामने चारुनेत्रा (शोभन नेत्रा) स्त्रीरूप होकर प्रकट हो गई ये त्रिपथा गङ्गा है, यह जानकर भक्तिपूर्वक उनकी भगीरथ ने स्तुति की ॥ २४ ॥
तदनन्तर मन्दाकिनी प्रसन्न होकर बोलीं कि हे राजन् ! तुम मुझसे वर मॉगो। इस प्रकार गङ्गा के कहने पर राजा भगीरथ बोले कि हे भद्रे ! मेरे साथ पृथिवी पर पितरों की मुक्ति के लिये चलिये ॥ २५ ॥
भगीरथ को तथास्तु (चलेंगे) कह कर वह गङ्गा भगीरथ के साथ पृथिवीतल को गई । प्रतिपत् के दिन प्रकट होकर दशमी के दिन ओष (प्रवाह) रूप हो गई ॥ २६ ॥
और लोकों को पवित्र करने के निमित्त पृथिवी पर अवतीर्ण हुई । इसलिये पवित्र वह दशमी दशहरा नाम से प्रसिद्ध हुई ॥ २७ ॥
हे द्विज ! तदनन्तर भगीरथ ने उस गङ्गा के दिव्य जल से पितरों को प्लावित किया। गङ्गाजल से प्लावित वे सब भस्म राशि सगर के पुत्र दिव्य देह होकर विष्णु भगवान् के मन्दिर (वैकुण्ठ) को गये ॥ २८ ॥
इति श्री भविष्यपुराणे ज्येष्ठमासमाहात्म्ये सनाढ्यवंशोद्भवव्याकरणाचार्य 'विद्यारत्न' पं० माधवप्रसादव्यासेन कृतायां भापाटीकायां पोडशोऽध्यायः ॥ १६ ॥
क्रमशः...〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
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