“देह भोग की वस्तु नहीं”
✍️ डॉ. रवि शंकर मिश्र "राकेश"देह साधन है साधना, मत भोगों में खोय।
चेतन-ज्योति मंदिर यह, रोगों से मत रोय॥
जिह्वा चंचल लोभिनी, भटकाए दिन-रात।
क्षणिक स्वाद के लोभ में, भूलें जीवन-तात॥
उदर अग्नि यज्ञकुंड है, सीमित दे आहार।
अधिक जले तो शेष बस, राख रहे बेकार॥
अपानवायु संकेत दे, देह दशा बतलाय।
जो समझे इस भेद को, रोग पास न आय॥
दुर्गंधादि जो लक्षण हों, चेतें बुद्धि-विवेक।
भीतर वैद्य आत्माराम, देता सही सन्देश॥
रुको मनुज! मत दौड़ तू, रस-भोगों के पास।
स्वास्थ्य छूटे, शांति बिखर—जीवन हो उदास॥
शिश्नोदर के बंधन से, जब चेतन ऊपर जाय।
हर श्वासे साधन बने, जीवन सुखमय छाय॥
देह न केवल भोग हेतु, उन्नति का है द्वार।
जो संयम साधे इसे, पावे मुक्ति अपार॥
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