पुरुषोत्तम मास ज्येष्ठ मास 2026: राजा वसु से राजा शर्याति तक
सत्येन्द्र कुमार पाठक
भारतीय काल-गणना केवल पंचांग के पन्ने नहीं, बल्कि खगोल विज्ञान और ऋषियों की तपस्या का जीवंत दस्तावेजीकरण है। वर्ष 2026 का ज्येष्ठ मास एक ऐसा ही दुर्लभ अवसर लेकर आ रहा है, जहाँ प्रकृति और आध्यात्मिकता का एक अनूठा संगम देखने को मिलेगा। इस वर्ष 'अधिक मास' के जुड़ जाने से ज्येष्ठ का महीना लगभग 60 दिनों का होगा, जिसे पौराणिक भाषा में 'महा-ज्येष्ठ' या 'पुरुषोत्तम मास' का नाम दिया गया है।
ब्रह्मांडीय गति के अनुसार, सौर वर्ष और चंद्र वर्ष के बीच प्रति वर्ष 11 दिनों का अंतर आता है। इस अंतर को पाटने के लिए हर 32 माह बाद एक 'अधिक मास' की व्यवस्था की गई है। प्राचीन काल में इसे 'मलमास' कहकर उपेक्षित किया गया था, लेकिन भगवान विष्णु ने इसे अपना नाम 'पुरुषोत्तम' देकर जगत का सबसे पवित्र महीना बना दिया। वर्ष 2026 में यह संयोग 17 मई से 15 जून के बीच बन रहा है, जहाँ ज्येष्ठ की तपती गर्मी भक्तों के लिए अक्षय पुण्य का मार्ग प्रशस्त करेगी। नालंदा जिले का राजगीर (प्राचीन राजगृह) इस अवधि में ब्रह्मांड का केंद्र बन जाता है। पौराणिक संदर्भों के अनुसार, मगध नरेश राजा वसु ने यहाँ एक भव्य यज्ञ का आयोजन किया था। राजा वसु, जो ब्रह्मा जी के मानस पुत्र थे, उनके आह्वान पर स्वर्ग के द्वार खुल गए थे।
33 कोटि देवताओं का वास: मलमास के दौरान विश्व के सभी 33 कोटि देवी-देवता राजगीर के पवित्र ब्रह्मकुंड और सप्तधाराओं में निवास करते हैं। इस समय अन्य सभी तीर्थ 'मल' यानी अशुद्ध माने जाते हैं और केवल राजगीर ही पूर्णतः जागृत तीर्थ होता है। भगवान विष्णु का आशीष: राजा वसु की न्यायप्रियता से प्रसन्न होकर श्रीहरि विष्णु ने इस क्षेत्र को अपनी विशेष कृपा प्रदान की थी, जिससे यहाँ स्नान और दान करने से जीव को जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति मिलती है। मदसरवा (अरवल): हिरण्य प्रदेश का वैदिक वैभव में मगध की विरासत केवल राजगीर तक सीमित नहीं है। अरवल जिले के कलेर प्रखंड में वैदिक नदी (सोन) के तट पर स्थित मदसरवा का इतिहास उतना ही प्राचीन और गौरवशाली है। यह क्षेत्र प्राचीन काल में 'हिरण्य प्रदेश' के नाम से विख्यात था। राजा शर्याति और सुकन्या की अमर कथा: यहाँ के न्यायप्रिय राजा शर्याति की पुत्री सुकन्या और परम तपस्वी च्यवन ऋषि की कथा इस भूमि को औषधीय और आध्यात्मिक ऊर्जा प्रदान करती है। ब्रह्मेष्ठि यज्ञ का आयोजन: मदसरवा की इस पावन भूमि पर मधुश्रवा ऋषि, च्यवन ऋषि और सुकन्या के सानिध्य में एक ऐतिहासिक ब्रह्मेष्ठि यज्ञ का आयोजन किया गया था। यह कोई साधारण यज्ञ नहीं था, बल्कि इसमें वैदिक देवमंडल के प्रमुख स्तंभ उपस्थित हुए थे:
12 आदित्य: जो सृष्टि की ऊर्जा और प्रकाश के स्रोत हैं , 11 रुद्र: जो विनाश और नव-सृजन की शक्ति हैं। , 8 वसु: जो प्रकृति के विभिन्न तत्वों (अग्नि, पृथ्वी, वायु आदि) के अधिपति हैं। अश्विनी कुमार: देवताओं के परम वैद्य, जिन्होंने इसी क्षेत्र में च्यवन ऋषि को पुनः युवावस्था प्रदान की थी। ज्येष्ठ मास 2026:वर्ष ज्येष्ठ मास 2 मई से शुरू होकर 29 जून तक चलेगा। भीषण गर्मी के इस दौर में जल और छाया का दान ही सबसे बड़ा धर्म है। इस माह के देवता वरुण (जल देव) और सूर्य हैं, इसलिए राहगीरों के लिए प्याऊ लगवाना और पशु-पक्षियों के लिए जल की व्यवस्था करना इस 'महा-ज्येष्ठ' में अनंत फलदायी है। इस दौरान भगवान विष्णु के 'त्रिविक्रम' स्वरूप की पूजा की जाती है। विष्णु सहस्रनाम का पाठ और सात्विक दिनचर्या इस कठिन तपिश में मानसिक शांति प्रदान करती है। मलमास (17 मई से 15 जून) के दौरान विवाह, मुंडन और गृह प्रवेश जैसे मांगलिक कार्य वर्जित होते हैं, क्योंकि यह समय केवल आत्म-चिंतन और साधना के लिए आरक्षित है।राजगीर का मलमास मेला हो या मदसरवा की वैदिक स्मृतियाँ, ये हमारे पूर्वजों की समृद्ध संस्कृति का प्रमाण हैं। राजा वसु की न्यायप्रियता और राजा शर्याति के यज्ञों की यह भूमि हमें याद दिलाती है कि मगध केवल एक भूगोल नहीं, बल्कि एक विचार है। वर्ष 2026 का यह पुरुषोत्तम मास हमें अपनी इन लुप्त होती धरोहरों को फिर से सहेजने और भगवान विष्णु की शरण में जाने का एक दिव्य अवसर प्रदान कर रहा है।
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