प्रखर राष्ट्रवादी और महान क्रांतिकारी: वीर सावरकर
डॉ. उषाकिरण श्रीवास्तव
विनायक दामोदर सावरकर, जिन्हें संपूर्ण राष्ट्र 'वीर सावरकर' के नाम से श्रद्धापूर्वक स्मरण करता है, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास के वे देदीप्यमान नक्षत्र हैं, जिन्होंने अपनी लेखनी और क्रांतिकारी गतिविधियों से ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिला दी थी। वे न केवल एक निर्भीक स्वतंत्रता सेनानी थे, बल्कि एक ओजस्वी कवि, दार्शनिक, समाज सुधारक और महान इतिहासकार भी थे। वीर सावरकर का जन्म 28 मई 1883 को महाराष्ट्र के नासिक जिले के भगूर गाँव में हुआ था। बचपन से ही उनके मन में राष्ट्रभक्ति की भावना कूट-कूट कर भरी थी। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा नासिक और मुंबई में प्राप्त की। 1905 में बीए की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद वे उच्च शिक्षा हेतु लंदन गए, जहाँ उन्होंने कानून की पढ़ाई के साथ-साथ भारतीय स्वतंत्रता के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जनमत तैयार करना शुरू किया।
लंदन प्रवास के दौरान सावरकर ने "इंडियन होम रूल सोसाइटी" और "अभिनव भारत सोसाइटी" के माध्यम से भारतीय छात्रों को संगठित किया। उन्होंने 'इंडिया हाउस' को क्रांतिकारी गतिविधियों का केंद्र बना दिया। यहीं रहते हुए उन्होंने अपनी कालजयी पुस्तक "1857 का स्वातंत्र्य समर" लिखी। इस पुस्तक ने पहली बार 1857 के विद्रोह को 'सिपाही विद्रोह' के बजाय 'भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम' सिद्ध किया, जिससे ब्रिटिश हुकूमत बुरी तरह घबरा गई थी।
1910 में उन्हें लंदन में गिरफ्तार किया गया। भारत लाते समय उन्होंने 'मोरिया' नामक जहाज से समुद्र में छलांग लगाकर अपनी अदम्य वीरता का परिचय दिया। उन पर मुकदमा चला और उन्हें दोहरे आजीवन कारावास (50 वर्ष) की सजा सुनाकर अंडमान की कुख्यात सेल्युलर जेल (कालापानी) भेज दिया गया। वहां उन्होंने 11 वर्षों तक अमानवीय यातनाएं सहीं, लेकिन उनका मनोबल नहीं टूटा। उन्होंने जेल की दीवारों पर कंकड़ों से कविताएं उकेरीं और उन्हें कंठस्थ किया।
1924 में जेल से रिहा होने के बाद (रत्नागिरी में नजरबंदी के दौरान), सावरकर ने छुआछूत जैसी कुरीतियों के विरुद्ध कड़ा संघर्ष किया। उन्होंने 'पतित पावन मंदिर' की स्थापना की, जहाँ सभी जातियों के लोगों को प्रवेश का अधिकार था। उन्होंने 'हिंदुत्व' की विचारधारा को परिभाषित किया और राष्ट्र को एक सूत्र में पिरोने का कार्य किया।: यहाँ यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि वीर सावरकर हिंदू महासभा के अध्यक्ष रहे थे। भारतीय जनता पार्टी (जो 1980 में बनी) के वैचारिक प्रेरणा स्रोतों में सावरकर जी का 'हिंदुत्व' दर्शन अवश्य शामिल है, परंतु वे प्रत्यक्ष रूप से इसके संस्थापक सदस्य नहीं थे क्योंकि दल का गठन उनकी मृत्यु के पश्चात है।
26 फरवरी 1966 को इस महान विभूति ने 'आत्मार्पण' (इच्छा मृत्यु) के माध्यम से अपना पार्थिव शरीर त्याग दिया। वीर सावरकर का जीवन हमें सिखाता है कि राष्ट्र के प्रति समर्पण क्या होता है। उनकी कविताएं आज भी युवाओं की धमनियों में देशभक्ति का संचार करती हैं। भारतीय इतिहास उन्हें हमेशा एक ऐसे अपराजेय योद्धा के रूप में याद रखेगा जिसने मातृभूमि की बेड़ियाँ काटने के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया।
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