“देह का धर्म”:: कर्म का मर्म

“देह का धर्म”:: कर्म का मर्म

✍️ डॉ. रवि शंकर मिश्र "राकेश"
देह मिली है साधन बनकर, मत इसे भोग का पात्र बना,
यह मंदिर है चेतन-ज्योति का, मत इसे रोग का तंत्र बना।

जिह्वा की जिद में बह जाता, जीवन का सारा संतुलन,
स्वाद क्षणिक, पर कष्ट अनंत—क्यों भूल रहा यह सरल कथन?

उदर बना है अग्नि-कुंड, इसमें आहुति सीमित दे,
अधिक जलेगा, राख बचेगी—संयम की ज्योति संग में ले।

अपानवायु भी संदेशक है, देह की हर गतिविधि का,
जो समझे इसके संकेतों को, पथ पाएगा सिद्धि का।

दुर्गंध, पीड़ा, भारीपन—सब मन को चेतावनी देते हैं,
भीतर बैठा ‘आत्माराम वैद्य’ तुम्हें धीरे-धीरे कहते हैं।

“रुको जरा, अब थमो मनुज! रस के पीछे तुम मत दौड़ो,
स्वास्थ्य छूटे, शांति बिखरे—इसलिए जिह्वा की मांग छोड़ो।”

शिश्नोदर के जाल से बाहर, जब चेतना ऊपर उठती है,
तब जीवन की हर श्वास स्वयं, साधना बनकर बहती है।

देह नहीं बस भोग की वस्तु, यह साधन है उन्नति का,
जो इसे साधे प्रेम सहित, वही अधिकारी मुक्ति का।

हमारे खबरों को शेयर करना न भूलें| हमारे यूटूब चैनल से अवश्य जुड़ें https://www.youtube.com/divyarashminews #Divya Rashmi News, #दिव्य रश्मि न्यूज़ , https://www.facebook.com/divyarashmimag

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ